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विकसित भारत के लिए महिलाओं का सशक्तिकरण : श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी

भारत जैसे देश में महिला श्रम बल भागीदारी को सही मायनों में अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारतीय महिलाएं आज अपने भविष्य को लेकर पहले से कहीं अधिक सजक हुई हैं।

Written byसुनीता मिश्रासुनीता मिश्रा
Oct 14, 2025, 06:37 pm IST
inभारत, विश्लेषण

विकास योजनाओं में हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत केंद्र सरकार ने 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा करने के लिए महिलाओं के आर्थिक समावेशन पर ध्यान केंद्रित किया गया। भारत की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने, कार्यबल में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। सरकार यह भली भांति जानती है कि आधी आबादी को शिक्षा, कौशल, सुरक्षा और उद्यमिता के जरिए सशक्त बनाए बिना राष्ट्र का विकास संभव नहीं है।

इसी उद्देश्य के साथ पिछले वर्ष बजट में लड़कियों एवं महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं के लिए तीन लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए। ताकि इस राशि का उपयोग उनके कौशल विकास कार्यक्रम, स्वयं सहायता समूहों के लिए बाजार तक पहुंच को सक्षम बनाने और उन्हें रोजगार देने में हो सके।

महिला श्रम बल भागीदारी अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन

भारत जैसे देश में महिला श्रम बल भागीदारी को सही मायनों में अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारतीय महिलाएं आज अपने भविष्य को लेकर पहले से कहीं अधिक सजक हुई हैं। वे कुप्रथाओं की बेड़ियां तोड़कर अपनी मेहनत के दम पर हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। महिलाएं घर, बच्चों को संभालने के साथ-साथ नौकरी भी कर रही हैं। स्वाभिमान के साथ स्वावलंबन की ओर बढ़ रही हैं। भारत में महिला कार्यबल भागीदारी दर में खासी वृद्धि देखी गई है। 2017-18 से 2023-24 के बीच महिला रोजगार दर करीब दोगुनी हो गई है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, महिला श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है। यह ग्रामीण उत्पादन में महिलाओं के बढ़ते योगदान को दर्शाता है। गांव में खेती-बाड़ी से लेकर पशुओं के दूध का कारोबार, ये सभी काम ज्यादातर महिलाएं ही करती हैं। वहीं, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं के लिए श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) 2017-18 में 22 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 40.3 प्रतिशत हो गया है।

श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी

हाल ही में जारी किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, महिला श्रम बल भागीदारी जुलाई 2025 में 31.6 प्रतिशत और जून 2025 में 30.2 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त 2025 में 32.0 प्रतिशत हो गई। इसी तरह महिला एलएफपीआर जुलाई 2025 में 33.3 प्रतिशत और जून 2025 में 32.0 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त 2025 में 33.7 प्रतिशत हो गई। इसके अलावा, ईपीएफओ के ताजा पेरोल आंकड़ों ने महिलाओं में औपचारिक रोजगार के बढ़ते रुझान को उजागर किया है। 2024-25 के दौरान, ईपीएफओ में 26.9 लाख कुल महिला सदस्य जुड़ीं। जुलाई 2025 में, करीब 2.80 लाख नई महिला सदस्य जुड़ीं और महिलाओं के पेरोल में कुल वृद्धि करीब 4.42 लाख रही, जो आज के अधिक समावेशी और कार्यबल में वृद्धि की पुष्टि करता है।

पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम है श्रम में भागीदारी

उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि महिलाओं की श्रम में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम है। स्वतंत्रता के पश्चात महिलाओं को लेकर सभी कार्य क्षेत्रों में काफी बदलाव देखने को मिले हैं, उनका सम्मान भी बढ़ा है। लेकिन आज भी कई जगहों पर वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। वर्तमान में कुछ सामाजिक व्यवहार उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं देते। शिक्षा, रोजगार और इनसे जुड़े अधिकारों के लिए महिलाओं का संघर्ष बहुत पुराना है, जो अब भी जारी है। महिला सशक्तिकरण किसी देश के लिए आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर हालात बदलने वाला साबित होता है, लेकिन आज भी महिलाओं के सामने सबसे बड़ी बाधा अपने गृहनगर से बाहर निकलकर किसी अन्य नगर में रहकर अपना योगदान दे पाना है। कई बार महिलाओं को पुरुषों की भांति कामकाज के सिलसिले में घर-परिवार छोड़कर अन्य स्थान पर जाना पड़ता है। वहां उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर निजी हास्टल संचालक उनका आर्थिक शोषण करते हैं। वहीं, एकल परिवारों में रहने वाली महिलाओं के लिए बच्चों की परवरिश और करियर के बीच संतुलन बनाना काफी मुश्किल होता है। पहले बच्चे को जन्म देने वाली कई माताओं को शिशु की बेहतर देखभाल के लिए मजबूरी में अपनी नौकरी तक छोड़नी पड़ती है, जिसके लिए उन्होंने कई वर्षों तक कठिन परिश्रम किया होता है।

भारत महिला विकास से महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास की ओर बढ़ा

भारत पिछले 11 वर्षों में ‘महिला विकास’ से ‘महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास’ की ओर बढ़ा है। चिकित्सा का क्षेत्र हो या खेल का मैदान, व्यवसाय हो या राजनीति देश में अनेक क्षेत्रों में न केवल महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, बल्कि वे हर क्षेत्र में आगे आकर नेतृत्व कर रही हैं। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में, भारत ने ब्रिक्स देशों में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी में सबसे महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की है। बैंकों ने भी जिन करोड़ों लोगों को लोन दिया है, उनमें से करीब 70 प्रतिशत लाभार्थी देश की महिलाएं हैं। स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया के तहत लागू की गई योजनाएं महिलाओं की उद्यमिता और कौशल विकास को निरंतर समर्थन दे रही हैं। यही नहीं मोदी सरकार के कार्यकाल में महिलाओं के लिए करोड़ों शौचालय बनाए गए। पीएम उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ कनेक्शन महिलाओं को दिए गए। जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं से महिलाओं का कायाकल्प किया गया। पीएम आवास योजना के तहत बने तीन करोड़ से अधिक घर महिलाओं के नाम पर हैं। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की वार्षिक आय एक लाख रुपये करने के उद्देश्य से ‘लखपति दीदी योजना’ की शुरुआत की गई। इस समूह से जुड़कर कई महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं। केंद्र सरकार ने नवंबर 2024 में महिला स्वयं सहायता समूह को ड्रोन उपलब्ध कराने के लिए 1261 करोड़ रुपये की ‘नमो ड्रोन दीदी योजना’ को मंजूरी दी। इस योजना का लक्ष्य स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को ड्रोन मुहैया कराने का है।

महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षा प्रदान के लिए कई कानून लागू

भारत में श्रम कानूनों में रोजगार को विनियमित करने और महिला श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से कई प्रावधान शामिल किए गए हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम, यौन उत्पीड़न अधिनियम, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और मिशन शक्ति जैसे कानून लागू किए गए हैं। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961, जो महिला कर्मचारियों को मातृत्व लाभ प्रदान करता है, उसे 2017 में संशोधित किया गया था, जिसके तहत मातृत्व अवकाश को 12 से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया गया है। मातृत्व अवकाश प्रदान करने के अलावा, अधिनियम में यह भी अनिवार्य किया गया है कि 50 या अधिक कर्मचारियों वाले नियोक्ताओं को कार्यस्थल पर एक शिशुगृह (क्रेच) स्थापित करना और उसका रखरखाव करना होगा। इस शिशुगृह का मकसद बच्चों की जरूरतों को पूरा करना है, जिससे कामकाजी माताओं को काम के घंटों के दौरान अपने बच्चों को एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ने का एक सुविधाजनक तरीका मिल सके। अब इस अधिनियम में सरोगेट माताओं के लिए भी प्रावधान शामिल हैं, जिसका उद्देश्य कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी को समर्थन और बढ़ावा देना है। लेकिन इन प्रावधानों के बावजूद कई महिलाओं को बच्चे को जन्म देने के बाद अपना कार्यस्थल छोड़ने के लिए मजबूर होती हैं, क्योंकि गर्भधारण एवं मां बनने के बाद महिलाओं को निजी कंपनियों में आवश्यकतानुसार छुट्टियां और अन्य सुविधाएं नहीं दी जाती हैं। यहां तक कि कुछ निजी कंपनियां मातृत्व अवकाश के दौरान महिलाओं को वेतन देने से बचने के लिए उन्हें नौकरी तक से निकाल देती हैं।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना से मिल रही महिलाओं के सशक्तिकरण में मदद

