आज भारत में दुपहिया वाहनों के पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों में स्टीलबर्ड इंटरनेशनल की बड़ी ख्याति और भूमिका है। यह कंपनी दुपहिया वाहनों में लगने वाले रबर के पार्ट्स और फिल्टर बनाती है। कंपनी के कार्यकारी निदेशक मानव कपूर ने बताया कि उत्तराखंड के रुद्रपुर स्थित फैक्ट्री में 500 श्रमिक प्रतिदिन लगभग 45,000 फिल्टर और करीब 15 टन रबर पार्ट् स बनाते हैं। कंपनी के सभी उत्पाद लगभग 95 प्रतिशत स्वदेशी हैं। पूरा कच्चा माल भारत में ही मिल जाता है। रबर केरल से मंगाया जाता है और अन्य चीजें स्थानीय स्तर पर मिल जाती हैं। कंपनी बाहर से कुछ रसायन मंगाती है। हालांकि वे रसायन भरत में भी उपलब्ध हैं। यानी कंपनी जो भी बनाती है, उसके लिए वह किसी बाहरी देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं है।
इस कंपनी के उत्पाद भारतीय बाजार मेें कहीं भी मिल जाते हैं। इसके साथ ही वे नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, ब्राजील, इजिप्ट, इटली जैसे अनेक देशों को निर्यात होते हैं। मानव बताते हैं, “विदेश में इन उत्पादों की इतनी मांग है कि कई देशों में नई फैक्ट्री लगाने की प्रक्रिया चल रही है। इनमें एक है बांग्लादेश। बांग्लादेश में फैक्ट्री लगाने के लिए आवश्यक चीजें पहुंच चुकी हैं, लेकिन वहां के राजनीतिक माहौल को देखते हुए कंपनी का शेष कार्य पूरा नहीं हो पा रहा है।”


आज स्टीलबर्ड इंटरनेशनल भले ही देश-विदेश में अपने उत्पाद बेच रही है, लेकिन इसकी शुरुआत 1964 में एक छोटी-सी दुकान के रूप में हुई थी। मानव बताते हैं, “देश विभाजन के वक्त मेरे दादा लुट-पिटकर भारत आए थे। यहां उन्होंने रोजगार के लिए छोटा-सा काम शुरू किया। उसी से वे अपने परिवार, जिसमें पांच पुत्र हैं, का गुजारा करते थे। बाद में एक सज्जन, जो फिल्टर बनाते थे, अमेरिका जाने लगे।
उन्होंने मेरे दादा जी से कहा कि वे फिल्टर बनाने का काम ले लें यानी उन्होंने वह कंपनी मेरे दादा को बेच दी। उसी में दादा जी, मेरे पापा और सभी चाचा मेहनत करने लगे। धीरे-धीरे कंपनी बड़ी होती गई। कुछ वर्ष पहले हेल्मेट बनाने का काम मेरे ताऊ जी के पास रह गया और मेरे पापा ने फिल्टर और रबर के पार्ट् स बनाना शुरू किया। आज मैं उसी कंपनी को आगे बढ़ाने का अथक प्रयास कर रहा हूं।”
मानव यह भी स्वीकार करते हैं कि कारोबार में जोखिम बहुत होता है। उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन उनका सामना धैर्य के साथ किया जाता है। मानव बताते हैं, “कंपनी के सामने सबसे बड़ी अड़चन कोविड काल में आई। लगभग छह महीने तक कंपनी ठप रही। श्रमिकों को वेतन देना भी आसान नहीं रह गया था। लेकिन श्रमिकों ने हर हाल में कंपनी का साथ दिया। इससे कंपनी के प्रबंधन पर दबाव नहीं आया और कंपनी संभल गई।”

















