गोरक्षा आंदोलन : हिंदू समाज का संगठित स्वाभिमान
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गोरक्षा आंदोलन : हिंदू समाज का संगठित स्वाभिमान

1966 का गोरक्षा आंदोलन भारतीय इतिहास का उपेक्षित, किंतु निर्णायक अध्याय था। इंदिरा गांधी सरकार द्वारा साधु-संतों पर की गई गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए, जिससे हिंदू समाज में गहरा आक्रोश फैला। इस घटना ने कांग्रेस का जनाधार कमजोर किया, संगठन के नाते जनसंघ को बल मिला और भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना तथा धर्म-संरक्षण के प्रति विचारों का पुनर्जागरण प्रारंभ हुआ

Written byशिवेन्द्र राणाशिवेन्द्र राणा
Nov 7, 2025, 06:35 am IST
inभारत, विश्लेषण
इंदिरा गांधी सरकार ने गोरक्षकों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था

इंदिरा गांधी सरकार ने गोरक्षकों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था

आधुनिक भारत के इतिहास में 7 नवंबर, 1966 का गोरक्षा आंदोलन एक ऐसा अध्याय है, जो सिर्फ किसी यथातथ्य विवरण की ओर संकेत नहीं करता, बल्कि यह अतीत के उत्पीड़न, वर्तमान की मनोदशा और भविष्य के स्वरूप को उद्घाटित करता है। गो-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में देशभर से लाखों लोग इस आंदोलन में शामिल हुए थे। लेकिन तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने न केवल साधु-संतों की मांग की अनदेखी की, बल्कि उन पर गोलियां चलवाईं, जिसमें कई गोरक्षक बलिदान हुए।

शिवेन्द्र राणा
स्तंभकार

गोरक्षा भारतीय सभ्यता का हिस्सा रही है, लेकिन इसके संगठित रूप की शुरुआत 1882 में हुई, जब महर्षि दयानंद सरस्वती ने गोरक्षिणी सभा बनाई। बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे आगे बढ़ाया। इसी दौर में 1964 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की स्थापना हुई। 1966 के प्रयागराज कुंभ मेले में विहिप ने पहला विशाल हिंदू सम्मेलन आयोजित किया, जिसका नेतृत्व प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने किया। उन्होंने 1952 में नेहरू को चुनाव में चुनौती दी थी। 25 सितंबर, 1966 को सर्वदलीय गोरक्षा महाअभियान समिति बनी, जिसके अध्यक्ष भी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी बने। इसमें रा.स्व.संघ, विहिप, आर्य समाज, हिंदू महासभा और कई अन्य धार्मिक-सामाजिक संगठनों के साथ-साथ तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा भी शामिल हुए, जो भारतीय साधु समाज के अध्यक्ष भी थे। इस आंदोलन के पीछे आस्था और विश्वास की बड़ी भूमिका थी।

करपात्री महाराज का श्राप

लाल बहादुर शास्त्री की असमय मृत्यु के बाद कांग्रेस में वंशवाद का प्रवेश हुआ और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उन्होंने संतों का समर्थन लिया। इसलिए संतों को उम्मीद थी कि इंदिरा गांधी उनकी गोरक्षा की बात मानेंगी, लेकिन उन्होंने वादा पूरा नहीं किया। विनोबा भावे जैसे नेता भी गोहत्या रोकने की मांग कर रहे थे, पर 184 दिन अनशन के बावजूद सरकार ने ध्यान नहीं दिया और आंदोलनकारियों पर गोलीयां चलाने का आदेश दे दिया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पुलिस की गोलीबारी में 8 से 10 साधुओं की मृत्यु हुई, लेकिन आंदोलन में शामिल कुछ लोगों की मानें तो लगभग 1400 लोग मारे गए थे। लाशों को जल्दी-जल्दी हटाकर अज्ञात स्थानों पर दफनाया गया, जो हिंदू समाज के लिए एक गहरा आघात था।

कहते हैं, संसद के सामने साधुओं और गायों की लाशें उठाते हुए करपात्री महाराज ने इंदिरा गांधी को श्राप दिया था। उन्होंने कहा था, ‘‘मैं साधुओं की हत्या को क्षमा करता हूं, पर गऊओं की हत्या के लिए तुम्हे कुल नाश का श्राप देता हूं।’’ जिस दिन साधु-संतों और गो-भक्तों पर गोलियां चलाई गईं, उस दिन गोपाष्टमी था और संयोग से इंदिरा गांधी की हत्या भी इसी दिन हुई। उनके दोनों बेटे, संजय और राजीव भी असमय मृत्य को प्राप्त हुए। लोग मानते हैं कि करपात्री महाराज द्वारा इंदिरा गांधी को दिया गया श्राप सच साबित हुआ।

