याह्या खान अक्सर याद आते हैं। 1971 में, जब पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश विश्व मानचित्र पर एक नए देश के रूप में उभरा, तब पाकिस्तान में मार्शल लॉ लागू था और याह्या खान राष्ट्रपति व सेनापति, दोनों पदों पर आसीन थे। उनका उस समय का एक चर्चित कथन है–‘मुझे पूर्वी पाकिस्तान की जमीन चाहिए, लोग नहीं।’ इस दृष्टि से याह्या खान आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि पाकिस्तान की सरकारें तब से लेकर अब तक इसी नीति पर चलती रही हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) से लेकर सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा तक असंतोष सुलग रहा है और विद्रोह का लावा कभी एक इलाके में फूटता है, तो कभी दूसरे में। कब कौन-सा इलाका पाकिस्तान से अलग हो जाए, कहना कठिन है।
पहले बात अपने इलाके अर्थात् अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर की। जब से मोदी सरकार ने कश्मीर में किश्तों में शांति खरीदने और आतंकवादियों को साथ बैठाकर बिरयानी खिलाने की कांग्रेस सरकार की नीति को खूंटी पर टांगा, कश्मीर की फिजां बदलने लगी। फिर जब अगस्त 2019 में सरकार ने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए विभाजनकारी अनुच्छेद-370 और अनुच्छेद 35ए को खत्म किया, तो कश्मीर बिल्कुल बदल गया और इसका प्रभाव राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक, हर तरह से पड़ा। कश्मीर में विकास का नया दौर शुरू हुआ। लेकिन इसका असर अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर पर भी पड़ा।
कसक और आस
हाल के वर्षों में अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान विरोधी आवाजें आम हो गई हैं। लोग पाकिस्तान से आजादी और भारत के समर्थन में नारे लगाने से भी नहीं हिचकते। ‘पाकिस्तान होश में आओ’, ‘पीओके आजाद होगा’, ‘हक हमारा लौटाओ’ जैसे नारे वहां की सड़कों पर अक्सर गूंजते हैं।
इसका कारण स्पष्ट है। उन्हें दिख रहा है कि नियंत्रण रेखा के इस पार कश्मीर में लोग सुविधाओं और विकास के साथ आगे बढ़ रहे हैं, जबकि पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से में जिंदा रहने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ रही है। उन्हें एहसास है कि अगर वे भारत का हिस्सा होते, तो उन्हें भी सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन मिलता।
यही कारण है कि जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गत 21 सितंबर को मोरक्को में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘मैंने 5 साल पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना को संबोधित करते हुए भी कहा था कि अधिक्रांत कश्मीर को आक्रमण करके लेने की
जरूरत नहीं पड़ेगी।’’ उनका यह बयान बदलती जमीनी हकीकत का संकेत था।
हमारा है, हमारा होगा
अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर को वापस लेने की भारत की प्रतिबद्धता स्पष्ट है। संसद पहले ही इसे अपना संकल्प बना चुकी है। हालांकि यूपीए शासन के दौर में नियंत्रण रेखा को स्थायी सीमा मानकर समझौते की बातें उठी थीं, लेकिन आज देश एक स्वर में बोलता है-सरकार से लेकर समाज तक। भाजपा ने अपने पूर्ववर्ती संगठन जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान को अपनी प्रेरणा बनाया। मुखर्जी कश्मीर को विशेष दर्जा देने के विरोधी थे और मानते थे कि यह व्यवस्था कश्मीर को भारत से दूर कर देगी। उन्हें जेल में डाल दिया गया, जहां संदिग्ध परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। लेकिन भाजपा ने उनके संकल्प को अपनी नीति में जीवित रखा। इसी भावना का विस्तार संसद में तब झलका, जब गृहमंत्री अमित शाह ने अनुच्छेद-370 और 35ए हटाने पर कहा, ‘‘कश्मीर की सीमा में पीओके भी शामिल है… हम इसके लिए जान भी दे सकते हैं… पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।’’
