सूर्यनारायण प्रत्यक्ष देवता हैं। इनकी पूजा विभिन्न नामों से प्राचीन काल से होती आ रही है। भारतवर्ष के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में सूर्य को समस्त जगत की आत्मा बताया है। यह चराचर प्राणियों के आधार हैं। सम्पूर्ण विश्व के दृष्टिदाता भी सूर्य हैं। ऋग्वेद में सर्वव्यापक ब्रह्म तथा सूर्य में समानता दिखाई गई है। इसी प्रकार यजुर्वेद में सूर्य को सबका अन्तरयामी आत्मा घोषित किया गया है। अथर्ववेद में सूर्य को परमेश्वर मान कर नमस्कार निवेदित हुआ है। सूर्योपनिषद् में सूर्य को सात घोड़ों वाले रथ पर सवार लाल रंग के कमल पर स्थित अभय मुद्रा धारण किए हुए दिखाया गया है। कालचक्र के प्रणेता श्री सूर्यनारायण का इस प्रकार ध्यान करने वाला ब्रह्मवेता हो जाता है। सूर्य उदयकाल में महेश्वर और अस्त होते समय विष्णु रूप होते हैं। सांध्य त्रिकाल इनकी उपासना की जाती है।
कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की षष्ठी को होने वाली सूर्य की पूजा सूर्य भगवान को समर्पित है। इसे छठ पूजा या छठ पर्व भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गंगा ने कार्तिकेय नामक बालक को जन्म दिया जिसका लालन-पालन छह कार्तिकाओं ने किया। वे कार्तिकाएं षष्ठ माताएं कहलाईं, जिन्हें हम छठ माता या छठी मइया भी कहते हैं। मैथिल पंचांगों में इसे प्रतिहार षष्ठी का नाम दिया गया है जिसका तात्पर्य है दुख-दुर्भाग्य, रोग एवं संकट का निवारण करने वाला व्रत। पूर्वांचल में इस पर्व को ‘डाला छठ’ के नाम से जाना जाता है। धीरे-धीरे यह व्रतोत्सव बिहार, झारखण्ड एवं पूर्वी सीमाएं लांघ कर सारे देश में लोकप्रिय हो गया है। धन-धान्य, पति-पुत्र की कुशलता तथा घर में सुख समृद्धि के आगमन के लिए छठ का व्रत किया जाता है।
छठ में चार दिन के व्रत रखे जाते हैं। व्रत के पहले दिन को ‘नहाय-खाय’ कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ है स्नान के बाद ही खाना। दूसरे दिन को ‘खरना’ कहते हैं। इस दिन सभी उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद चावल खीर का भोजन ग्रहण करते हैं। तीसरे दिन छठ पूजा होती है। शाम को डूबते सूरज को चलते पानी में अर्घ्य दिया जाता है। महिलाएं पूजा की सामग्री, दीपक, गन्ना और धूप- अगरबत्ती सहित फूल-फल आदि एक टोकरी में लेकर छठ मइया के मधुर धुन में गीत गाते हुए पूजा के घाट पर पहुंचती हैं। वहां पर मंत्रोच्चार के बाद सूर्य भगवान को विदाई के समय अर्घ्य दिया जाता है। चौथे दिन को ‘परना’ कहते हैं। इस दिन प्रातः काल उगते सूरज को अर्घ्य देने के लिए पुनः नदी तट पर एकत्रित होते हैं। सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के बाद लोग अपने परिजनों और इष्ट मित्रों से मिलते हैं और एक-दूसरे को बधाई देते हैं। वातावरण चार दिन तक छठमय हो जाता है।
पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि इस व्रत को नागकन्या, सुकन्या एवं कृष्ण के पुत्र ने भी किया था। अज्ञातवास के समय पांडवजन द्रौपदी के साथ जंगल में दाने-दाने को मोहताज थे। उस समय ऋषियों ने द्रौपदी को छठ करने को कहा। व्रत के महात्म्य का वर्णन करने वाले ऐसा मानते हैं कि इसी से पांडवों ने खोया हुआ अपना राजपाट वापस प्राप्त किया। मान्यता है कि आसुरी शक्तियों को पराजित करने के लिए देवताओं ने सेनानायक के रूप में शिव-पार्वती के कनिष्ठ पुत्र कार्तिकेय को चुना। माता पार्वती ने नदी के तट पर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर पूजन किया तथा कार्तिकेय की सफलता के लिए निर्जला व्रत धारण किया। जब कार्तिकेय असुर-संग्राम में विजयी होकर लौटे, माता पार्वती ने सूर्य देवता का पूजन किया, निर्जला व्रत रखा, अगले दिन प्रातःकाल अवतरित सूर्य देवता को जल एवं दूध का अर्घ्य देकर अपना व्रत तोड़ा। यही एक ऐसा पर्व है जिसमें डूबते सूर्य की आराधना की जाती है। सृष्टि के नियंता सूर्य, आदित्य, भास्कर, दिवाकर को शत् शत् नमन।

















