‘वस्तुओं तक सीमित नहीं स्वेदशी का दायरा’
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होम भारत

‘वस्तुओं तक सीमित नहीं स्वेदशी का दायरा’

हाल ही में भारत नीति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री कश्मीरी लाल ने स्वदेशी संकल्पना के विविध आयामों पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। प्रस्तुत हैं इसके प्रमुख अंश-

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 18, 2025, 04:57 pm IST
inभारत, विश्लेषण

पिछले कुछ समय में हमने देखा है कि वैश्वीकरण की धाराएं सिमट रही हैं और कई देश अपनी अर्थव्यवस्था और रोजगार की रक्षा के लिए संरक्षणवादी कदम उठा रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में स्वदेशी एक बार फिर केंद्रीय विचार बनकर लौटा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे बारंबार रेखांकित किया है।

स्वदेशी का विचार नया नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के आर्थिक शोषण का विश्लेषण किया तो स्वदेशी की वैचारिक भूमि बनी। लोकमान्य तिलक और अरविंदो घोष ने इसे आंदोलन की दिशा दी। स्व की भावना स्वदेशी में बदली और स्वदेशी की भावना राष्ट्रवाद में रूपांतरित हुई। महात्मा गांधी ने चरखे को प्रतीक बनाकर विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कराया, खादी सूती वस्त्रों को जनचेतना का हिस्सा बनाया और यह विश्वास जगाया कि अपनी अर्थव्यवस्था हमें स्वयं खड़ी करनी है।

स्वदेशी का मूल स्व

उदारीकरण के बाद जब डब्ल्यूटीओ और ट्रिप्स जैसे ढांचे के माध्यम से वैश्विक दबाव बढ़ा, तब स्वदेशी जागरण मंच का गठन हुआ और देशव्यापी जनजागरण ने कई ऐसे निर्णयों पर सरकार को सावधान किया जो दीर्घकाल में हानिकारक हो सकते थे। परिणामस्वरूप भारत बड़ी उथल-पुथल से बचा रहा और आज विश्व की एक अग्रणी अर्थव्यवस्था है। अब दृश्य बदला है। जो देश मुक्त व्यापार के लिए नियम बनाते थे, वही आज अपने व्यापार और रोजगार बचाने के लिए ऊंचे टैरिफ लगा रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में स्वदेशी का पुन: आह्वान केवल नारा नहीं, रणनीति है। स्वदेशी का मूल स्व है जो संस्कृति, भाषा, वेशभूषा, भोजन और व्यवहार से आता है। यह केवल वस्तुओं की सूची नहीं, राष्ट्रीय जीवन का दृष्टिकोण है।

युद्ध और तकनीक के स्वरूप में बड़ा परिवर्तन आया है। सीमापार चढ़ाई की जगह ड्रोन, एल्गोरिदम और साइबर प्रभुत्व से लड़ाइयां लड़ी जा रही हैं। ऐसे समय में शस्त्र केवल श्रेष्ठ नहीं, अपने होने चाहिए। सूचना का प्रवाह ही रणनीतिक हथियार बन गया है। इसलिए रक्षा से लेकर डिजिटल क्षेत्र तक में स्वावलंबन अनिवार्य है। यह भी समझना आवश्यक है कि आज का स्वदेशी केवल मिट्टी के बर्तनों से आगे बढ़कर माइक्रोचिप, रोबोटिक्स, 5जी, एआई और आइपीआर तक फैला है। पहले अंकल चिप्स पर चर्चा होती थी, आज माइक्रोचिप्स स्वदेशी हों, यह अपेक्षा है।

चरखे से चलकर यात्रा चंद्रयान तक पहुंच चुकी है। सरकार समाज और स्वदेशी जागरण मंच एक ही दिशा में काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री का लम्बा प्रशासनिक अनुभव और वैश्विक शक्तियों के तौर-तरीके समझने की क्षमता इस दृष्टि के पीछे है। 2014 के बाद राष्ट्रीय हथकरघा दिवस, योग का अंतरराष्ट्रीय प्रसार, स्थानीय उत्पादों के प्रति आग्रह, उत्सवों पर देसी वस्तुओं के प्रयोग का आह्वान, आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य और वैक्सीन विकास जैसे कदम स्वदेशी विचार को नीति और व्यवहार में स्थापित करते हैं। रक्षा क्षेत्र में आयात निर्भरता कम हुई है और निर्यात बढ़ा है। यह धैर्यपूर्ण, चरणबद्ध और विवेकपूर्ण यात्रा है।

