पादरियों को गांवों में आने से रोकने वाले होर्डिंग असंवैधानिक नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला
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पादरियों को गांवों में आने से रोकने वाले होर्डिंग असंवैधानिक नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर भी जोर दिया कि कैसे ईसाई मिशनरियों ने गरीब और अशिक्षित लोगों को अवैध कन्वर्जन के लिए निशाना बनाया। कोर्ट ने माना कि कन्वर्जन गरीब समाज में विभाजन और सांस्कृतिक दबाव पैदा करते हैं।

Written byसुनीता मिश्रासुनीता मिश्रा — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 2, 2025, 05:36 pm IST
inभारत, छत्तीसगढ़
कोर्ट का फैसला (प्रतीकात्मक चित्र)

कोर्ट का फैसला (प्रतीकात्मक चित्र)

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कांकेर जिले के आठ गांवों में जनजातीय समुदाय को जबरन, धोखे से कराए जा रहे कन्वर्जन से बचाने के लिए लगाए गए होर्डिंग को असंवैधानिक नहीं माना है। उच्च न्यायालय ने मंगलवार (28 अक्टूबर) को जबरन कन्वर्जन के विरोध पर सहमति जताते हुए इसे गंभीर चिंता का विषय बताया और कहा, “जनजातीय लोगों को जबरन, धोखाधड़ी से कराए जा रहे कन्वर्जन के प्रति आगाह करने वाले होर्डिंग्स लगाना कहीं से भी ‘असंवैधानिक’ नहीं हो सकते।”

अदालत ने कांकेर जिले के गांवों से ऐसे होर्डिंग्स को हटाने की मांग वाली याचिका का निपटारा करते हुए अपने फैसले में कहा कि होर्डिंग्स जनजातीय समुदाय के सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए लगाए गए हैं। उच्च न्यायालय ने इस बात पर भी जोर डाला कि कैसे ईसाई मिशनरियों ने गरीब और अशिक्षित लोगों को अवैध कन्वर्जन के लिए निशाना बनाया। कोर्ट ने माना कि कन्वर्जन गरीब समाज में विभाजन और सांस्कृतिक दबाव पैदा करते हैं।

‘सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए उठाए गए कदम’

दरअसल, कांकेर निवासी दिगबाल टांडी ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उसने ईसाइयों को ग्रामीणों से अलग करने का आरोप लगाया था। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि कुदल, पारवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हबेचुर, मुसुरपुट्टा और सुलागी सहित कई जनजातीय गांवों में लगाए गए होर्डिंग को असंवैधानिक घोषित किया जाए और उन्हें तत्काल हटाने का आदेश दिया जाए। साथ ही याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि ये होर्डिंग्स पादरियों और कन्वर्ट ईसाइयों के गांवों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाते हैं और उनके साथ भेदभाव करते हैं। इससे ईसाई समुदाय में डर का माहौल पैदा हो गया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि होर्डिंग्स संबंधित ग्राम सभाओं द्वारा जनजातियों के हितों और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए उठाए गए कदम प्रतीत होते हैं।

अवैध कन्वर्जन कराने के ​लिए गांवों में आते हैं

अदालत में राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता वाई.एस ठाकुर ने कहा कि पेसा एक्ट (PESA Act) यानी Panchayats Extension to Scheduled Areas Act 1996 के नियम ग्राम सभाओं को यह अधिकार देते हैं कि वे स्थानीय संस्कृति, देवी-देवताओं के पूजा स्थलों और सामाजिक ​रीति रिवाजों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएं। ठाकुर ने कहा कि इस तरह के होर्डिंग्स को लगाने का उद्देश्य केवल दूसरे गांवों के पादरियों को रोकना है जो जनजातीय लोगों का अवैध कन्वर्जन कराने के ​लिए गांवों में आ रहे हैं। इससे स्थानीय लोगों की संस्कृति को नुकसान हो रहा है।

कन्वर्जन से गांव का सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा

वहीं, ग्रामीणों का कहना है कि वे ईसाई धर्म या पादरियों का गांवों में आने का विरोध नहीं कर रहे हैं। मगर हमारे गांव के भोले-भाले लोगों को प्रलोभन देकर या मदद के नाम पर कन्वर्जन कराया जा रहा है, जो हमारी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है। ग्रामीणों के अनुसार इससे गांव का सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा है और उनके पूर्वजों की परंपराएं कमजोर पड़ रही हैं। इसलिए उन्होंने सामूहिक रूप से उन्हें गांवों में प्रवेश करने से रोकने के लिए यह कदम उठाया है। बताया जा रहा ​है कि कांकेर जिले में अब तक कुल 12 गांवों ने इसी तरह से कन्वर्जन के विरोध में बोर्ड लगाकर कड़े कदम उठाए गए हैं।

 

Topics: छत्तीसगढ़ हाई कोर्टछत्तीसगढ़ हाई कोर्ट फैसलाअवैध कन्वर्जन छत्तीसगढ़कांकेर गांव कन्वर्जन विरोधजनजातीय समुदाय और धर्म परिवर्तनकन्वर्जनपादरियों के खिलाफ होर्डिंगईसाई मिशनरीConversionsChristiansजबरन धर्म परिवर्तनChhattisgarh High Court
सुनीता मिश्रा
सुनीता मिश्रा
हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री। इग्नू दिल्ली से राजनीतिक विज्ञान में मास्टर डिग्री। पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव। [Read more]
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