कार्तिक पूर्णिमा: गुरु नानक देव का नर्मदा-ताप्ती प्रवास, एक ओंकार का उद्घोष
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होम भारत

कार्तिक पूर्णिमा और गुरुनानक जयंती पर विशेष: गुरु नानक देव का नर्मदा-ताप्ती प्रवास और एक ओंकार का उद्घोष

गुरुनानक जी की इस यात्रा का उद्देश्य इस विशाल क्षेत्र में निवासरत नगरीय, ग्राम्य व वनवासी बंधुओं में धर्म जागरण का था।

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 3, 2025, 06:00 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति
श्रीगुरु नानकदेव जी

श्रीगुरु नानकदेव जी

भारत में उन दिनों विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं का बोलबाला था। हिंदू धर्मस्थानों को नेस्तनाबूद करने के अभियान चल रहे थे। मुगल शासन बस प्रारंभ होने को था। मुगलों के पूर्व दिल्ली में सैयद वंश और इसके पूर्व इब्राहिम लोदी, शेरशाह सूरी का क्रूर शासन था। महमूद गजनी, मोहम्मद गजनवी की लूट-खसोट को भारत भोग चुका था। कन्वर्जन के दीर्घ चक्र चल चुके थे। हिंदुत्व की हानि का कालखंड था। इस मध्य गुरुनानक देव स्वधर्म, हिंदुत्व के रक्षार्थ अपनी विशिष्ट शैली में अभियान चलाये हुए थे। इस अभियान के अंतर्गत ही वे सुदूर पंजाब से लेकर मध्यभारत में सतपुड़ा के गहन-सघन वनों के मध्य, खूब भीतरी ग्रामों तक में स्वधर्म प्रेम की अलख जगा रहे थे। इसी क्रम में वे ताप्ती तट भी आए थे।

वर्ष 1515 में अपनी प्रथम धर्म जागरण यात्रा के अंतर्गत गुरु नानक देव जी भारत भ्रमण करते हुए और समूचे देश के सनातनियों, हिंदुओं को अपने धर्म के प्रति जागृत करते हुए सतपुड़ा के अंचल में स्थित बैतूल जिले में भी आए थे। मध्यप्रदेश की उनकी यह यात्रा एक छोर चंबल से प्रारंभ होकर दूसरे छोर मुलताई तक संपन्न हुई थी। गुरुनानक जी की इस यात्रा का उद्देश्य इस विशाल क्षेत्र में निवासरत नगरीय, ग्राम्य व वनवासी बंधुओं में धर्म जागरण का था। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा इस क्षेत्र में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों से चिंतित गुरु नानक देव ने अपनी इस धर्म केंद्रित यात्रा अभियान को प्रारंभ किया था। उन्होंने अपने जीवन काल में समूचे भारत में ऐसी तीन यात्राएं की थीं। इस दौरान उन्होंने कुल अस्सी हजार किलोमीटर की यात्रा की थी।

गुरुनानक देव उस कालखंड में भारतीय संस्कृति पर मुस्लिम आक्रांताओं के बढ़ते प्रहार, कन्वर्जन, विदेशी लूट, समाज में जाति-पाति के बंधन, सामाजिक समरसता व विभिन्न कुप्रथाओं को लेकर चिंतित हो उठे थे। सनातन की तो प्रवृत्ति ही रही है कि कालांतर में उपज गई विभिन्न सामाजिक व धार्मिक कुप्रथाओं का उन्मूलन करना व स्वयं का संवर्द्धन करना। संत गुरुनानक भी हिंदू समाज के इसी सनातनी धर्म का गुण पालन करने निकले थे।

गुरु नानक देव जी की पहली यात्रा 1507 से 1515 तक चली थी, दूसरी यात्रा 1517 से 1518 तक एवं तीसरी यात्रा 1518 से 1521 तक चली थी। इन यात्राओं में महान संत गुरुनानक देव जी ने भारतीय समाज में आई विभिन्न प्रकार की बुराइयों का उन्मूलन आग्रह किया। विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध समाज को जागृत किया और उनमें आत्माभिमान का संचार किया और हिंदुत्व को लेकर एक नव चिंतन समाज के समक्ष प्रस्तुत किया था।