इसी तरह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी हमेशा कश्मीर को लेकर भारतीय समाज की आकांक्षा को अपनी नीति के केंद्र में रखा है। इसका ताजा उदाहरण है गत 5 अक्तूबर को मध्यप्रदेश के सतना में सिंधी समाज के एक कार्यक्रम में रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत द्वारा दिया गया बयान, जिसमें उन्होंने अधिक्रांत जम्मू- कश्मीर के बारे में अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। उन्होंने कहा, ‘‘पूरा भारत एक घर है… मेरे घर का एक कमरा जिसमें मेरा कुर्सी-टेबल रहता था, उसे किसी ने हथिया लिया है। … कल मुझे उसे वापस लेकर फिर से अपना डेरा डालना है।’’ भारत की इस अटूट प्रतिबद्धता का प्रभाव नियंत्रण रेखा के उस पार भी दिखता है, जहां लोगों में
उम्मीद जग रही है कि एक दिन उन्हें भी आजादी और सम्मान की जिंदगी मिलेगी।

क्यों उबला अधिक्रांत जम्मू- कश्मीर
पीओजेके में आटे की बढ़ती कीमतों और बिजली की किल्लत के खिलाफ हाल के वर्षों की तरह इस बार भी बड़े पैमाने पर लोग सड़कों पर उतरे। पाकिस्तान सरकार ने पहले फौजी बूटों से आंदोलन को कुचलने की कोशिश की और नाकाम होने पर सुलह का रुख अपनाया। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में जहां वह केवल बल प्रयोग करता है, वहीं पीओजेके में उसे पता है कि ऐसा कुछ किया तो इस इलाके के हाथ से निकलने में देर नहीं लगेगी। खासकर जब भारत साफ कह चुका है कि पीओजेके उसका अभिन्न हिस्सा है और उसे लेकर रहेगा।
हाल की हिंसा में कम-से-कम 12 लोगों की मौत हुई, जिनमें नागरिक और सुरक्षा बल-दोनों शामिल हैं। सबसे अधिक हिंसा मुजफ्फराबाद, बाग जिले के धिरकोट और मीरपुर में हुई, जहां फौज ने गोलियां बरसाईं और बमबारी की। इस झड़प में तीन सुरक्षाकर्मी भी मारे गए, 100 से अधिक लोग घायल हुए।
28 सितंबर को शुरू हुए प्रदर्शन का नेतृत्व संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने किया, जिसमें व्यापारी, ट्रांसपोर्टर, छात्र, वकील और सिविल सोसाइटी के सदस्य शामिल रहे। आंदोलन की शुरुआत गेहूं की बढ़ती कीमतों और ऊंची बिजली दरों के विरोध से हुई, जिसे सरकार ने हल्के में लिया और पूरा पीओके भड़क उठा।
आतंकवादियों का इस्तेमाल
28 सितंबर को मुजफ्फराबाद के नीलम ब्रिज पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस में झड़प हुई। शाम तक गोलियां चलने से हिंसा भड़क गई। मीरपुर, डड्डयाल, कोटली और रावलकोट में भी झड़पें शुरू हो गईं। हालात पर काबू पाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने 6,000 से अधिक सुरक्षा बल तैनात किए और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं।
उधर, रावलकोट में माहौल शांत करने के बजाय पाकिस्तान सरकार ने नई चाल चली। उसने जम्मू-कश्मीर पीपुल्स पार्टी की गाड़ी में हथियार भेजे। जेपीपीसी नेता उमर नजीर कश्मीरी ने खुलासा किया कि ये आतंकियों के लिए भेजे गए थे और उनके पास इसके वीडियो सबूत भी हैं। उन्होंने कहा कि कभी सम्मानित नेता रहे सरदार खालिद इब्राहिम खान की पार्टी अब पाकिस्तान सरकार के इशारों पर यहां के अवाम के खिलाफ दहशतगर्दों का साथ दे रही है। खालिद इब्राहिम आजाद कश्मीर के पहले राष्ट्रपति सरदार मोहम्मद इब्राहिम खान के पुत्र थे। 2018 में उनका निधन हुआ।
शांति हुई, पर कब तक रहेगी?
