दीपोत्सव: हिंदू संस्कृति का सनातन प्रकाश पर्व और समृद्धि का प्रतीक
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दीपोत्सव: हिंदू संस्कृति का सनातन प्रकाश पर्व और समृद्धि का प्रतीक

दीपावली: हिंदू संस्कृति का महापर्व जो प्रकाश, समृद्धि और आत्मोद्धार का प्रतीक है। पौराणिक आख्यानों से ऐतिहासिक संदर्भों तक, जानें राम, कृष्ण, महावीर और गुरु हरगोबिंद के प्रसंग। पर्यावरण चेतना और सांस्कृतिक विरासत को समर्पित यह पर्व भारत की स्वर्णिम परंपरा को जीवंत करता है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by कुलदीप सिंह
Oct 19, 2025, 11:10 am IST
in धर्म-संस्कृति
Deeptsav sanatan Dharma

प्रतीकात्मक तस्वीर

दीपोत्सव: उत्सवधर्मिता हमारी हिन्दू संस्कृति का सनातन संस्कार है और सुख सम्पन्नता व श्री समृद्धि की प्रतीक माँ लक्ष्मी का पूजन आराधन हमारे गौरवशाली राष्ट्र की पुरातन परम्परा। ज्योतिपर्व दीपावली को महापर्व इसीलिए कहा जाता है क्योंकि आर्य संस्कृति की महान गरिमा से मंडित यह प्रकाश पर्व युगों-युगों से हमारी सनातन संस्कृति के घाटों को प्रदीप्त करता रहा है। आलोक पर्व, प्रकाश पर्व, दीपोत्सव, दीपमलिका, दीपावली, सुखरात्रि या यक्षरात्रि आदि अनेक नामों से विख्यात यह महापर्व आत्मोद्धार का प्रतीक होने के साथ-साथ हमारी समृद्धशाली किंतु तपोनिष्ठ सांस्कृतिक विरासत का भी परिचायक है। दीपावली की पांच दिवसीय पर्व श्रंखला हमारे भारत की स्वर्णिम सभ्यता व संस्कृति की विभिन्न धाराओं को ठौर देती है। दीप हमारी आस्था के सबसे सनातन प्रमाण हैं। वैदिक काल में यह प्रकाश यज्ञ अग्नि के रूप में था जो बाद में मंदिर के आरती-दीप के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। वैदिक काल से वर्तमान तक दीपकों के दिव्य आलोक में हम इस उत्सव का अनुष्ठान करते आए हैं।

आतिशबाजी व छत्तीस व्यंजन यक्षों की देन

पद्म पुराण के अनुसार, वामन रूपधारी भगवान विष्णु ने जब दैत्यराज बलि से संपूर्ण धरती लेकर उसे पाताल लोक जाने को विवश दिया तो भक्त बलि ने उनसे निवेदन किया कि भगवन! धरती लोक के कल्याण के लिए मेरी आपसे यह विनती है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या के तीन दिनों तक जो प्राणि मृत्यु के देवता यमराज तथा श्री-संपदा की अधिष्ठात्री माँ लक्ष्मी के नाम से दीपदान करे; उसे यम की यातना कभी न मिले और उसका घर श्री-संपदा से सदैव आपूरित रहे। माना जाता है कि दीपोत्सव की परम्परा का शुभारम्भ तभी से हुआ था। पुराण काल में दीपावली को यक्षरात्रि के रूप में मनाये जाने के भी शास्त्रीय उल्लेख मिलते हैं। दीपावली की रात्रि को यक्ष राज कुबेर अपने गणों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे।

दीपावली पर रंग-बिरंगी आतिशबाजी, छत्तीस प्रकार के व्यंजन तथा मनोरंजन के विविध कार्यक्रम यक्षों की ही देन माने जाते हैं। धनतेरस के दिन धन्वन्तरि ऋषि के अलावा माँ लक्ष्मी के साथ कुबेर पूजा की परम्परा है। जबकि अमानिशा के दिन पूजन वेदिका पर माँ लक्ष्मी के साथ ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में गणेश जी प्रतिष्ठित किये जाते हैं। तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं और माँ लक्ष्मी ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की स्वामिनी मानी जाती हैं।

