सुजलाम् सुफलाम् मलयज
शीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्। वन्दे मातरम्
अपने देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसने वन्दे मातरम् नामक राष्ट्रगीत न सुना हो, जिसके रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी हैं। उन्होंने बहुत से उपन्यास लिखे, उनमें से एक का नाम है आनंदमठ। यह गीत इसी पुस्तक में है।
इस पुस्तक में स्वतंत्रता-संग्राम का चित्रण है। यह पुस्तक इससे यह रचना सभी के लिए प्रेरणा बन गई। बंकिम को बचपन में खेलकूद की अपेक्षा पुस्तकों से अधिक लगाव था। वे अपना अधिकांश समय भिन्न-भिन्न प्रकार की पुस्तकें पढने में व्यतीत करते थे। संस्कृत में उनकी काफी रुचि थी और उन्होंने उसका अध्ययन स्वयं ही उसे पढ़कर, समझकर किया। संस्कृत के सौंदर्य से वे बहुत प्रभावित हुए।
उन्होंने आगे चलकर जब बांग्ला में पुस्तकें लिखीं, तो संस्कृत का यह आधार बहुत सहायक रहा। जब वे उप मजिस्ट्रेट थे उस समय मनरो नामक अंग्रेज कोलकात्ता का कमिश्नर था। एक बार अचानक, ईडन बगीचे में बंकिम की मनरो से भेंट हो गई।
बंकिमचंद्र सलाम-दुआ किये बगैर आगे बढ़ गये। मनरो इस रुखे व्यवहार से इतना बौखला गया कि उसने इनकी कोलकात्ता से बदली कर दी। बंकिम नौकरी के दौरान कभी भी एक जगह टिक न सके। उनका स्वाभिमान अंग्रेजों को खलता था। लेकिन उन्होंने स्वाभिमान का त्याग नहीं किया।

