संत शिरोमणि गुरु नानक देव जी अपनी इन तीन में से सबसे पहली यात्रा में ही मुलताई भी आए थे। इस यात्रा में ग्वालियर होते हुए भोपाल आए, जहां एक टेकड़ी पर अपना डेरा डाला। नर्मदापुरम में नर्मदा जी के तट पर भी रुके थे और वहां संतों के साथ सत्संग, चर्चा आदि करते हुए हिंदुत्व के संदर्भ में अपनी चिंताओं को प्रकट किया था। नर्मदापुरम में आज भी संत गुरुनानक जी के आगमन की कथा इतिहास लिखित है और उस स्थान पर गुरुद्वारा भी बना हुआ है। नर्मदापुरम के पश्चात् वह जबलपुर होते हुए अमरकंटक, मयार, गाडरवाड़ा, हरदा, खंडवा, ओंकारेश्वर, सोहागपुर गये। फिर वहां से मुलताई आये थे। यहां से पांढुर्णा से नागपुर, अमरावती होते हुए आगे दक्षिण की ओर प्रस्थान कर गए थे।

ताप्ती जी के मार्ग में गुरुनानक देव का ग्वालियर प्रवास

धर्म जागरण हेतु अपनी इस प्रथम सुदीर्घ यात्रा में गुरु नानक देव जी सुदूर पंजाब से निकलकर अभियान को परवान चढ़ाते हुए मध्यप्रदेश आए थे। चंबल के भीषण, भयंकर बीहड़ों को पार करते हुए वे ‘माँ ताप्ती तट’ की ओर बढ़ रहे थे। चंबल नदी को पार करके मध्यप्रदेश में सर्वप्रथम ग्वालियर में डेरा डाला। ग्वालियर रियासत में फूलबाग में विश्राम किया और यहां रुक कर धर्म जागरण का कार्य किया था। ग्वालियर में गुरुनानक देव जी के प्रवास वाले इस स्थान पर ही आज फूल बाग गुरुद्वारा साहिब अपनी ‘सिक्ख’ ‘खालसा’ ‘हिन्द की चादर’ का अपना संदेश देता हुआ स्थापित है।

दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा की महिमा

छठवें सिक्ख गुरु हरगोविंद सिंह ने भी इस स्थान पर गुरुनानक देव जी का प्रवास होने के कारण इसे अपना महत्वपूर्ण केंद्र माना था। गुरु हरगोविंद सिंह द्वारा ग्वालियर को महत्वपूर्ण केंद्र मानने का ही परिणाम था कि ग्वालियर के किले में ऊपर पहाड़ी पर ‘गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़’ स्थापित हुआ। गुरु हरगोविंद साहेब कुशल, वीर योद्धा थे। शास्त्राओं के वे मर्मज्ञ थे व शस्त्रों के मध्य ही खेले, पले व बड़े हुए थे। गुरुनानक देव जी की ‘स्वधर्म’ की चिंताओं से सरोकार रखते हुए मुगलों के विरुद्ध बड़ा संघर्ष किया था। क्रूर विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी जहागींर ने उनके विरुद्ध कई अभियान चला दिए थे। उनके संघर्ष की एक बड़ी सुदीर्घ गाथा है। गुरु हरगोविंद जी ने जहांगीर द्वारा बंदी बनाए 52 हिंदू राजाओं को छुटकारा दिलवाया था। इसलिए ही उनके नाम पर ग्वालियर का गुरुद्वारा ‘दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारे’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ है।