इसे भी पढ़ें: क्यों सनातन धर्म से डरती है कांग्रेस? सिद्धारमैया का विवादित बयान

प्रकाशपर्व से जुड़े पौराणिक आख्यान  

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का दिव्य शिक्षण देने वाले इस प्रकाशपर्व का शुभारम्भ कब क्यों व कैसे हुआ? इस बाबत तमाम पौराणिक व ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। पद्म व भविष्य पुराण में इस पर्व का सम्यक विवेचन मिलता है। इस पर्व सर्वाधिक लोकप्रिय त्रेतायुगीन संदर्भ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन से जुड़ा है। पौराणिक आख्यान के अनुसार इसी दिन मृत्यु के देवता यमराज ने जिज्ञासु बालक नचिकेता को ज्ञान की अंतिम वल्लरी का उपदेश दिया था। यम-नचिकेता का यह संवाद कठोपनिषद में विस्तार से वर्णित है। महान पतिव्रता सावित्री ने भी इसी दिन अपने अपराजेय संकल्प द्वारा यमराज के मृत्युपाश को तोड़कर मनवांछित वरदान पाया था। इसी तरह हिरण्यकश्यप वध का प्रसंग भी दीपोत्सव से जुड़ा है।

महान दानवीर दैत्यराज बलि और श्री हरि के वामन अवतार का प्रसंग भी दीपोत्सव से जुड़ा है। इसी तरह द्वापर युग में श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था। इस घटना की स्मृति में नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली) मनायी जाती है। चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ भी इसी दिन सम्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि राक्षसों का वध करने के लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर स्पर्श से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो सका। वह तिथि भी कार्तिक अमावस्या की ही थी।

पर्व से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ

इतिहास की बात करें तो सनातन हिन्दू संस्कृति के महानायक तथा आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द का दीपावली के दिन अजमेर के निकट देहावसान हुआ था। इसी तरह पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ओम कहते हुए समाधि ले ली। कहा जाता है कि महान संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस को दीपावली ही के दिन मां काली ने प्रथम दर्शन हुए थे। इसीलिए इस दिन बंगाली समाज में काली पूजा का विधान है।

बौद्ध, जैन व सिख धर्म के इतिहास में दीपपर्व

कहा जाता है कि बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध संबोधि प्राप्त करने के उपरान्त 17 वर्ष बाद जब अनुयायियों के साथ अपने गृह नगर कपिलवस्तु लौटे तो उनके स्वागत में नगरवासियों ने लाखों दीप जलाकर दीपावली मनायी थी।     महात्मा बुद्ध ने अपने प्रथम प्रवचन के दौरान ‘अप्प दीपो भव’ का उपदेश देकर दीपावली को नया आयाम प्रदान किया था। मौर्य साम्राज्य की दीपावली के तो रंग ही अनूठे थे। मगध सम्राट अजातशत्रु के शासनकाल में इस शुभ पर्व पर कौमुदी महोत्सव का आयोजन किया जाता था। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार आमजन कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाकर दीपदान महोत्सव मनाते थे। लोग बाग मशालें लेकर नाचते थे।

मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने अपना दिग्विजय का अभियान इसी दिन प्रारम्भ किया था तथा इसी खुशी में दीपदान किया गया था। आर्यावर्त के यशस्वी सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने ईसा से 269 वर्ष पूर्व दीपावली के ही दिन तीन लाख शकों व हूणों को युद्ध में खदेड़ कर परास्त किया था। इस खुशी में उनके राज्य के लोगों ने असंख्य दीप जला कर जश्न मनाया था। विक्रम संवत के प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक भी दीपावली के दिन ही हुआ था। जैन तीर्थंकर भगवान महावीर ने दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था और देवलोक के देवताओं ने दीप जलाकर उनकी स्तुति की थी।

