आज सारी दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है। कोविड 2019-21 महामारी के तुरंत बाद रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके साथ ही अरब-एस्राएल संघर्ष से भू-राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। पर्यावरण की समस्या से प्राकृतिक आपदाओं में भी वृद्धि हो रही है। वहीं तकनीकी क्षेत्र में भी बड़ी तेजी से बदलाव आ रहे हैं और आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस ने तो रोजगार के क्षेत्र में अनिश्चितता को और जटिल बना दिया है। बड़ी-बड़ी कंपनियां कामगारों की छंटनी कर रही हैं। दुनिया में कर्ज की समस्याएं बढ़ रही हैं। जहां दुनिया की कुल आय 105 ट्रिलियन डॉलर है, वहीं दुनिया का कुल ऋ ण 335 ट्रिलियन डॉलर के लगभग हो गया है। अमेरिका का राष्ट्रीय ऋ ण, जो 2000 में सिर्फ 5.7 ट्रिलियन डॉलर था, 2025 में बढ़कर 37.5 ट्रिलियन डॉलर हो गया है। जबकि अमेरिका की कुल आय 28.5 ट्रिलियन डॉलर ही है, यानी आय और ऋण के अनुपात में बहुत वृद्धि हो रही है।

राष्ट्रीय सह-संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच
अमेरिका के नागरिकों का ऋण भी 18 ट्रिलियन डॉलर है, जो यह संकेत देता है कि वहां के नागरिक अपनी संपत्तियों को गिरवी रखकर तथा क्रेडिट कार्ड पर उधारी लेकर उपभोग कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दुनिया एक भयावह मोड़ पर खड़ी है और एक नई आर्थिक व्यवस्था को तलाश रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाॅल्ड ट्रम्प ने जिन आर्थिक नीतियों की घोषणा की है, उनसे अमेरिकी डॉलर की साख काफी गिरी है और पिछले 9 महीने में डॉलर की कीमत में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। दुनिया के बहुत से देश डॉलर की रिजर्व करेंसी को बदलकर एक नई अर्थव्यवस्था के बारे में गंभीर चिंतन कर रहे हैं।
इस कारण दुनिया के बहुत से देशों के केंद्रीय बैंक अमेरिकी ट्रेजरी बांड को बेचकर सोने में अपना निवेश कर रहे हैं, जिसकी वजह से सोने के दामों में काफी उछाल आ रही है। पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका ने जिस ढंग से डॉलर छापकर अपनी अर्थव्यवस्था को चलाया है, उससे वहां व्यापार घाटा बहुत बढ़ता जा रहा है और बजट पर ब्याज का बोझ भी बढ़कर 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया है, जो वहां के रक्षा बजट से भी अधिक है। ऐसे में ट्रम्प आयात को घटाना चाहते हैं और उन्होंने आयात पर कर यानी टैरिफ को काफी बढ़ा दिया है। भारत से आयात पर भी 50 प्रतिशत का शुल्क लगाया गया है। चीन, भारत, रूस आदि देशों ने इसका कोई विकल्प निकालने पर विचार किया है तथा ब्रिक्स देशों की बैठक में इसकी चर्चा भी हुई है कि डॉलर के बदले किसी नई मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए लाना उचित होगा।
नई आर्थिक व्यवस्था
द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते ही विश्व व्यवस्था में एक बड़ा परिवर्तन आया। राजनीतिक उपनिवेशवाद का दौर समाप्ति की ओर था, परंतु आर्थिक उपनिवेशवाद का एक नया रूप जन्म ले चुका था। ब्रिटिश साम्राज्य, जो सदियों तक वैश्विक व्यापार और वित्त पर हावी रहा था, अपनी शक्ति खो चुका था। इस शक्ति का हस्तांतरण कुछ नई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से अमेरिका के हाथों हुआ। यह हस्तांतरण किसी संयोग का परिणाम नहीं था, बल्कि एक पूर्व निर्धारित रणनीति का हिस्सा था, जिसमें अमेरिका को वैश्विक आर्थिक नेतृत्व सौंपा गया।
डॉलर का उदय
जुलाई, 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर राज्य के ब्रेटन बुड्स नगर में एक ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ, जिसमें 44 देशों ने भाग लिया। इसी सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की नींव पड़ी। भारत और चीन भी इसके प्रथम सदस्यों में शामिल थे, लेकिन उस समय दोनों ही परतंत्र देशों की स्थिति में थे और संस्थाओं की संरचना मुख्यतः अमेरिका और इंग्लैंड के हितों के अनुरूप बनाई गई थी। इससे पहले तक वैश्विक मुद्रा व्यवस्था गोल्ड स्टैंडर्ड और ब्रिटिश पाउंड स्टरलिंग पर आधारित थी। नियम यह था कि जितनी विदेशी मुद्रा छपेगी, उतना सोना सरकार के पास भंडार में होना चाहिए। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन और यूरोप बुरी तरह टूट चुके थे। उनके पास न तो सोना बचा था और न ही पूंजी। इसके उलट अमेरिका सबसे धनी राष्ट्र बन चुका था और दुनिया का लगभग दो-तिहाई सोना उसके पास था। ब्रेटन बुड्स में यह तय हुआ कि अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ा जाएगा। 1 औंस सोना =35 डॉलर। साथ ही, बाकी देशों की मुद्राएं डॉलर से जुड़ेंगी। इस प्रकार विश्व पटल पर पहली बार डॉलर का उदय हुआ।
डॉलर का प्रभुत्व
1960 दशक तक आते-आते अमेरिका पर वियतनाम युद्ध और घरेलू सामाजिक कार्यक्रमों का भारी वित्तीय बोझ बढ़ा। डॉलर की छपाई तेज हो गई, लेकिन सोने का भंडार उतना नहीं बढ़ा। फ्रांस जैसे देशों ने डॉलर को सोने में बदलने की मांग शुरू कर दी। 15 अगस्त, 1971 को राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अचानक डॉलर को सोने से अलग कर दिया। इसे निक्सन शॉक कहा गया। इसके बाद डॉलर एक फिएट करेंसी बन गया, यानी जिसकी कीमत केवल सरकार और बाजार के भरोसे पर आधारित थी। हालांकि यह कदम डॉलर पर अविश्वास बढ़ाने वाला था, लेकिन दुनिया के पास विकल्प नहीं था। वैसे आई.एम.एफ. द्वारा एस.डी.आर. के रूप में एक मुद्रा जारी की गई, किंतु व्यापारिक लेन-देन में उसकी स्वीकार्यता नहीं बनी। अमेरिका की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी थी, व्यापार का केंद्र वहीं था और उसकी सैन्य शक्ति भी अद्वितीय थी। इसलिए डॉलर का प्रभुत्व बना रहा।
तेल और डॉलर का गठबंधन
1970 के दशक में अमेरिका ने सऊदी अरब और ओपेक देशों से यह समझौता किया कि तेल का व्यापार केवल डॉलर में होगा। इसके बदले अमेरिका ने मध्य-पूर्व की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली।
इस समझौते ने डॉलर को नई जान दी। चूंकि तेल हर देश की बुनियादी आवश्यकता है, इसलिए सभी देशों को तेल खरीदने के लिए डॉलर की आवश्यकता पड़ती थी। इसी कारण डॉलर की मांग लगातार बढ़ती रही और यह व्यवस्था ‘पेट्रोडॉलर सिस्टम’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। आज भी तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला, अनाज और धातुओं का अंतरराष्ट्रीय व्यापार लगभग पूरी तरह डॉलर में होता है। एक अध्ययन के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा अन्य लेन-देन डॉलर में ही होता है।