गुरुनानक जी का इंदौर प्रवास

सुदूर पंजाब से ताप्ती जी की ओर बढ़ते हुए गुरुनानक देव जी इंदौर आए। इंदौर का ‘बेटमा गुरुद्वारा’ गुरु नानक जी की इंदौर यात्रा की स्मृति में ही निर्मित कराया गया था। जब बेटमा नामक इस स्थान पर गुरुनानक देव जी आए तब उन्होंने देखा कि वहां खारे पानी का कुआं है। उनके श्रद्धालु भक्तों ने उन्हें बताया कि उन्हें पेय जल व अन्य कार्यों हेतु जल की बड़ी समस्या है। यह सुनकर गुरुनानक जी ने एक मंत्र पढ़ा और समूचा कुआं मीठा भी हो गया था व पानी से लबालब भी हो गया था। इंदौर में यशवंत रोड चौराहा स्थित एक और ‘गुरुद्वारा इमली साहिब’ भी है। यह गुरुद्वारा भी ऐतिहासिक रूप से गुरुनानक देव जी की यात्रा से संबद्ध है। बाद में इंदौर से अन्य सिक्ख गुरुओं का भी अपना एक विशिष्ट प्रकार का सम्बन्ध रहा है, जिसके चलते उन्होंने यहाँ नाना प्रकार के सैन्य व सामाजिक अभियान चलाए थे।

गुरुनानक देव का ओंकारेश्वर प्रवास और एक ओंकार का उद्घोष

ताप्ती जी की ओर बढ़ते हुए ही गुरुनानक देव जी का ओंकारेश्वर प्रवास हुआ था। ओंकारेश्वर 12 ज्योतिर्लिंगों में एक है। गुरुनानक जी ने यात्रा में ओंकारेश्वर में विश्राम किया था। यहां नर्मदा में स्नान कर नर्मदा जी का अभिषेक और पूजन किया। नर्मदा जी के पूजन पश्चात् उन्होंने ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए थे व नर्मदा जी के जल से उनका अभिषेक कर स्वयं को बड़भागी व तृप्त आभास किया था।

गुरुनानक जी ने यहां भी स्थानीय निवासियों, ओंकारेश्वर के पुजारियों व संतों से धर्म की हो रही हानि पर चर्चा की थी। उन्होंने यहां स्वधर्म के पालन का संदेश दिया था व विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध अपना अलख यहां भी जगाया था। बड़ी संख्या में मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट करने, उन्हें लूटने के विरुद्ध अलख जगाते हुए ही गुरुनानक जी ने यहां ‘एक ओंकार’ का अविस्मरणीय उद्घोष किया था। सिक्ख समुदाय में ओंकारेश्वर स्थान से ही ‘एक ओंकार’ का समावेश हुआ था। इसी स्थान पर इस उद्घोष के साथ उन्होंने प्रवचन दिया था जिसे ‘दखनी ओंकार’ के नाम से संग्रहित किया था।

ताप्ती जी के मार्ग में गुरुनानक जी का रायसेन एवं भोपाल प्रवास

ग्वालियर में रायसेन के राजा कस्तूर अली से भेंट करते हुए और उसे कुछ सीख देते हुए वे आगे बढ़े थे। कस्तूर अली वहाँ के हिंदू मंदिरों को तोड़ने व धर्मांतरण के कार्य में लगा था। कस्तूर अली से गुरुनानक देव अत्यंत नाराज थे अतः उन्होंने इस राज्य में चौदह दिनों तक डेरा डाले रखा। दो सप्ताह तक यहां रुककर उन्होंने विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक विषयों का समाधान किया। रायसेन की प्रजा एवं वहां के मुस्लिम शासक कस्तूर अली के मध्य समन्वय बनाया और तब वे आगे बढ़े थे।