पीएमएमवाई से केवल घरेलू कामकाज या मौसमी मजदूरी करने वाली महिलाएं अब सक्रिय रूप से सिलाई यूनिट्स, ब्यूटी पार्लर, फूड स्टॉल, कृषि प्रसंस्करण उद्यम और खुदरा दुकानें जैसे सूक्ष्म उद्यम शुरू कर रही हैं। वर्ष 2015 में शुरू की गई पीएमएमवाई योजना सूक्ष्म और लघु उद्यमों को छोटे ऋण (20 लाख रुपये तक) प्रदान करती है। आंकड़ों के अनुसार पीएमएमवाई के लाभार्थियों में से लगभग 68 प्रतिशत महिलाएं हैं। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 का उद्देश्य संगठित, असंगठित और अन्य क्षेत्रों के सभी कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करना है। यह श्रमिकों को मातृत्व, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करके महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत करती है।

मिशन शक्ति योजना महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 1 अप्रैल, 2024 को ‘मिशन शक्ति’ लागू किया। मिशन शक्ति योजना देश भर में महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक रही है। मिशन शक्ति की दो उप-योजनाएं हैं। पहली ‘संबल’, जिसमें वन स्टाप सेंटर, महिला हेल्पलाइन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और नारी अदालत सहित महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। दूसरी ‘सामर्थ्य’ है, इसमें प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, पालना, सखी निवास और महिला सशक्तीकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा फरवरी 2015 में दिए गए आंकड़ों के ​मुताबिक, वन स्टॉप सेंटर के माध्यम से 10.61 लाख महिलाओं की सहायता की गई है, जबकि महिला हेल्पलाइन ने संकट में फंसी लाखों महिलाओं की मदद की है। आर्थिक सशक्तिकरण के लिए सखी निवास, कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित आवास प्रदान करता है और पालना एवं डे-केयर सहायता सुनिश्चित करता है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत किया गया कुल व्यय भी पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है।

नारी शक्ति के बिना देश का विकास संभव नहीं

जिस प्रकार बिना नारी शक्ति के बिना सृष्टि का निर्माण संभव नहीं है। उसी प्रकार आधी आबादी के सशक्त हुए बिना देश का विकास संभव नहीं है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने की राह में प्रमुख स्तंभों में से एक है, कार्यबल में महिलाओं की कम से कम 70 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करना, ताकि वे भारत की विकास गाथा में समान हितधारक बन सकें। केंद्र सरकार द्वारा भारतीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के प्रयास सराहनीय हैं। महिला सशक्तिकरण विकास को गति देता है और समावेशी अर्थव्यवस्था का निर्माण करता है। इससे जल्द ही भारत के विकसित राष्ट्र बनने का सपना भी पूरा हो सकेगा।

Topics: बीजेपीकेंद्र सरकारप्रधानमंत्री मोदीविकसित भारतमहिलाओं का सशक्तिकरणEmpowering Women for a Viksit BharatEmpowering WomenMaternity Benefit Act
सुनीता मिश्रा
सुनीता मिश्रा
हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री। इग्नू दिल्ली से राजनीतिक विज्ञान में मास्टर डिग्री। पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव। [Read more]
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