भारत के पड़ोसी जिन्ना के देश में अभिव्यक्ति की आजादी नाम की कोई चीज नहीं है। यह एक बार नहीं, अनेक बार साबित हो चुका है। ताजा घटना वहां की आर्थिक राजधानी बोले जाने वाले कराची शहर की है जहां एक पत्रकार को चैनल पर इस्राएल के पक्ष में बोलने पर हलाक कर दिया गया। पत्रकार इम्तियाज मीर की हत्या की इस घटना ने पाकिस्तान में कट्टरपंथी मजहबी उन्माद की ताजा असलियत सामने रखी है। वहां मजहब के नाम पर बढ़ती कट्टरता और उसे काबू करने में वहां की सरकार और सेना की नाकामी को भी उजागर करती है।
हाल ही में कराची के मालिर इलाके में एक टीवी चैनल के कार्यालय से बाहर निकलते वक्त पत्रकार एवं एंकर इम्तियाज मीर की कट्टर इस्लामी गुट के जिहादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। इम्तियाज मीर ने अपने चैनल पर इस्राएल का समर्थन करती टिप्पणी की थी, जिसने कट्टरपंथी गुट के जिहादी सोच वालों को भड़का दिया। सिंध प्रांत के गृह मंत्री जियाउल हसन लंजहर ने इस बारे में बताया कि हत्यारे इम्तियाज मीर को इस्राएल समर्थक मानते थे, इसलिए उन्होंने दिनदहाड़े उनको गोलियों से डलनी कर दिया।
पुलिस ने इस हत्या के आरोपी चार आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान अजलाल जैदी, शहाब असगर, अहसान अब्बास और फराज अहमद के रूप में हुई है। बताया जाता है कि ये सभी ‘लश्कर सरुल्लाह’ नामक कट्टरपंथी गुट से जुड़े हैं, जो प्रतिबंधित ‘जैनबियून ब्रिगेड’ का हिस्सा है। पूछताछ में पता चला है कि हत्या की योजना पाकिस्तान के बाहर रह रहे इस गुट के सरगना के फरमान पर की गई।

जिन्ना के देश में गत कुछ वर्षों में मजहबी उन्माद तेजी से बढ़ा है। वहां हिन्दुओं को जीने नहीं दिया जाता, कभी अहमदी मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है, तो कभी पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मजहब के नाम पर मारा जाता रहा है। कट्टर इस्लामी गुटों की सक्रियता बढ़ गई है, जो किसी भी ऐसे व्यक्ति पर हिंसा करने से नहीं चूकते, जो उनकी मजहबी सोच को चुनौती देता दिखता है।
यही वजह है कि उस इस्लामी देश में सामाजिक माहौल इतना तनावपूर्ण हो चुका है कि किसी भी सार्वजनिक मंच पर ‘विवादास्पद’ बात कहना जान जोखिम में डालने जैसा होता है। हालात यहां तक गिर चुके हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बार-बार हमले हो रहे हैं। पत्रकारों को ना सिर्फ सरकारी एजेंसियों से, बल्कि मजहबी कट्टरपंथियों से भी लगातार खतरा बना रहता है।
पाकिस्तान में मीडिया और पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं कई बार चर्चा में रही हैं। इससे पहले भी कराची, बलूचिस्तान और अन्य क्षेत्रों में पत्रकारों की हत्याएं और उन पर हिंसक हमले की खबरें सामने आई हैं।
25 मई 2025 को बलूचिस्तान प्रांत में मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार अब्दुल लतीफ को उसके घर में घुसकर गोली मार दी गई थी। यह घटना उसके परिवार के सामने हुई और बताया गया कि बंदूकधारी पहले उन्हें अगवा करना चाहते थे। अब्दुल लतीफ की हत्या की बलूच यकजहेती समिति और पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने कड़ी निंदा की थी। उनके बेटे को भी कुछ महीने पहले अगवा करके मार दिया गया था।
पाकिस्तान में अक्सर बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे इलाकों में पत्रकार मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग के कारण निशाना बनाए जाते हैं। बताया जाता है कि पाकिस्तान मीडिया कर्मियों के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देशों में एक कहा जाता है। पाकिस्तान में आज पत्रकारिता एक जोखिमपूर्ण पेशा माना जाता है।
कराची की ताजा घटना ने पाकिस्तान में पत्रकारिता और मीडिया कर्मियों को धमकी, हिंसा और उनकी हत्या को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है, यही वजह है कि अनेक पत्रकार स्वतंत्र रिपोर्टिंग से पीछे हटने को मजबूर हो जाते हैं। इम्तियाज मीर की हत्या ने दिखा दिया है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी ताकतें किस कदर हावी हैं, वे जब चाहे जिसे चाहे निशाना बना रही हैं।
हालांकि पुलिस ने आरोपी आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन यह घटना सरकार और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाती है। स्थानीय प्रशासन, पुलिस एवं सुरक्षा एजेंसियां कई बार ऐसे मामलों में प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पातीं, इस कारण समाज में मजहबी गुटों का डर बढ़ता गया है।

