रायसेन के पश्चात् संत गुरुनानक जी सुलेमान नगरी में प्रवास करते हुए भोपाल आ गए थे। भोपाल के नवाब ने उन्हें ससम्मान अपने महल में आमंत्रित किया किंतु जिस उद्देश्य से वह यह यात्रा कर रहे थे उसमें नवाब के महल में निवास करना उनके लिए अनुचित था। इस बात को समझते हुए उन्होंने भोपाल के मुस्लिम शासक का आमंत्रण अस्वीकार कर दिया। गुरुनानक देव ने अपने संत वृंद के साथ भोपाल के पास एक बड़ी सी टेकड़ी पर डेरा डाला था। यहीं पर रहते हुए उन्होंने धर्मांतरण व हिंदू मंदिरों की तोड़-फोड़ व लूट के विरुद्ध क्रूर नवाब को चेताया था।

‘गुरुद्वारा बावली साहिब’

भोपाल में गुरुनानक देव के टिकाणे वाली इस टेकड़ी को ही आज ईदगाह हिल्स के नाम से जाना जाता है। यहां इस टेकड़ी पर गुरुनानक देव के पास प्रवास के मध्य कोई गणपत नाम का व्यक्ति आया था, वह कोढ़ रोग से ग्रस्त था। संत नानक जी तो अनेक चमत्कारिक शक्तियों से संपन्न थे, उन्होंने इस टेकड़ी पर बनी हुई एक बावड़ी (जल सरंचना) से जल लिया और उस पर छिड़क दिया था। वह गुरुनानक जी के स्पर्श वाले इस जल से तत्काल ही कोढ़मुक्त हो गया था। इसके बाद तो जैसे इस टेकड़ी पर श्रद्धालुओं का तांता ही लग गया था। लाखों की संख्या में में श्रद्धालु संत नानक जी के पास आने लगे व अल्प समय में ही यह टेकड़ी नानक टेकड़ी के नाम से पहचानी जानी लगी थी। उनके प्रवास स्थान व उस बावड़ी के स्थान पर बने हुए गुरुद्वारे को आज भी ‘गुरुद्वारा बावली साहिब’ के नाम से जाना जाता है।

नानक टेकड़ी पर पड़ी मुगलों की कुदृष्टि

कालांतर में भारत में मुगलों का कुशासन आया और ‘नानक टेकड़ी’ नाम वाले इस स्थान पर उनकी कुदृष्टि पड़ गई थी। तब इस स्थान को ईदगाह के रूप में प्रयोग करके इसे ‘ईदगाह हिल्स’ का नाम दे दिया गया था। वस्तुतः तो यह स्थान ‘नानक टेकड़ी’ ही है। संत नानक जी जब भोपाल आए थे तब वहां के नवाब ने तब चहुंओर हिंदू विरोधी वातावरण बना रखा था। धर्मांतरण का एक बड़ा कुचक्र चल रहा था। नवाब भोपाल के सरंक्षण में आस-पास की छोटी-छोटी रियासतों के प्रमुख व कट्टर, आक्रांता सेनापति हिंदू मंदिरों को लूटकर नेस्तनाबूद करने के अभियान में रात-दिन लगे हुए थे। हिंदू माता-बहिनों के साथ अत्याचार की पराकाष्ठा हो रही थी। उनके अपहरण, बलात्कार, चीर हरण, शील भंग, जबरन निकाह के किस्से कदम-कदम पर हो रहे थे।

हिंदुत्व की यह सब धर्म की हानि के समाचार सुन-सुनकर ही गुरुनानक देव जी सुदूर पंजाब से इस क्षेत्र में प्रवास कर रहे थे। हिंदुत्व की चिंता व सुरक्षा हेतु उन्होंने अपनी इस यात्रा में भोपाल नगरी में दो माह तक प्रवास किया था। इस मध्य उन्होंने समूचे हिंदू समाज में जागरण का कार्य किया व भोपाल नवाब को भी चेताया था। इसके पश्चात् वे माँ ताप्ती की नगरी मूलतापी की ओर आगे बढ़ गए थे।