बहरहाल, सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच कई दौर की बैठकें हुईं। पहली बड़ी बैठक 1 अक्तूबर को मीरपुर में हुई। फिर 2-3 अक्तूबर को लंबी बैठक चली, जिसमें दोनों पक्षों में सुलह हो गई। बैठक में सरकार की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ, संसदीय मामलों के मंत्री तारिक फल चौधरी शामिल हुए, तो जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमिटी (जेकेजेएएसी) की ओर से शौकत नवाज मीर, तिलायत नवाज और अन्य जिला व्यापारी संगठन के प्रतिनिधि।
सरकार ने प्रदर्शनकारियों की सभी प्रमुख मांगें मान ली हैं और हिंसा रुक गई है। लेकिन पाकिस्तान ने जो शांति खरीदी है, वह कब तक चलती है, यह देखना होगा। 2024 में भी अधिक्रांत जम्मू- कश्मीर में उबाल को ठंडा करने के लिए शाहबाज शरीफ सरकार ने 23 अरब रुपये के पैकेज की घोषणा की थी, जो पूरी तरह जमीन पर उतर ही नहीं पाया और लोगों का सब्र एक साल होते-होते टूट गया। वैसे, ध्यान देने वाली एक और बात है, जम्मू-कश्मीर में यूपीए सरकार ‘शांति खरीदने’ की जिस नीति पर चल रही थी, मोदी सरकार ने पाकिस्तान सरकार को उसी नीति को अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है और पड़ोसी की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि वह इस तरह का महंगा सौदा लंबे समय तक करता रहे। लंबे समय की कौन कहे, इस बार का वादा भी पूरा हो जाए तो बड़ी बात होगी।
बलूचिस्तान यानी धधकता ज्वालामुखी
1948 से पाकिस्तान के कब्जे से आजादी की लड़ाई लड़ रहे बलूचों का जज्बा समय के साथ और मजबूत हुआ है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की तरह, यहां भी शांतिपूर्ण और सशस्त्र-दोनों तरह के आंदोलन चल रहे हैं। बलोच नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) और बलूच रिपब्लिकन पार्टी (बीआरपी) शांतिपूर्ण संघर्ष में जुटी हैं, जबकि बशीर जेब की अगुआई वाली बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और अल्लाह नजर बलोच की अगुआई वाला बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) हथियारबंद मोर्चे पर है। बीएलए और बीएलएफ ने पाकिस्तानी फौज के साथ-साथ चीनी इंजीनियरों-कर्मचारियों को भी कई बार निशाना बनाया है।
घातक हमलों के बाद ग्वादर बंदरगाह को कई बार महीनों तक बंद करना पड़ा। इसी साल की शुरुआत में जाफर एक्सप्रेस पर हमला कर सैकड़ों पाकिस्तानी सैनिकों को मारने का दावा करने वाला बीएलए पाकिस्तान सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है। बीते एक वर्ष में जाफर एक्सप्रेस पर आठ बार हमले हो चुके हैं, एक तो अभी कुछ दिन पहले ही हुआ। क्वेटा-पेशावर के बीच चलने वाली इस ट्रेन में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक यात्रा करते हैं। इसी कारण बलूच लड़ाके इसे बार-बार निशाना बनाते हैं।
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान एक सुलगता ज्वालामुखी बन चुका है, जिसने कई बार इस्लामाबाद को हिलाया है। बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई को व्यापक जनसमर्थन मिला है। पाकिस्तानी फौज के मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ आवाज उठाने वाली मेहरंग बलोच को लगातार हिरासत में रखा गया है, जिससे सरकार की घबराहट साफ झलकती है। पाकिस्तान ने हमेशा ताकत के जोर पर बलूच आंदोलन दबाने की कोशिश की। उसे संसाधन चाहिए, लोग नहीं-याह्या खान वाली मानसिकता आज भी कायम है।
परिणामस्वरूप, बलूच अब किसी भी हालत में पाकिस्तान के साथ रहना नहीं चाहते। इसके अतिरिक्त, हाल में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के संसाधनों को लेकर अमेरिका से संपर्क साधा है, जिससे यह इलाका एक नया कूटनीतिक अखाड़ा बन सकता है। इस पर चीन की प्रतिक्रिया और संभावित अमेरिकी हस्तक्षेप आने वाले समय में हालात और जटिल कर सकते हैं। इस बीच, बीएनएम के वरिष्ठ संयुक्त सचिव कमाल बलोच ने स्पष्ट कहा, ‘‘हम केवल एक बात जानते हैं-बलूचिस्तान को पाकिस्तान के अवैध कब्जे से मुक्त होना चाहिए। इसके रास्ते में पाकिस्तान आया, चीन आया… बलूचों ने उसका सामना किया। जो भी हमारे संसाधनों की लूटपाट करेगा, उसे इसकी कीमत चुकानी होगी।’’