करपात्री महाराज की हत्या का प्रयास

शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के अनुसार, सनातन संतों के प्रति इंदिरा सरकार की शत्रुता अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि तिहाड़ जेल में पेशेवर अपराधियों द्वारा करपात्री महाराज की हत्या का प्रयास किया गया। उन पर लोहे की रॉड से हमला हुआ, आंखों में सरिया घुसेड़ने की कोशिश हुई। कुछ संतों ने उनकी रक्षा की। इसी वेदना में उन्होंने प्राण त्याग दिया। गोलीकांड के दो दिन बाद तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने संसद में हिंसा का दोष जनसंघ से जुड़े स्वामी रामेश्वरानंद के भाषण पर डाला, जिन्होंने संसद घेरने का विचार दिया था। तब इंदिरा गांधी ने संसद में कहा था, ‘‘यह हमला सरकार पर नहीं, हमारे जीवन-मूल्यों और परंपरा पर है।’’ इससे स्पष्ट है कि उन्हें भारतीय संस्कृति और संविधान की असली भावना की समझ कम थी। गाय भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है और संविधान के भाग IV के अनुच्छेद 48 के अनुसार गोहत्या विरोधी कानून की मांग कानूनन सही थी।

1966 के गो संरक्षण आंदोलन के कई पहलू हैं। सबसे पहले, आंदोलन से हिंदू समाज में स्वधर्म विरोधी आक्षेप के खिलाफ आक्रोश पैदा हुआ, जिसने बाद में सिख नरसंहार (1984), अयोध्या आंदोलन (1992) को जन्म दिया। यह आंदोलन हिंदू समाज को संगठित राजनीतिक विकल्प की ओर ले गया, लेकिन पारंपरिक सहिष्णुता ने इस संगठन को धीमा किया। इस हत्याकांड ने ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का जनाधार कमजोर किया और 1967 के चुनावों में जनसंघ ने कई राज्यों में सफलता पाई, कांग्रेस को 6 राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा।

इतिहास को झुठलाने का प्रयास

दूसरी ओर, वामपंथी मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग ने इस आंदोलन को मौन रखा या उसका विकृत चित्रण किया, जैसा इतिहासकार विपिन चंद्र और रामचंद्र गुहा जैसे लेखकों के लेखों में दिखता है।

रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक ‘भारत नेहरू के बाद’ में लिखा है, ‘‘हिंदू कट्टरपंथी गो हत्या पर पाबंदी की मांग कर रहे थे। जनसंघ के समर्थन से यह विरोध एक बड़े सामाजिक आंदोलन में बदल गया। 6 नवंबर को राजधानी दिल्ली की सड़कों पर लगभग एक लाख लोग, जिनमें अधिकतर साधु-संत थे, त्रिशूल और कुल्हाड़ियां लेकर संसद भवन के सामने बड़ी सभा में जमा हुए। इस दिन राजधानी दिल्ली की सड़कों पर लगभग एक लाख लोग, ज्यादातर साधु-संत, त्रिशूल और कुल्हड़ियां लेकर संसद भवन के सामने बड़ी सभा में जमा हुए। सभा के मुख्य वक्ता स्वामी करपात्री महाराज थे, जिनके साथ संसद से निलंबित जनसंघ सांसद स्वामी रामेश्वरानंद भी थे। उन्होंने साधुओं से संसद भवन का घेराव करने की अपील की, जिसे सुन भीड़ ‘स्वामी रामेश्वरानंद की जय’ के नारे लगा कर संसद की ओर बढ़ी। जनसंघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने अपील की कि यह अपील वापस लें, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने घुड़सवार दस्ते, आंसू गैस और रबड़ की गोलियां चलाईं। भीड़ ने पत्थर और लाठी से पुलिस का सामना किया। जैसे ही संसद भवन के सामने धुएं का गुबार उठा, भीड़ पीछे हटने लगी और उसके सामने जो भी पड़ा, उसे तहस-नहस कर दिया। ऑल इंडिया रेडियो के सुरक्षा बाड़े और कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज के घर में आग लगा दी। इस हिंसा में करीब 250 कारें, 100 स्कूटर और 10 बसें क्षतिग्रस्त हुईं। शाम तक स्थिति नियंत्रण में लाने के लिए दिल्ली में सेना बुलानी पड़ी। अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि आंदोलन में अवांछित तत्वों ने पवित्र उद्देश्य को बड़ा नुकसान पहुंचाया।’’

