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धनतेरस सिर्फ खरीदारी का दिन नहीं, जानिए आरोग्य के देवता धन्वंतरि की अद्भुत आयुर्विज्ञान कथा

दामोदर मास के नाम से विख्यात चातुर्मास के अंतिम पड़ाव कार्तिक माह का कृष्ण पक्ष हमारे जीवन में प्रकाश का अनूठा संदेश लेकर आता है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Oct 17, 2025, 05:33 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति

दामोदर मास के नाम से विख्यात चातुर्मास के अंतिम पड़ाव कार्तिक माह का कृष्ण पक्ष हमारे जीवन में प्रकाश का अनूठा संदेश लेकर आता है। इस अवसर पर हम भारतवासी दीप प्रज्वलन की अपनी वैदिक परंपरा को गतिमान कर न सिर्फ स्वयं के अपितु समूचे राष्ट्र जीवन को आलोकित करते हैं। महालक्ष्मी के आह्वान के साथ अज्ञान और अंधकार के पराभव के इस पांच दिवसीय पर्व का शुभारम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को आयुर्विज्ञान के जनक आचार्य धन्वंतरि की जयंती के साथ होता है।

रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा धन्वंतरि, सुश्रुत व चरक संहिताओं समेत विभिन्न आयुर्वेद ग्रंथों में आचार्य धन्वंतरि की आयुर्वेदिक उपलब्धियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथानुसार प्राचीन काल में एक बार देवराज इंद्र के अभद्र आचरण से क्षुब्ध होकर महर्षि दुर्वासा ने तीनों लोकों को ‘श्री’ हीन होने का श्राप दे दिया। फलस्वरूप देवी लक्ष्मी के पृथ्वी से पाताल लोक चले जाने से चहुओर त्राहि त्राहि मच गयी। पुनः तीनो लोकों में ‘श्री’ की स्थापना के लिए व्याकुल देवता त्रिदेवों के पास गये और संकट से उबरने का उपाय पूछा। तब महादेव के सुझाव पर देवों और दैत्यों के मध्य समुद्रमंथन हुआ जिसमें सागर से १४ दिव्य रत्नों की उत्पत्ति हुई। समुद्र मंथन के दौरान शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को अमृत कलश के साथ आचार्य धन्वंतरि और अमावस्या को देवी महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ था। आचार्य धन्वंतरि को विष्णु का अंशावतार माना जाता है।

अनेक अमृतमय औषधियों के खोजकर्ता

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने आचार्य धन्वंतरि को देवताओं का वैद्य एवं वनस्पतियों व औषधियों का स्वामी नियुक्त किया। ऋषि धन्वंतरि ने जनकल्याण के लिए अनेकों अमृतमय औषधियों की खोज की। इनके वरदान स्वरूप सभी वृक्षों-वनस्पतियों में रोगनाशक शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ। आचार्य धन्वंतरि का स्वास्थ्य दर्शन निःसंदेह विलक्षण है। धन्वंतरि ऋषि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग आरोग्य के अमृत कलश से जुड़ा है। उन्होंने आयुर्वेद को आठ अंगों में बांट कर समस्त रोगों की अनूठी चिकित्सा पद्धति विकसित की थी। उनका काया विज्ञान जीवन के लिए हितकारी और अहितकारी ऋतुचर्या,पथ्य और अपथ्य आहार तथा रोगों के उपचार व बचाव के तरीकों पर अद्भुत जानकारी देता है।