सिंधुदेश की छटपटाहट
राजस्थान के मरुस्थल के उस पार सिंध है, जिसने हर मौके पर बताया है कि वह पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहता। हाल में यहां आजाद सिंधुदेश के समर्थन में कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए हैं। यह आंदोलन जिये सिंध कौमी महाज और सिंधुदेश लिबरेशन आर्मी जैसे संगठनों के नेतृत्व में चल रहा है, जिसका उद्देश्य सिंध की सांस्कृतिक पहचान, भाषा और संसाधनों की रक्षा करना है। पाकिस्तानी सेना लगातार आंदोलनकारियों को अगवा कर रही है। कई जेलों में बंद हैं, जबकि कुछ लापता बताए जाते हैं। सिंध के लोग सांस्कृतिक दमन और आर्थिक शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। बलूचिस्तान से प्रेरित यह आंदोलन दोनों प्रांतों के साझा संगठन ‘ब्रास’ (बलोच राजी आजोही संगर) के तहत तेज हुआ है, जिसमें बलूचिस्तान के तीन संगठन बीएलए, बीएलएफ और बीआरजी (बलोच रिपब्लिकन गार्ड्स), जबकि सिंध का सिंधुदेश रिवॉल्यूशनरी आर्मी (एसआरए) मिलकर कार्रवाई कर रहे हैं।
सिंध में कराची, हैदराबाद और सक्खर जैसे शहरों में अब यह आंदोलन गहराई तक फैल चुका है। विरोध के रूप में रैलियां, धरने और मार्ग अवरोध आम हो गए हैं। पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद आंदोलन मजबूत हो रहा है और आंदोलनकारी संयुक्त राष्ट्र व मानवाधिकार संगठनों से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। सिंध में अनुकूल स्थिति मिलते ही यह आंदोलन और भड़क सकता है। इधर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सर क्रीक क्षेत्र से पाकिस्तानी गतिविधियों पर चेतावनी दी है कि ‘पाकिस्तान भूल न जाए, कराची यहां से दूर नहीं है।’ सर क्रीक गुजरात और सिंध के बीच 96 किमी. लंबा दलदली इलाका है। इस क्षेत्र में पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर राजनाथ सिंह ने यह चेतावनी दी थी।

जैसी करनी, वैसी भरनी
खैबर पख्तूनख्वा में भी पाकिस्तान वही काट रहा है, जो उसने बोया। एक समय अमेरिकी डॉलर के लालच में उसने अफगानिस्तान में सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए आतंकियों की फौज खड़ी। तीन दशकों से अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिम के इशारे पर पाकिस्तान द्वारा आतंकियों की फौज खड़ी करने की बात स्वीकार करते हुए रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ उसे ‘डर्टी गेम’ कह चुके हैं। इसी में शामिल तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), जिसे राजनीतिक मकसद से बनाया गया था, अब पाकिस्तानी फौज के खिलाफ हो गया है। उसने फौज पर कई हमले किए हैं
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7-8 अक्तूबर को खैबर पख्तूनख्वा के ओरकजई में टीटीपी ने पाकिस्तानी सेना पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें ले. कर्नल जुनैद आरिफ, मेजर तैय्यब रहत समेत 11 सैनिक मारे गए। जवाबी कार्रवाई में 19 आतंकी भी मारे गए। नौबत यहां तक आ गई कि पाकिस्तानी फौज को हवाई हमले करने पड़े। हाल में इस क्षेत्र में लगातार बड़े आतंकी हमले हुए हैं। 13 सितंबर को 12 सैनिक और 35 आतंकी, जबकि 22-23 सितंबर को तिराह घाटी में पाकिस्तान के हवाई हमले में 30 आम लोग और 14 आतंकी मारे गए।
टीटीपी के साथ संघर्ष में बड़ी संख्या में आम नागरिकों की मौतें याह्या खान की हिंसक नीति की याद दिलाती हैं। सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर आरपी सिंह कहते हैं, ‘‘पाकिस्तान की प्रकृति है कि वह आतंकवाद की सवारी छोड़ नहीं सकता और मोदी सरकार की प्रकृति है कि आतंकी घटना होने पर वह छोड़ेगी नहीं। यानी, सिंदूर-2 कभी भी हो सकता है। … तब संभव है कि भूगोल ही बदल जाए।’’
स्पष्ट है, यदि पाकिस्तान में याह्या खान जैसी नीतियां जारी रहीं, तो उसका अंजाम विखंडन के सिवा कुछ नहीं होगा। अब यह पाकिस्तान पर है कि वह इतिहास से सबक लेता है या उसे दोहराने की गलती करता है, क्योंकि इतिहास अपना काम हमेशा पूरी दृढ़ता से करता है।

