स्वदेशी की परिभाषा पर व्यावहारिक मानदंड स्पष्ट होने चाहिए। सामान्यतः तीन कसौटियां उपयोगी हैं। कंपनी का मालिक भारतीय हो। कंपनी के अधिकांश शेयर भारतीयों के पास हों। मुख्यालय भारत में हो ताकि निर्णय और रॉयल्टी देश में रहें। साथ ही उपभोक्ता भ्रम से बचें। चमकदार पैकेजिंग या देसी नाम से विदेशी स्वामित्व छिपाया जा सकता है, इसलिए सतत जागरूकता आवश्यक है। स्वदेशी और विदेशी की स्थिर सूची बनाना कठिन है, क्योंकि स्वामित्व बदलते रहते हैं, फिर भी समाज को समय समय पर अद्यतन जानकारी मिलनी चाहिए। इस उद्देश्य से स्वदेशी उत्पाद चिन्हांकन, सूचीकरण और जन संवाद की निरंतर जरूरत है। आयातित पुर्जों पर असेंबली बनाम पूर्ण निर्माण की बहस में व्यावहारिक दृष्टि आवश्यक है।

यहां दीनदयाल जी का सूत्र प्रासंगिक है। चाह में देसी, जरूरत में स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी, पर मजबूरी निरंतर घटनी चाहिए। जापान, चीन और भारत में ऑटो सेक्टर का अनुभव बताता है कि लोकल सोर्सिंग और टेक्नोलॉजी को अपनाने से कुछ वर्षों में गहरी स्वदेशीकरण संभव है। दीर्घकालीन निर्माण का संस्कारतकनीकी सेवाओं में स्वावलंबन अत्यंत जरूरी है। डेटा संप्रभुता, घरेलू प्लेटफॉर्म, स्वदेशी ऑपरेटिंग स्टैक, ईमेल मैसेजिंग और क्लाउड के विकल्प खड़े करना राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है। आईआईटी मद्रास में देशी 5जी स्टैक विकास और उसके सामरिक उपयोग के अनुभव ने सिद्ध किया है कि मिशन मोड में समयबद्ध नवाचार संभव है। निजी क्षेत्र के स्वदेशी टेक प्लेटफॉर्म स्कूल कॉलेज और मंत्रालयों में अपनाने की पहल आगे बढ़ रही है। मनोरंजन और ई कॉमर्स में भी भारतीय विकल्पों की क्षमता साबित हुई है।

फ्लिपकार्ट जैसे उदाहरण बताते हैं कि भारतीय युवा विश्वस्तरीय प्लेटफॉर्म बना सकते हैं। चुनौती यह है कि सफल उद्यम बेचने की प्रवृत्ति की जगह दीर्घकालीन निर्माण का संस्कार विकसित हो। एंटी डंपिंग और अनुचित व्यापार पर कठोर नीति ने आतिशबाजी, सजावटी लाइट जैसे क्षेत्रों में देशी उत्पादन को राहत दी है। दिवाली की सजावट में आज बड़ी मात्रा में स्थानीय असेंबली और सेवाएं सम्मिलित हैं। फिर भी ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बड़े रिटेल के कारण छोटे व्यापार पर दबाव है। इसका उत्तर गैरकानूनी और अनैतिक प्रथाओं की रिपोर्टिंग, नीतिगत सख्ती और सहकारिता आधारित प्रतिस्पर्धा में है। अमूल का सहकारी मॉडल दिखाता है कि छोटे उत्पादकों की संगठित शक्ति वैश्विक दिग्गजों को चुनौती दे सकती है। इसी तरह किराना और स्ट्रीट वेंडर्स के लिए तकनीकी सहयोग, सामूहिक लॉजिस्टिक्स और भुगतान ढांचे से स्थानीय रिटेल की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाई जा सकती है।

वित्तीय क्षेत्र में विदेशी पूंजी के अतिनिर्भर प्रवाह और हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग जैसी प्रवृत्तियों पर संतुलित सतर्कता आवश्यक है। दीर्घकालीन घरेलू पूंजी निर्माण, बीमा पेंशन और म्यूचुअल फंड की नीति में ऐसा संतुलन चाहिए जिससे भारतीय परिवारों की बचत उत्पादक निवेश में लगे और नियंत्रण विदेशी एल्गोरिदम के हाथ न रहे। यह कार्य केवल नियमों से नहीं, जन जागरूकता और स्थानीय वित्तीय संस्थाओं की जिम्मेदारी से भी आगे बढ़ेगा।

