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विश्वगुरु बनने की तैयारी, मुख्यमंत्री माझी ने बताया कैसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बदल रही है शिक्षा व्यवस्था

नई शिक्षा नीति 2020 वास्तव में भारतीय विचार और आधुनिक ज्ञान के बीच एक सेतु है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इक्कीसवीं सदी की पहली शिक्षा नीति है, जिसका उद्देश्य हमारे देश की विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करना है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Mahak Singh
Oct 15, 2025, 05:07 pm IST
in ओडिशा

नई शिक्षा नीति 2020 वास्तव में भारतीय विचार और आधुनिक ज्ञान के बीच एक सेतु है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इक्कीसवीं सदी की पहली शिक्षा नीति है, जिसका उद्देश्य हमारे देश की विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करना है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने यह बयान केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी में आयोजित “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर चर्चा सत्र में भाग लेते हुए दिया।

भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा से ज्ञान-सशक्त भारत की दिशा में कदम

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की शिक्षा नीति 2020 हमारी परंपरा और मूल्यों पर आधारित है। यह नीति SDG-4 (सतत विकास लक्ष्य-4) के अनुरूप, इक्कीसवीं सदी की शिक्षा की अपेक्षित दिशा को सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा संरचना, शासन और प्रबंधन के सभी पहलुओं में सुधार और पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर बल देती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति की सृजनात्मक क्षमता के विकास पर विशेष ध्यान देना है। उन्होंने कहा कि यह नीति इस सिद्धांत पर आधारित है कि शिक्षा केवल ज्ञानगत क्षमता का विकास नहीं है, बल्कि साक्षरता, संख्यात्मक दक्षता, मौलिक कौशल और विश्लेषणात्मक सोच का समुचित विकास भी आवश्यक है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय लोकाचार पर आधारित एक ऐसी शिक्षा प्रणाली पर केंद्रित है, जो भारत के रूपांतरण में प्रत्यक्ष योगदान देगी। इसका लक्ष्य एक समानता और उत्साहपूर्ण ज्ञान-आधारित समाज में सभी को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करना है, जिससे भारत ज्ञान की एक विश्व शक्ति बन सके।

उन्होंने युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से परिचित कराने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जिसने विदेशी आक्रमणों के बावजूद अपनी प्राचीन ज्ञान और संस्कृति को अक्षुण्ण रखा है। इस विरासत को सुरक्षित और सक्रिय रखना हम सभी का दायित्व है। उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान और संस्कृति का संरक्षण राष्ट्र का परम कर्तव्य है। भारत ने कला, संगीत, साहित्य, न्याय, दर्शन, स्थापत्य, योग, विज्ञान, धातु विज्ञान, ज्योतिष, भूगोल, गणित, चिकित्सा, रसायन और कृषि जैसे सभी क्षेत्रों में अमूल्य योगदान दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य उत्तम नागरिकों का निर्माण करना है-ऐसे व्यक्तियों का, जिनमें तर्कसंगत सोच, करुणा, समानुभूति, साहस, स्थिरता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सृजनात्मक कल्पना और नैतिक मूल्यों का विकास हो। उन्होंने कहा कि एक आदर्श शिक्षण संस्था वह होती है, जहां विद्यार्थी स्वयं को अपने दूसरे घर में होने का अनुभव करें, जहां सुरक्षित, प्रेरणादायक और समानतापूर्ण वातावरण उपलब्ध हो।

उन्होंने यह भी कहा कि यह शिक्षा नीति विद्यार्थियों में संवैधानिक मूल्यों और देशभक्ति की भावना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। शिक्षा केवल व्यक्तिगत हित के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए है, यही भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल संदेश है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जैसे हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने शिक्षा को सर्वहितकारी बनाया था, उसी का अनुकरण आज की शिक्षा प्रणाली में आवश्यक है। भारतीय चिंतन और अनुसंधान ने कला, साहित्य, विज्ञान, न्याय, दर्शन, योग, ज्योतिष, गणित, चिकित्सा और कृषि सहित सभी क्षेत्रों में महान योगदान दिया है, इन्हें युवा पीढ़ी के समक्ष लाना अत्यंत आवश्यक है।

भारतीय चिंतन और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर तीन दिवसीय संगोष्ठी

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “जनकल्याण ही शासक का सच्चा आनंद है।” उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतांत्रिक चिंतन का आधार कर्तव्य और प्रजाधर्म है, जहाँ शासक और प्रजा का संबंध पिता–पुत्र समान है।

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय चिंतन और आधुनिक ज्ञान के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते हुए वैश्विक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ सकते हैं। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि शिक्षा केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन निर्माण का आधार है। वर्तमान समय में हमारी शिक्षा प्रणाली में भारतीय मूल्य, आदर्श और सांस्कृतिक चेतना को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि हम शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का साधन मानेंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ी ज्ञानवान, कर्तव्यनिष्ठ और देशभक्त नागरिक बनेगी।

इस अवसर पर भारतीय विश्वविद्यालय संघ के सलाहकार डॉ. पंकज मित्तल और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी के निदेशक प्रोफेसर प्रभात कुमार महापात्र प्रमुख रूप से उपस्थित थे। उल्लेखनीय है कि इस कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा सुधार और नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों पर गहन चर्चा और विचार-विमर्श हुआ। संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय शिक्षा चिंतन और पारंपरिक ज्ञान संपदा को आधुनिक शिक्षा के साथ समन्वित करना है। तीन दिवसीय इस संगोष्ठी में “शिक्षा और भारतीय मूल्य”, “भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा का समन्वय”, तथा “राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आधारभूमि और दिशा-निर्देश” जैसे विषयों पर विशेष सत्र आयोजित किए गए।

Topics: Central Sanskrit University PuriIndian knowledge traditionNational Education PolicyNew Education Policy 2020NEP 2020Indian Value Based EducationCM Mohan Charan Majhi
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