ताप्ती जी के मार्ग में गुरुनानक देव जी का नर्मदापुरम प्रवास

भोपाल में दो माह धर्म जागरण करने के पश्चात् संत शिरोमणि नानक जी होशंगाबाद आए। होशंगाबाद का राजा, मुस्लिम आक्रांता हुशंगशाह हुआ। यही मालवा का भी राजा था। मालवा के पश्चात् इस क्रूर मुस्लिम शासक ने नर्मदापुर पर भी बलात् कब्जा कर लिया था।

नर्मदापुर में गुरु नानक देव जी के आगमन व वहां उनके डेरा डालने का समाचार सुनकर हुशंगशाह चिंतित हो उठा और दौड़ा-दौड़ा नर्मदापुर चला आया। आया तो वह गुरु जी का डेरा उठाने के लिए था किंतु जब उसने यहां गुरु नानक देव जी के प्रति लाखों लोगों का श्रद्धापूर्ण आना-जाना देखा तो उसने मन मसोसकर अपने इरादों को दबाया। उसने स्थिति को भांपा और तत्काल ही रणनीति बदलते हुए स्वयं भी इन संत शिरोमणि गुरु नानक जी का शिष्य बनने का चोला पहन लिया था। यद्यपि हुशंगशाह का गुरुनानक जी के प्रति व्यक्त किया गया सम्मान एक नौटंकी ही था। वह तो किसी भी प्रकार से यही चाहता था कि गुरुनानक देव यहां अपने ‘हिंदुत्व की रक्षा का संदेश’ ‘स्वधर्म का संदेश’ व ‘एक ओंकार’ का बंद करें व वहाँ से प्रस्थान कर जाएँ।

हुशंगशाह ने गुरु जी को अपने महल में ससम्मान आमंत्रित भी किया था किंतु यहाँ भी संत नानक जी ने उस विदेशी आक्रांता के महल में रुकना उचित नहीं समझा था। गुरु नानक जी ने हुशंगशाह के महल में निवास के आमंत्रण को ससम्मान अस्वीकार किया और मां नर्मदा के तट पर स्थित मंगलवारा घाट पर बनी एक छोटी सी झोपड़ी में निवास किया था।

गुरुनानक देव ने हुशंगशाह को हिंदू विरोधी कार्यों के प्रति आगाह किया

गुरुनानक देव जी ने हुशंगशाह को उसके हिंदू विरोधी कार्यों के प्रति आगाह किया था। उन्होंने यहां एक सप्ताह रुककर विभिन्न विषयों में हुशंगशाह से सहमतियां करवाई थी। इस विदेशी आक्रांता ने अभिनय पूर्ण शैली में गुरुनानक देव को संतुष्ट किया जिसके बाद गुरुनानक जी होशंगाबाद (आज का नर्मदापुरम) से आगे बढ़ गए थे।

गुरुनानक देव जी की रायसेन, भोपाल एवं होशंगाबाद की यह धर्म यात्रा अत्यधिक प्रसिद्ध, प्रभावी, प्रखर व प्रचंड रही थी। इस यात्रा का ही प्रभाव था कि जब वे नर्मदापुरम में आकर रुके थे तब उनके पीछे-पीछे हजारों की संख्या में रायसेन व भोपाल के अनुयायी भी नर्मदापुरम तक आए थे। उनके अनुयायियों ने बाद में इस यात्रा की स्मृति स्वरूप गुरु नानक जी की वाणी को व गुरु ग्रंथ साहिब को सच्चे स्वर्ण की स्याही बनाकर लिखा था व उसे देव स्वरूप मानकर यहाँ एक मंदिर में श्रद्धापूर्वक विराजित किया था।

आज भारत में सिक्ख समुदाय के जो पांच सबसे बड़े तीर्थ हैं, केवल वहीं पर स्वर्णिम स्याही से लिखे हुए गुरु ग्रंथ साहिब विराजित हैं। इस क्रम में स्वर्णिम स्याही वाले गुरु ग्रंथ साहिब का छठा स्थान नर्मदापुरम है।

