उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और इन दिनों राज्यसभा के सदस्य श्री बृज लाल ने अपनी फेसबुक वॉल पर 2004 की एक घटना को विस्तार से बताया है। इसमें उन्होंने लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहते एक सेक्शन अधिकरी के पुत्र के अपहरण और उसकी रिहाई के बारे में जो बताया है, उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि उन दिनों बिहार में किस तरह जंगलराज चल रहा था।
लालू का जंगलराज
प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल सही बात कही है कि बिहार के लोग अगले 100 वर्ष तक लालू यादव का जंगलराज नहीं भूल सकते हैं। मैं लालू यादव के जंगलराज का प्रत्यक्ष साक्षी हूँ। मैं 1996 से 2003 तक 7 वर्ष, पूर्वोत्तर रेलवे में में मुख्य सुरक्षा आयुक्त/ आरपीएफ रहा, जिसमें उत्तर बिहार का सोनपुर और समस्तीपुर डिवीज़न मेरे कार्य क्षेत्र में था। उस समय भ्रष्टाचार, रंगदारी, फिरौती के लिए अपहरण, लूट-डकैती, हत्या का बोलबाला था। शहाबुद्दीन, मुन्ना शुक्ला, सूरजभान जैसे माफिया की समानांतर सत्ता चलती थी।
यहां मैं केवल एक घटना को विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ। लालू यादव 25 मई, 2004 को देश के रेलमंत्री बने। स्वाभाविक रूप से उनके रिश्तेदारों, नेताओं का रेल भवन आना—जाना लगा रहता था। वे लोग रेलमंत्री के “एमआर सेल” के अधिकारियों से भी मिलते रहते थे।
उस समय “एमआर सेल” के सेक्शन ऑफिसर शशांक मोहन शर्मा थे, जो एक ईमानदार और निष्ठावान अधिकारी थे। वे “मियाँवाली कॉलोनी- कौवा बाग” गुड़गाँव के निवासी हैं। रेल भवन में बिहार के एक ख़ास व्यक्ति ने उनसे परिवार के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उनके पुत्र ने फार्मेसी का कोर्स किया है।
फार्मेशी का काम दिलाने के बहाने अपहरण
इस पर संत (छद्म नाम) ने शर्मा जी से कहा कि फार्मेसी सेक्टर में बिहार में बहुत काम है। मैं आपके बेटे को काफ़ी बड़ा दवा सप्लाई का ऑर्डर दिलवा दूँगा। शर्मा जी ने उस व्यक्ति पर विश्वास करके अपने पुत्र को दिल्ली से पटना भेज दिया। उनके पुत्र ट्रेन से पटना रेलवे स्टेशन पहुँचे, जहाँ से उनका अपहरण कर लिया गया। शशांक मोहन शर्मा जी के पास फ़ोन आया कि उनके पुत्र का अपहरण हो गया है। यदि पुत्र की जीवन रक्षा चाहते हैं तो इसके लिए फिरौती देनी पड़ेगी। शर्मा जी के पैर के नीचे की ज़मीन खिसक गई। उनसे भारी फिरौती की रकम माँगी गई। अपहरणकर्ताओं के गैंग के सरगना ने समझा था कि यह व्यक्ति रेलमंत्री सेल का सेक्शन ऑफिसर है तो इसने बहुत धन कमाया होगा।
शशांक मोहन शर्मा ने अपने बेटे की जीवन—रक्षा के लिए रेलवे के बहुत बड़े नेता के बंगले पर जाकर उनका पैर पकड़ लिया और अपनी व्यथा बताई। बड़े नेता ने कहा कि “बुड़बक, अपहरण से छुड़ाने के लिए खर्चा लगता है, मैं संत से कह दूँगा कि वह थोड़ी रियायत कर दे”। शर्मा जी पटना में गिरोह के सरगना से जाकर मिले और कहा कि उन्होंने ईमानदारी से नौकरी की है, बच्चों को पढ़ाया, अब तीन महीने में रिटायर हो रहे हैं, उनके पास बचत में धन नहीं है।
रेलवे अधिकारी ने ब्याज पर पैसे लेकर बेटे को छुड़ाया
सरगना “संत” ने तुरंत उनकी समस्या का हल निकाल दिया। उनसे कहा गया कि मंत्रालय से जानकारी लाओ कि तुम्हें सेवानिवृत्ति पर एकमुश्त कितना धन मिलेगा। शर्मा जी संबंधित सेक्शन से प्रमाणपत्र लेकर गये, जिसमें उन्हें सेवानिवृत्ति पर लगभग 14 लाख रुपये मिलने थे। संत ने कहा कि मैं अपने एक आदमी से तुम्हें 14 लाख रुपये ब्याज पर दिलवा देता हूँ जिसको तुम मुझे दे दो, सेवानिवृति तक इस व्यक्ति को अपने वेतन से ब्याज देते रहो और सेवानिवृत्ति पर मिलने वाला 14 लाख रुपये ब्याज देने वाले को दे देना। मरता क्या न करता, शशांक मोहन शर्मा ने सरगना के निर्देशानुसार ब्याज पर पैसे लेकर उस ‘संत’ को देकर अपने पुत्र की रिहाई करवाई।
शर्मा जी ने अपने रिटायरमेंट का पूरा धन गंवा दिया और सेवानिवृत्ति के बाद 10 साल तक “राइट्स” में नौकरी करके परिवार का पालन-पोषण किया। उन्होंने अपने पुत्र को एमबीए कराया। उसे गुड़गाँव के “डीएलएफ” में नौकरी मिली। वे नौकरी जॉइन करने पहुंचे, पर दुर्भाग्यवश उनकी गर्दन लिफ्ट में फँस गई जिससे उनकी दर्दनाक मौत हो गई। यह कहानी है लालू यादव जी के जंगलराज का, जब उन्हीं के “एमआर सेल” के सेक्शन अधिकारी को पुत्र की रिहाई के लिए सेवानिवृत्ति की पूरी रकम गंवानी पड़ी थी।
इस घटना से अनुमान लगाया जा सकता है कि जब रेलमंत्री के “एमआर” सेक्शन के प्रभारी को बेटे की रिहाई के लिए पूरी रकम गँवानी पड़ी तो बिहार में उस जंगलराज में क्या हुआ होगा।
