स्वदेशी दृष्टि आवश्यक

स्वदेशी का दायरा बाजार की वस्तुओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। भाषा, वेशभूषा, भोजन, औषधि और भाव तक स्वदेशी दृष्टि आवश्यक है। व्यवहार में भारतीय भाषाएं, भारतीय चिकित्सा परंपराएं और अपने उत्सवों का देसी रूप आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। स्वदेशी जागरण मंच और समाज के विज्ञानी, शिक्षक, उद्यमी और संत परंपरा मिलकर जन शिक्षण का कार्य करें। उपभोक्ताओं के लिए सरल सूचियां, उत्पाद पहचान, दुकान स्तर पर स्वदेशी स्टिकर, विद्यालयों में कार्यशालाएं और डिजिटल सुरक्षा साक्षरता जैसे कदम छोटे लगते हैं पर प्रभाव बड़े होते हैं। आने वाले वर्षों के लिए पांच प्राथमिक क्षेत्र स्पष्ट हैं- पहला, दुकानदार और स्ट्रीट वेंडर। तीन करोड़ से अधिक यह वर्ग समाज का वास्तविक ओपिनियन मेकर है। इनके साथ नियमित संवाद, डिजिटल ऑनबोर्डिंग, इन्वेंट्री और भुगतान समाधानों का प्रशिक्षण और स्वदेशी उत्पादों की दृश्यता बढ़ाना आवश्यक है।

दूसरा, विद्यार्थी और शिक्षक। विश्वविद्यालय और स्कूल स्वदेशी की प्रयोगशाला बनें। तीसरा, जाति बिरादरी और व्यावसायिक संगठन। इन्हें लोक शिक्षक की भूमिका में संगठित संवाद के लिए सक्रिय करना चाहिए। चौथा, धार्मिक संस्थान। देश भर के मंदिर, गुरुद्वारे और अन्य धार्मिक स्थल जन जागरण की प्राचीन परंपरा के केंद्र हैं। यहां स्वदेशी आधारित उद्यमिता, कौशल और साफ-सफाई जैसे विषयों के कार्यक्रम निरंतर हों। पांचवां, सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया। मौलिक सामग्री, लघु नाटक, पॉडकास्ट और स्वदेशी केस स्टडी जनसंवाद को गहराई देती है।

वातावरण अनुकूल

नीतिगत स्तर पर सरकारी खरीद में स्थानीय मूल्य संवर्धन, बौद्धिक संपदा का घरेलू स्वामित्व, रणनीतिक क्षेत्रों में क्वालिफाइड मार्केट एक्सेस, ई कॉमर्स में सम प्रतिस्पर्धा, डेटा लोकलाइजेशन और मानक निर्धारण में भारतीय नेतृत्व जरूरी है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में लेन-देन संतुलित हो और सरकारी ठेकों में विदेशी भागीदारी पर स्पष्ट शर्तें हों जिससे घरेलू उद्योग का दायरा और गुणवत्ता दोनों बढ़ें। आज का वातावरण अनुकूल है।

सरकार समाज और संस्थाएं एक दिशा में हैं। युवाओं का कौशल, उद्यमियों का नवाचार और किसानों, कारीगरों का श्रम मिलकर आत्मनिर्भर भारत की यात्रा को गति दे सकते हैं। यह यात्रा अतीत से प्रेरणा, वर्तमान की समझ और भविष्य की तकनीक पर आधारित है। राम को तीर इसलिए चाहिए था कि अधर्म का समापन हो। कृष्ण को रणनीति इसलिए चाहिए थी कि धर्म की रक्षा हो। भारत का वैश्विक विजन गरीबी, प्रदूषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ाई का है और इसके लिए शक्ति निर्माण आवश्यक है। स्वदेशी उसी शक्ति का जनाधार है। जब हर घर में स्वदेशी दीप जलेगा, जब हर खरीद में भारत जुड़ा होगा, जब हर युवा के हाथ में कौशल और हर उद्यम में नवाचार होगा, तब बदलते विश्व परिदृश्य में भारत न केवल सुरक्षित रहेगा, बल्कि मार्गदर्शक बनकर उभरेगा।

Topics: स्वावलंबन (Self-reliance)जन जागरण (Public Awareness/Mass Awakening) मालिक/स्वामित्व (Ownership)आत्मनिर्भर भारत (Aatmanirbhar Bharat / Self-Reliant India)सहकारिता (Cooperative Model)वैश्वीकरण (Globalization)कौशल (Skill)संरक्षणवाद (Protectionism)तकनीक/प्रौद्योगिकी (Technology)रक्षा क्षेत्र (Defence Sector)डिजिटल (Digital)स्वदेशीडेटा संप्रभुता (Data Sovereignty)पाञ्चजन्य विशेषमाइक्रोचिप (Microchip)Swadeshआइपीआर (IPR / Intellectual Property Rights)नवाचार (Innovation)राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security)
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