नर्मदापुरम के साथ गुरुनानक देव जी की एक और चमत्कारिक कथा जुड़ी हुई है। वर्ष 1973 में जब यहां बाढ़ आई थी तब मंगलवारा क्षेत्र के पास नर्मदा जी में एक बक्सा बहते-बहते किनारे आ टिका था। जब इस बक्से को खोला गया तो इसमें से गुरुग्रंथ साहिब थे। इसके पश्चात् बाढ़ में बहकर आए बक्से से निकले इस ग्रंथ को ससम्मान यहां स्थित गुरुद्वारे में विराजित कराया गया था।

होशंगाबाद के बाद गुरु जी जबलपुर होते हुए अमरकंटक एवं फिर मयार गये थे। इसके बाद वे गाडरवाड़ा आए थे। गाडरवाड़ा में उन्होंने देवकीनंदन पंढरी के निवास पर विश्राम किया। इसके पश्चात् वे सोहागपुर गांव में आए थे। गुरुनानक देव जी को इस क्षेत्र में विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा की जा रही धर्म की हानि ने अत्यधिक चिंतित कर दिया था। हिंदुत्व की होती हुई हानि के प्रति उनकी चिंता का परिणाम था कि वे सोहागपुर में लगभग साढ़े पांच माह तक रुके रहे। इसके पश्चात् उन्होंने अपने लक्ष्य मां ताप्ती के तट की ओर मुलताई हेतु प्रस्थान किया था। इस दीर्घ अंतराल में इस महान संत ने इस क्षेत्र में धर्म की नई अलख जगा दी थी जिसका परिणाम लंबे समय तक हमें मिलता रहा था।
(दीवाने नवाब, भोपाल स्टेट, दूसरा भाग, 13.08.1857 (दूसरा भाग), नगरपालिका, भोपाल स्टेट 05.06.1902, के नक्शा के सातवें भाग, 21.1958 में यह संत जी के प्रवास का उल्लेख वर्णित है।)

गुरुनानक देव जी का मुलतापी में ताप्ती उद्गम पर आगमन

जपु जी साहिब गुरुनानक देव जी की एक बड़ी ही प्रातः स्मरणीय व पूजनीय कृति है। जपु जी साहिब में एक गुरुनानक जी द्वारा लिखित एक दोहा आता है –
पऊणु गुरु पाणी पिता माता धरती महतु।
दिवस रात दुई दाई दाइआ खेले सगलु जगतु।।

संभवतः यह दोहा गुरुनानक जी ने माँ ताप्ती के तट पर बैठकर तापी जी के दर्शन करते हुए ही लिखा होगा। इस दोहे का अर्थ है – हवा गुरु है, पानी पिता है, और धरती महान माता है। दिन और रात दो धाए हैं या ध्रुव हैं जिनसे इस समूचे जगत का पालन पोषण होता है व मानवीय चक्र घूमता है। गुरुनानक जी का यह दोहा हमें सनातनी चिंतन में चिर स्थायी रहे पर्यावरण सरोकारों व प्रकृति की रक्षा का संदेश देता है।

बैतूल आकर वे मुलताई ग्राम में ताप्ती के तट पर विराजे। यहां के निवासियों के मध्य उन्होंने सत्संग किया था व अपनी वाणी का अमृतपान यहां के निवासियों को कराया था। ताप्ती तट पर सतपुड़ा अंचल के निवासियों ने भी गुरु नानक देव जी का हृदय की गहराइयों से स्वागत-सत्कार, आदर-सम्मान, पूजन किया था व गुरुवाणी को सुना था। गुरुनानक जी ताप्ती तट पर इतने रम गए थे व यहां आकर उन्हें इतनी आध्यात्मिक शांति का भान हुआ था कि वे पूरे चौदह दिन तक ताप्ती उद्गम पर साधना की थी। ताप्ती जी के तट पर गुरुनानक देव जी और दीर्घ समय तक रुकना चाहते थे किंतु उनके धर्म जागरण के अभियान में आगे के पड़ावों से ऐसे चिंताजनक समाचार मिल रहे थे कि अपना मुलतापी प्रवास संक्षिप्त करना पड़ा था।