ऋषि धन्वंतरि का अनूठा कोशिका विज्ञान

आप जानकर ताज्जुब किये बिना नहीं रह सकेंगे कि कैसे कोई आयु के आधार पर शरीर के एक-एक अवयव की स्वस्थ और अस्वस्थ माप बता सकता है! पर यह चमत्कार धन्वंतरि ऋषि ने कर दिखाया था। मानव की भोज्य सामग्री का जितना वैज्ञानिक व सांगोपांग विवेचन आचार्य धन्वंतरि ने किया है, वह आज के धुर वैज्ञानिक युग में भी दुर्लभ है। ‘धन्वंतरि संहिता’ आयुर्वेद का प्रतिनिधि ग्रंथ माना जाता है। ऋषि धन्वंतरि के मुताबिक मानव देह की प्रत्येक कोशिका अपने आप में एक अद्भुत संसार है। उनके मुताबिक भौतिक देह एक ऐसा संगठन है जो सृजन और विनाश की प्राकृतिक शक्तियों के मध्य एक सुनिश्चित क्रम और सन्तुलन में ढला रहता है। जब यह सन्तुलन बिगड़ता है तो हमारे काय तंत्र में विकार उत्पन्न हो जाते हैं। उन्होंने स्वास्थ्य को व्यक्ति के ‘स्व’ और उसके परिवेश से संतुलित तालमेल के रूप में परिभाषित किया। ‘यत ब्रह्मांडे-तत पिंडे’ को परिभाषित करने वाले ऋषि धन्वंतरि के अनोखे आयुर्विज्ञान सिद्धांत के अनुसार जिन पंच महाभूतों (जल,अग्नि,आकाश,वायु व धरती) से समूचा विश्व ब्रह्माण्ड निर्मित है, उन्हीं पंचतत्वों से समस्त प्राणियों के देह की भी संरचना हुई है। इसलिए प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित किये बिना हम कभी स्वस्थ नहीं रह सकते। गौरतलब हो कि आयुर्वेद के आचार्य सुश्रुत मुनि ने ऋषि धन्वंतरि से ही आयुर्वेद शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था। उनके बाद में चरक ऋषि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इन्हीं के वंश में शल्य चिकित्सा के जनक दिवोदास हुए। जिनके शिष्य महर्षि विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत हुए जिन्होंने आयुर्वेद का महानतम ग्रन्थ ‘सुश्रुत संहिता’ की रचना की।

त्रयोदशी से अमावस्या तक औषधि निर्माण

तन्त्रशास्त्र में वर्णन मिलता है कि प्राचीनकाल में वैद्यगण विभिन्न जड़ी-बूटियों से औषधि बनाने का कार्य त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर अमावस्या (दीपावली) तक की अवधि में करते थे। शरद पूर्णिमा के बाद यह पहली अमावस्या जाड़े की भूमिका प्रस्तुत करती है। गुलाबी ठंड का यह मौसम स्वास्थ्य लाभ के लिए सबसे अच्छा माना है। इस काल में औषधि का उपयोग भी स्वास्थ्य के लिए अधिक रोग मुक्ति के लिए कम होता है। वस्तुतः धनतेरस लक्ष्मी की वृध्दि के साथ स्वास्थ्य वर्धन का भी पर्व है। इस पर्व के समस्त पूजा विधानों का अर्थ केवल उस चेतना का विकास, संवर्धन, उन्नयन करना है जिससे व्यक्ति के मन, बुध्दि, चित्त और अहंकार का सहज परिमार्जन हो सके। आचार्य धन्वंतरि चाहे देवता रहे हों या वैज्ञानिक अथवा अलौकिक मानव किन्तु इनता निश्चित है कि उन्होंने लोक कल्याण की भावना और मानव जाति के लिए जरा व्याधि से मुक्त करने का अभूतपूर्व महान आदर्श हमारे लिए प्रस्तुत किया है।

दुनिया को उम्मीद की नयी किरण दिखा रहा है भारतीय आयुर्वेद

हमारे यहां पहला सुख निरोगी काया माना गया है तथा धन्वंतरि ऋषि प्रणीत हमारा आयुर्वेद युगों युगों से दुनिया को निरोगी जीवन के अनोखे सूत्र देता आ रहा है। यह आयुर्वेद हमारी अमूल्य धरोहर है। हमारे जंगल,पर्वत और गांव अद्भुत जड़ी-बूटियों का भंडार हैं। एक अध्ययन के अनुसार भारत के जंगलों में पांच हजार से अधिक जड़ी-बूटियां पायी जाती हैं। आज हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि वर्तमान समय में जब समूची दुनिया बीमारियों का घर बनती जा रही है। आज जब पूरा विश्व समाज एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव से जूझ रहा है; ऐसे में हमारा भारतीय आयुर्वेद को पूरी दुनिया को उम्मीद की नयी किरण दिखा रहा है। काबिलेगौर हो कि कोरोना संकट के भयावह आपदकाल में हमारा आयुर्वेद भले ही अपनी उपयोगिता साबित कर चुका है मगर आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरने के लिए इस दिशा में अभी व्यापक अनुसंधान तथा मानकीकरण की जरूरत है ताकि ये औषधीय पौधे चिकित्सीय प्रयोगों के अनुकूल साबित हो सकें। साथ ही हमें अपने इस अमूल्य स्वास्थ्य भंडार के गहन अध्ययन के साथ इसको बचाने और औषधीय पौधों एवं जड़ी-बूटियों के संरक्षण के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए व्यापक स्तर पर जन जागरूकता फैलानी होगी।