जैन धर्म के प्रमुख ग्रन्थ ‘कल्पसूत्र’ में कहा गया है कि महावीर-निर्वाण के साथ जो अन्त:ज्योति सदा के लिए महाकाश में विलीन हो गयी है, आओ उसकी क्षतिपूर्ति के लिए हम बाह्य आकाश को दीप ज्योति से आलोकित करें। दीपोत्सव का वर्णन त्रिपिटक व अन्य प्राचीन जैन ग्रंथों में भी मिलता है। महावीर-निर्वाण संवत दीपोत्सव के दूसरे दिन से शुरू होता है। सिखों के लिए भी दीपावली का पर्व बहुत मायने रखता है। कारण कि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और इसके अलावा 1618 में दीवाली के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को मुगल बादशाह जहांगीर की कैद से जेल से रिहा किया गया था।

दीप पर्व के तत्वदर्शन को हृदंगम करने की जरूरत

समझना होगा कि दीपावली मूलत: ऋतु पर्व है जिसका गहन संबंध हमारे कृषि प्रधान देश के भूमिपुत्रों के साथ जुड़ा है। वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद खरीफ की फसल की कटाई और रबी की तैयारी के साथ पर्यावरण संचेतना एवं स्वच्छता का तत्वदर्शन ही इस प्रकाश पर्व का मूल उत्स है। एक दौर था जब लोग घी व तेल के दीपक जलाकर दीपोत्सव मनाते थे। इन दीपकों के प्रकाश में वर्षा ऋतु में भारी मात्रा में पनपने वाले हानिकारक कीट पतंगे नष्ट हो जाते थे। तब दीपपर्व पर्यावरण शुद्धता का वाहक होता था मगर हमारे समाज में ज्यों ज्यों जनमानस पर पाश्चात्य सभ्यता व अत्याधुनिकता हावी होती जा रही है, आत्म ज्ञान का यह प्रकाश पर्व  केवल भौतिकता की चकाचौंध में सिमटता चला जा रहा है। हमें यह भूल सुधारनी होगी।

समझना होगा कि समग्र जीवन की प्रतिपादक हमारी भारतीय संस्कृति के पर्व -त्यौहारों की अविरल श्रृंखला सामूहिक उल्लास की जीवन्तता की द्योतक होने के साथ सामाजिक चेतना के परिष्कार व लोकशिक्षण का भी सशक्त माध्यम है। इस श्रृंखला की मुकुटमणि है दीप पर्व।   प्राचीन काल में यह पर्व पूरे सात दिन तक मनाया जाता था। कार्तिक कृष्णा एकादशी अर्थात रमा एकादशी से प्रारम्भ होकर गोवत्स द्वादशी, धन्वन्तरि त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, अमा निशा को दीपोत्सव, प्रतिपदा को अन्नकूट-गोवर्धन पूजा और यम द्वितीया को भाई दूज के साथ यह उत्सव सम्पन्न होता था। इसी कारण इस एक पर्व मात्र न कह कर अपितु पर्व पुंज की संज्ञा दी गयी है। वर्तमान में  दीपावली की पांच दिवसीय पर्व परम्परा संस्कृति की अनेक धाराओं को ठौर देती है।

धन त्रयोदशी के दिन सागर मंथन के दौरान आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरि अमृत घट के साथ अवतरित हुए थे। नरक चतुर्दशी को यम का दिया जलाकर पितरों को अर्घ्ययदान दिया जाता है। अमावस्या को दीपोत्सव मनाकर लक्ष्मी-गणेश की आराधना कर देवशक्तियों से सुख समृद्धि व ज्ञान विवेक का आशीर्वाद मांगा जाता है। प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा व अन्नकूट उत्सव  तथा अंतिम दिन भाईदूज व चित्रगुप्त पूजन की परम्परा हमारी ऋषि मनीषा की ऐसी दिव्य धरोहर है जिसे पूर्ण निष्ठा से जीकर हम सनातनी भारतवासी अपने राष्ट्र को पुनः विश्व गुरु बना सकते हैं।

 

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