मुलताई में गुरुनानक देव जी प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में ताप्ती का पूजन, स्तवन, अभिषेक, आव्हान करते। ब्रह्म मुहूर्त से सूर्य निकलते तक और फिर दोपहर होते तक उनका माँ ताप्ती पूजन चलता। इस मध्य वे स्थानीय निवासियों के मध्य सत्संग प्रवचन करते रहते थे। उनके प्रवचनों में स्वदेश, स्वधर्म, स्वशासन हेतु संदेश स्पष्टतः प्रकट होते थे। वे निडर, निर्भय, और शक्तिशाली संत थे। उनकी इस निडरता व धर्म के प्रति गर्दन तक कटवा लेने के संकल्प के कारण ही लोग बड़ी संख्या में उनके प्रवचनों में सम्मिलित होते थे।

जब मुलताई में शुरू हुआ कार्तिक मेला

गुरुनानक देव जब मुलताई आए थे तब कार्तिक मास चल रहा था। सतपुड़ा के गहन वनों वाले अंचल में बसे इस क्षेत्र में तब शीत बहुत अधिक पड़ा करती थी। यहाँ अभी वर्तमान में भी कार्तिक मास का ब्रह्म मुहूर्त और प्रातःकाल ठंड को ओढ़े रहता है, किंतु उस समय तो भीषण ठंड पड़ा करती थी। उस भीषण ठंड में भी गुरुनानक देव ब्रह्म मुहूर्त में ही अपने हजारों अनुयायियों के साथ ताप्ती जी में स्नान व तत्पश्चात् पूजन-अर्चन किया करते थे। हजारों की संख्या में यहां के निवासी उनके अनुयायी बनने लगे और ताप्ती तट पर आने लगे। उनकी ख्याति सुनकर मुलताई में उन दो सप्ताहों में मेला सा लग गया था। इस प्रकार वर्ष 1515 के कार्तिक मास का वह कृष्णपक्ष मुलताई के लिए सदा-सदा के लिए अविस्मरणीय हो गया। गुरुनानक देव जी द्वारा तबसे प्रारंभ माँ ताप्ती की कार्तिक मास में पूजन का यह क्रम आज भी चल रहा है। ताप्ती जी के तट पर कार्तिक मास का यह मेला आज भी अनवरत लगता है।

सिक्ख समुदाय में मुलताई महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ताप्ती तट पर बने गुरुद्वारे को सिक्ख धर्म अपने पवित्र स्थानों की सूची में चौदहवें स्थान पर आज भी रखे हुए है। सिक्ख समुदाय ताप्ती जी के तट पर स्थित इस स्थान को अपना श्रद्धास्थल मानता है। देश के कोने-कोने से गुरु नानक देव के व श्रीचन्द्र देव के भक्त आज भी मुलताई व जौलखेड़ा स्थित मठ में आते हैं व ताप्ती जी के जल का आचमन करते हैं।

सुदूर पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान वाला पंजाब) से हजारों किलोमीटर चलकर सतपुड़ा के घने जंगलों में आते तक गुरु नानक देव को संभवतः किसी भी स्थान ने इतना नहीं मोहा जितना उन्हें ताप्ती तट ने मोहा था। गुरुनानक देव जी जैसे महान, पूज्य, आध्यात्मिक शक्ति का ताप्ती जी के प्रति इतने सम्मान व श्रद्धापूर्वक चौदह दिनों का प्रवास हमें बताता है कि उनके हृदय में ताप्ती जी का स्थान कितना पूजनीय व वंदनीय था।