आयुर्वेद को बढ़ावा देने के उत्साहवर्धक प्रयास

हर्ष का विषय है कि ‘राष्ट्रीय मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड’ और ‘वन विभाग’ द्वारा देश में जड़ी-बूटियों की पैदावार बढ़ाने तथा उसके संरक्षण के लिए बेहतर प्रयास किये जा रहे हैं। आज जब समूचा विश्व भौतिकतावाद की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहा है। अधिकांश लोगों का जीवन तनाव,स्पर्धा व आपाधापी से भरा हुआ है। ऐसे में हमारा आयुर्वेद वर्तमान में व्याप्त रोगों की रोकथाम, उपचार और उनके प्रबंधन का एक सशक्त माध्यम बने,यह प्रत्येक देशवासी की सामूहिक जिम्मेदारी है। ज्ञात हो कि भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों से आयुर्वेद के साथ-साथ चिकित्सा की अन्य प्रणालियों जैसे यूनानी, सिद्धा, नैचुरोपैथी और होमियोपैथी को बढ़ावा देने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया है। आयुष मंत्रालय ने देश में व्यापक स्तर पर आयुष अस्पताल स्थापित करने के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता दी है। इन अस्पतालों का निर्माण व गठन कार्य विभिन्न स्तरों पर गति पकड़ रहा है। ‘सीमैप’ लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक महेंद्र दारोरकर के अनुसार सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा किए गए प्री क्लीनिकल और क्लीनिकल प्रयोगों में पाया गया है कि केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद और CSIR-की संस्था सीमैप, लखनऊ द्वारा डायबिटीज नियंत्रण के लिए विकसित आयुर्वेदिक दवाएं टाइप 2 डायबिटीज, ओस्टियो आर्थराइटिस और रूमेटोइड आर्थराइटिस के नियंत्रण में काफी मददगार साबित हुई हैं। संस्था द्वारा विकसित दवा की प्रमाणिकता की जांच के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की सहायता से और भी चिकित्सीय प्रयोग किए जा रहे हैं। आज जब संपूर्ण विश्व के लिए डायबिटीज एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में यदि हमारी आयुर्वेदिक दवाएं डायबिटीज के प्रबंधन में अपनी उपयोगिता साबित कर देती हैं तो यह डायबिटीज की चुनौती से निपटने में भारत का एक बहुत बड़ा योगदान होगा।

त्रयोदशी की पूजन परम्पराएं

स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि जिन परिवारों में त्रयोदशी के दिन प्रात:काल स्नान कर पर्व की प्रतिनिधि देव शक्तियों के समक्ष दीपदान कर आरोग्य नियमों के पालन व धन के सुनियोजन के सत्संकल्प लिये जाते हैं वहां श्री सम्पदा व आरोग्य सुख सदा बना रहता है। ऋषि मनीषा कहती है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ शरीर से ही संभव है। इसीलिए इस दिन आरोग्य प्रदाता भगवान् धन्वन्तरि की पूजा आराधना अवश्य की जानी चाहिए। आयुर्वेद के मनीषी विद्वान इस दिन आरोग्य के आचार्य ऋषि धन्वंतरि की पूजा अर्चना कर उनसे प्रार्थना करते हैं ताकि उनकी औषधियां आरोग्य प्रदायक हो सकें।

पौराणिक मान्यता के मुताबिक त्रयोदशी को आचार्य धन्वंतरि के पूजन अनुष्ठान के साथ संध्याकाल को यमदीप दान के उपरान्त धन-सम्पत्ति की प्रदाता देवी लक्ष्मी के साथ देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर का पूजन शुभ माना जाता है। इस दिन प्रदोषकाल में नदी, घाट, गोशाला, कुआं, बावली, मंदिर आदि स्थानों पर दीपदान करना भी पुण्य फलदायी माना गया है। इस दिन लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं के साथ बर्तन, आभूषण व नयी झाडू खरीदने की प्राचीन परम्परा है। जानना दिलचस्प हो कि ‘पीतल’ आचार्य धन्वंतरि की प्रिय धातु मानी जाती है। साथ ही इस दिन चांदी खरीदना भी शुभ माना जाता है। इसका कारण यह माना जाता है कि चांदी चंद्रमा का प्रतीक है, जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है।

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