सोने में निवेश
1980 और 1990 के दशक में अमेरिका की वित्तीय बाजार प्रणाली (Wall Street, US Treasuries) ने डॉलर को सबसे सुरक्षित निवेश माध्यम बना दिया। आई.एम.एफ. और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में भी डॉलर का ही दबदबा रहा। 2000 तक दुनिया के विभिन्न लगभग 70 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में रखा जाने लगा। अंतरराष्ट्रीय ऋ ण, व्यापारिक अनुबंध और वैश्विक निवेश लगभग सभी डॉलर पर आधारित थे। किंतु पिछले 20-25 वर्ष में डॉलर का अनुपात विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में घटता जा रहा है और वर्तमान में यह सिर्फ 58 प्रतिशत ही रह गया है। वर्तमान में जैसे-जैसे डॉलर की साख गिरती जा रही है विश्व के अधिकांश केंद्रीय बैंक अमेरिकी ब्रांड बेचकर सोने में निवेश कर रहे हैं।
डॉलर से किनारा करने की लहर
चीन ने सीआईपीएस प्रणाली विकसित की है। वहीं ब्रिक्स देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार पर जोर दे रहे हैं। भारत ने रूस, श्रीलंका, मॉरिशस और यूएई जैसे देशों के साथ रुपए में व्यापार की व्यवस्था शुरू की है। भारतीय रिजर्व बैंक ने वोस्ट्रो एकाउंट के द्वारा रुपए में विदेशी व्यापार को बढ़ाने की नई नीति ग्रहण की है, साथ ही नेपाल, भूटान और श्रीलंका आदि पड़ोसी देशों के साथ विदेशी ऋण भी डॉलर में नहीं देकर रुपए में देना प्रारंभ कर दिया है, ताकि रुपए का ज्यादा से ज्यादा अंतरराष्ट्रीयकरण हो सके। सऊदी अरब और चीन ने तेल व्यापार का कुछ हिस्सा युआन में करने पर सहमति जताई है।
बहुध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था की ओर
डॉलर ने पिछले 80 वर्ष से वैश्विक रिजर्व मुद्रा की भूमिका निभाई है। लेकिन अब डॉलर से मुक्त होने की गति तेज हो रही है। अमेरिका स्वयं भी अपनी आंतरिक मौद्रिक नीति में परिवर्तन कर अपने ऋण को कम करने की चेष्टा में है। इधर क्रिप्टो करेंसी का षड्यंत्र चल रहा है जिससे विश्व को सावधान रहने की आवश्यकता है।


अमेरिका का बढ़ता ऋण
2025 तक राष्ट्रीय ऋ ण (अमेरिकी राष्ट्रीय ऋ ण) 37.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक पहुंच चुका है, जो अमेरिका की जीडीपी का लगभग 130 प्रतिशत है। 2024 में अमेरिका का व्यापार घाटा 1 ट्रिलियन डालर के आसपास रहा। केवल ऋ ण पर ब्याज भुगतान ही हर साल 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अमेरिका अपनी समृद्धि को बनाए रखने के लिए लगातार ऋ ण लेने और डॉलर छापने पर निर्भर है। यही कारण है कि दुनिया के कई केंद्रीय बैंक डॉलर पर भरोसा घटा रहे हैं और अपने भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की बढ़ती मांग
2022-24 के बीच वैश्विक केंद्रीय बैंकों ने रिकॉर्ड मात्रा में सोना खरीदा। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (डब्ल्यू.जी.सी.) के अनुसार 2023 में लगभग 1,100 टन सोना खरीदा गया, जो पिछले 50 वर्ष का सबसे बड़ा आंकड़ा है। सबसे अधिक सोना खरीदने वालों में चीन, भारत, तुर्की और रूस शामिल रहे। इसका कारण है डॉलर पर निर्भरता कम करना और अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित बनाना।

















