द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम ॥ ( ऋग्वेद ,1 /164 /33 ) अर्थात आकाश पिता है , समूचा वातावरण बंधु है और यह रत्नगर्भा पृथ्वी हमारी माता है।
वंदे मातरम्- भारत की चेतना का अमर उद्घोष। वह स्वर , वह गीत जो स्वतंत्र समर की आवाज बना ,चाहे वह जनजातीय आंदोलन हो या किसान आंदोलन या गांधीवादी आंदोलन। वन्दे मातरम की रचना बंकिम बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की, जिसका प्रकाशन 1882 में आनंदमठ उपन्यास में हुआ और शीघ्र ही यह भारत के जागरण का मंत्र बन गया। 1901 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में दक्षिणरंजन सेन ने जब पियानो की धुन पर यह भजन गाया, इसके बाद महात्मा गांधी ने ओपिनियन पत्रिका में यह प्रस्ताव रखा कि वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्रगान घोषित किया जाए। असहयोग, सविनय अवज्ञा, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन हर सत्याग्रही के होठों पर यही स्वर था। यही गीत उन बलिदानियों की अंतिम पुकार बना जिन्होंने फांसी के फंदे को चूमा रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ुल्ला ख़ाँ, भगत सिंह, राजगुरु, खुदीराम बोस, और अनगिनत अनाम क्रांतिकारी।
वंदे मातरम्’ का इतिहास : राष्ट्रभाव से राष्ट्रगीत तक
24 पक्तियों के इस छंद का पहला छंद मातृभूमि की प्राकृतिक गरिमा, सौंदर्य और समृद्धि का बखान करता है, दूसरे छंद में कवि ने मातृभूमि को सशक्त माता के रूप में चित्रित किया है जो अपनी सात करोड़ संतानों की सामूहिक शक्ति से शत्रुओं का संहार करती है। तीसरे और चौथे छंद में देवी माँ की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से की गई है — जो क्रमशः शक्ति, संपदा और ज्ञान की प्रतीक हैं। इस प्रकार, बंकिमचंद्र ने भारतमाता को न केवल भूमि के रूप में, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में भी चित्रित किया।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने सर्वप्रथम ‘वंदे मातरम्’ को गाया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता एक मुस्लिम नेता रहीमतुल्ला मोहम्मद सयानी ने की थी। इस गीत की प्रतिध्वनि दक्षिण तक पहुंची — तमिल कवि सुब्रमण्य भारती ने इसे तमिल में गाया, और पंतलु ने इसे तेलुगु में रूपांतरित किया। परंतु दुखद यह है कि समय के साथ राजनीति ने इस गीत को ‘तुष्टिकरण राग’ में बदल दिया। कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में जब प्रसिद्ध संगीतज्ञ पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने ‘वंदे मातरम्’ का गायन आरंभ किया, तो अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद जौहर अली ने आपत्ति जताई।1906 में मुस्लिम लीग के गठन के साथ ही यह विरोध संगठित रूप लेने लगा और कहा कि यह गीत एकेश्वरवाद के सिद्धांत के विपरीत है।
मौलाना आज़ाद, ने यह मध्य मार्ग सुझाया — “गीत के पहले दो पद पूर्णतः सांस्कृतिक और भौतिक वर्णन हैं; इन्हें राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।” 1937 में कांग्रेस ने आधिकारिक निर्णय लिया कि केवल पहले दो पद ही राष्ट्रगीत के रूप में मान्य होंगे।
मुस्लिम देशों में राष्ट्रप्रतीक और भारत में विरोध
इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़े मुस्लिम देश (87% आबादी) का राष्ट्रीय प्रतीक गरुड़ पंचशील है एवं उनकी मुद्रा नोटों पर गणेश की छवि है, और सरकार द्वारा “रामायण महोत्सव” हर वर्ष मनाया जाता है। तुर्की में तो राष्ट्रगान “इस्तिकलाल मार्शी” में मातृभूमि” के प्रति शपथ है। वहाँ की “अनवतन पार्टी” का अर्थ ही है “मातृभूमि पार्टी।” है। मिस्र के राष्ट्रीय प्रतीक स्फिंक्स और पिरामिड हैं,जो इस्लाम-पूर्व मूर्तियाँ हैं, पर उन्हें राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना गया है। मलेशिया में तमिल-हिंदू त्यौहार थाईपुसम राज्य-स्तरीय उत्सवों में मान्यता रखता है जबकि यूएई (— UAE (मुस्लिम-बहुल) में अब BAPS हिन्दू मंदिर अबूधाबी का उद्घाटन हुआ।
ऐसे अनेक उदहारण हैं, इस्लामी देश मिस्न के राष्ट्रगीत में भी धरती माता है। मालदीव के राष्ट्रगीत में कई बार सलाम है। जार्डन में बादशाह को सलाम है।विभिन्न देश जैसे चीन एवं रूस , जर्मनी आदि अपने देश को मातृभूमि या पितृभूमि कहते है ।
संविधान सभा में ‘वंदे मातरम्’ पर बहस (1948–1950)
संविधान सभा में भी अनेक सदस्य चाहते थे की वनडे मातरम को राष्ट्र गान बनाया जाये लेकिन विवाद की स्थित को देखते हुए माध्यम मार्ग अपनाया गया और 24 जनवरी 1950 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की कि “जन गण मन” भारत का राष्ट्रगान होगा। ‘वंदे मातरम्’, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे समान सम्मान दिया जाएगा।
42 वे संविधान संशोधन मे भी नहीं मिला सम्मान
अनुच्छेद 51A(a) का वास्तविक पाठ- “प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।” इसमे राष्ट्रगीत अर्थ वंदे मातरम का उल्लेख नहीं किया गया , क्या समस्या थी , वास्तव मे ये राष्ट्र की आत्मा के साथ खिलवाड़ है ?
वंदे मातरम् का अपूर्व योगदान — पर अधूरा सम्मान
महात्मा गांधी ने कहा — “इस गीत ने लाखों को मृत्यु से नहीं, निर्भयता से जोड़ा।” लेकिन विडंबना यह रही कि जिस गीत ने “आज़ादी” को जन्म दिया, उसे “आज़ाद भारत” में कानूनी दर्जा नहीं मिला। संविधान ने सम्मान दिया, पर दर्जा नहीं , हमारे मूल कर्तव्यों (अनुच्छेद 51A) में “राष्ट्रगान” और “राष्ट्रध्वज” का उल्लेख है, पर “राष्ट्रगीत” का नहीं।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती— इतिहास का अवसर
यह वह अवसर है जब भारत सरकार और संसद को चाहिए कि वह कि वंदे मातरम्’ को केवल “समान सम्मान” नहीं, बल्कि “संवैधानिक दर्जा” मिले । अनुच्छेद 51A(a) में संशोधन कर “राष्ट्रगीत” शब्द जोड़ा जाए। इतिहास की पुस्तकों में वन्दे मातरम के महत्त्व को बताया जाये, वन्दे मातरम दिवस , निबंध , गीत आदि प्रतियोगिता आयोजित की जाये। संसद और राज्य विधानसभाओं के सत्र की शुरुआत “वंदे मातरम्” के साथ की जाए। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में इसे औपचारिक गीत के रूप में स्थान दिया जाए। सोशल मीडिया पर “#VandeMataramReborn” जैसे सांस्कृतिक अभियानों के माध्यम से युवाओं में इसकी पहचान पुनः जगाई जाए।
यह केवल गीत नहीं, राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है
अब समय है — वंदे मातरम् को उसका हक मिले, 2025 की यह 150वीं जयंती एक ऐतिहासिक पुनर्पाठ का अवसर है जिस गीत ने आज़ादी दी, उसे आज़ादी के भारत में संविधानिक स्थान मिलना ही चाहिए। मौलाना आज़ाद ने लिखा था, ”वन्दे मातरम् गीत भारत की राष्ट्रीय स्मृति है। कोई भी भारतीय, हिंदू या मुस्लिम, इसके प्रति उदासीन नहीं रह सकता।” और यही सत्य है वंदे मातरम् केवल एक समुदाय का चमत्कार नहीं, यह भारत का सामूहिक आख्यान है। 2025 में इस गीत की 150वीं जयंती है, यह वर्ष केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मस्मरण का अवसर है। भारत को अब यह घोषित करना चाहिए कि “वंदे मातरम् केवल राष्ट्रगीत नहीं, राष्ट्र की आत्मा का अमर स्वर है।”

