गुरुनानक देव जी के माँ ताप्ती जी के प्रति समर्पण, श्रद्धा व आस्था की यह सच्ची कथा यहीं समाप्त नहीं होती है। उन्होंने ताप्ती जी से विदा लेने के पश्चात् भी माँ ताप्ती के प्रति अपनी श्रद्धा को अपने हृदय में एक पवित्र ज्योति की भाँति प्रज्जवलित रखा था। ताप्ती जी का ध्यान, पूजन उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या में आवश्यक रूप से सम्मिलित रहता था। वे किसी न किसी प्रकार से मुलताई क्षेत्र के संपर्क में रहते थे व यहां के हाल-चाल जानते रहते थे।

श्रीचन्द्र देव को भी मुलताई भेजा

गुरुनानक देव जी की ताप्ती जी के प्रति श्रद्धा की कहानी केवल यहीं आकर नहीं रुकी। यह कथा उनकी अगली पीढ़ी तक भी आगे बढ़ी थी, और फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी या यूँ कहें कि सिक्ख समुदाय की गद्दी-दर-गद्दी चलती रही है। इसी क्रम में गुरुनानक देव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीचन्द्र देव को भी मुलताई भेजा था।

मुलताई में ताप्ती जी की शरण में आ विराजे और धर्म की अलख जगाने वाले श्रीचन्द्र देव उदासीन (सन्यासी प्रवृत्ति) संप्रदाय के संस्थापक गुरु थे। वे सूर्य, शिव, गणेश, देवी शक्ति के आराधक थे। श्रीचन्द्र देव ने भी अपने 134 वर्षीय दीर्घ जीवन का एक बड़ा कालखंड ताप्ती जी के तटों पर विचरण करते हुए व्यतीत किया। श्रीचन्द्र देव के प्रति केवल बैतूल जिले के ही नहीं अपितु समूचा सतपुड़ा अंचल, मध्यभारत, विदर्भ और मराठवाड़ा तक के निवासी श्रद्धा रखते थे। सुदूर महाराष्ट्र व दक्षिण तक से उनके अनुयायी यहाँ उनके दर्शनार्थ आया करते थे।

ताप्ती अंचल में, तापी उद्गम के समीप ही बसे हुए ग्राम जौलखेड़ा में आज भी भगवान श्रीचन्द्र देव का एक मंदिर बना हुआ है। आज भी इस मंदिर में श्रीचन्द्र देव की श्रद्धापूर्वक, विधिवत् पूजा, पाठ, अर्चना, आराधना की जाती है।

ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज

ऐतिहासिक अभिलेखों में गुरुनानक देव का मुलताई आगमन इस प्रकार दर्ज है – दस्तावेजी नकल हवाला न. 149112 बटा बी 4, दिनांक सात सात उन्नीस सौ निन्यानवे, ब्रिटिश नक़्शा दिनांक तेरह अगस्त अट्ठारह सौ सत्तावन (दूसरा भाग), दीवाने नवाब भोपाल स्टेट, दिनांक पाँच जून उन्नीस सौ दो, नगर पालिका का नक़्शा सातवाँ भाग 21-1958 के अनुसार मध्यप्रदेश में श्री गुरुनानक तपस्वी का दौरा में वर्णन है कि, वर्ष पंद्रह सौ चौदह की फरवरी में गुरूनानक देव जी मध्यप्रदेश में आए थे। वे मध्यप्रदेश में वे सर्वप्रथम ग्वालियर आए और फिर वहाँ से आगे बढ़े थे।

इस प्रकार गुरुनानक देव जी का मध्यप्रदेश प्रवास मध्य प्रदेश के एक छोर चंबल नदी से लेकर दूसरे छोर मूलतापी के माँ ताप्ती नदी के उद्गम तक सम्पन्न हुआ था।

Topics: गुरु नानक देवकार्तिक पूर्णिमापाञ्चजन्य विशेषगुरुनानक जयंतीगुरु नानक देव नर्मदा ताप्ती प्रवासएक ओंकार का उद्घोष
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
मूलतः मध्य प्रदेश के बैतूल से हैं. छह पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. 'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित. कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित. विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं. [Read more]
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