इस पूरे आंदोलन को तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने तो क्रूरता से दबाया ही, वामपंथी पत्रकारों, इतिहासकारों ने भी इसमें सहयोग किया। प्रश्न यह है कि पवित्र गाय के रक्षार्थ कानून की मांग कट्टरपंथ कैसे हो गया? दूसरी बात, नागा संन्यासी धर्म योद्धा होते हैं। तलवार और त्रिशूल जैसे हथियार उनके जीवन का हिस्सा हैं। तीसरी बात, मृत साधुओं की संख्या कम बताकर कांग्रेस की क्रूरता पर पर्दा डालने का सुनियोजित प्रयास किया गया। कुछ पत्रकार और मीडिया समूह मृतकों की संख्या केवल सात से दस बताने पर जोर देते रहे। यही नहीं, वामपंथी आलोचक इसे देश की पहली संसद पर हमला तक कहने लगे। चुनावों में नरसंहार मुद्दा बनने से इनकार करने वालों को 1967 के चुनाव परिणामों को देखना चाहिए। अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तव्य और वरिष्ठ इतिहासकार कृष्णानंद सागर के विवरण से इस आंदोलन की वास्तविकता समझी जा सकती है। इतिहास अनेक विचारों से बनता है और नवचेतन समाज अपने सच्चे इतिहास की खोज में लगा है।

आंखोंदेखी पुलिसिया बर्बरता

कृष्णानंद सागर, जो विभाजनकालीन भारत के साक्षी और गोरक्षा आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे, उन दिनों गुरुग्राम में प्रचारक थे। उन्होंने इस हत्याकांड का विवरण दिया है। उनके अनुसार आंदोलन की तैयारी कई महीनों से चल रही थी। आंदोलन में देशभर से, विशेषकर हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के आसपास के लाखों लोग शामिल हुए थे। मंच संसद गेट के पास लगा था और वहां से कनॉट प्लेस तक भीड़ फैली थी। सभा के दौरान साधुओं के वेश में कुछ संदिग्ध लोग मंच के पीछे हंगामा करने लगे। मंच से शांति की अपील भी की गई। इसी बीच स्वामी रामेश्वरानंद का उत्तेजक भाषण हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘यदि ये हमारी मांग नहीं मान रहे हैं तो संसद का घेराव करो।’’ इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण शुरू हुआ। तभी पुलिस ने अचानक आंसू गैस के गोले छोड़े और फायरिंग शुरू कर दी। अटल बिहारी वाजपेयी को भाषण रोकना पड़ा। पुलिस मंच की ओर गोलियां चलाते हुए तिलक प्रतिमा और कनॉट प्लेस की ओर बढ़ी। कई लोग मारे गए या घायल हुए। कृष्णानंद सागर बताते हैं, ‘‘मैने वहां कई शव देखे, घायलों को चीखते-कराहते देखा।’’ उनके अनुसार, उस दिन दिल्ली में अनुमानत: लगभग 10 लाख आंदोलनकारी उपस्थित थे।

इस हत्याकांड के बाद हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सत्याग्रह शुरू हुआ, जिसमें आर्य समाज ने अग्रणी भूमिका निभाई। रामगोपाल सालवले इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे। उसी रात प्रशासन ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं और लोगों को दिल्ली छोड़ने पर मजबूर किया। बाद में कुछ युवक डीटीसी बसों को जलाने का प्रयास करते देखे गए, जिन्हें संघ कार्यकर्ताओं ने रोक दिया। यह संदेह था कि वे सरकार समर्थित उपद्रवी थे, जो आंदोलन को बदनाम करने आए थे।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने जो राजनीतिक हथकंडे अपनाए थे, उन्हें देखकर कृष्णानंद सागर के विवरण पर विश्वास करना सहज है कि गोरक्षा आंदोलन के विरुद्ध षड्यंत्र रचे गए। उनका वर्णन इस घटना की नई व्याख्या प्रस्तुत करता है, जिसे सत्ता और मीडिया, दोनों ने इतिहास से लगभग मिटा दिया। सवाल है, पीढ़ियों को अपने इतिहास के यथार्थ से वंचित क्यों रखा गया?

ब्रिटिश चिंतक माइकल ऑकशॉट के शब्दों में, ‘अतीत का गर्व ही वर्तमान के निर्णय और भविष्य के मार्ग को प्रभावित करता है।’ इतिहास केवल तथ्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना की नींव और भविष्य की प्रेरणा है। इसलिए युवाओं को इतिहास के सत्य स्वरूप से जोड़ना अनिवार्य है ताकि धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्तित्व की रक्षा संभव हो सके। इतालवी दार्शनिक क्रोचे का कहना है कि ‘सम्पूर्ण इतिहास समसामयिक इतिहास होता है।’ इसका तात्पर्य है कि घटनाएं और विचार सभी इतिहास-प्रवाह के अभिन्न अंग हैं। वर्तमान जीवन से जुड़ाव के कारण इतिहास हमेशा समसामायिक रहता है और यही विशेषता उसे केवल इतिवृत्त से अलग करती है।

Topics: गोरक्षा आंदोलनहिंदू समाजशिवेन्द्र राणाअटल बिहारी वाजपेयीGauraksha Andolanइंदिरा गांधीब्रिटिश चिंतक माइकलHindu Samajरामगोपाल सालवलेभारतीय सभ्यतावामपंथी पत्रकारवामपंथी मीडियामहर्षि दयानंद सरस्वतीपाञ्चजन्य विशेषआधुनिक भारतस्वाभिमान
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