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न्याय के मंदिर में सनातन का अपमान

सनातन का सार न्याय है और न्याय का सार सनातन। सनातन परंपरा में तो पूरा न्याय दर्शन समाहित है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। इन दोनों के सम्मान में ही भारत की असली पहचान सुरक्षित है और यदि हम इस पहचान को ही खो दें, तो हमारे पास न संस्कृति बचेगी और न संविधान।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Oct 10, 2025, 09:12 pm IST
in सम्पादकीय

हाल ही में न्यायालय परिसर में एक अधिवक्ता ने मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की कोशिश की। यह केवल व्यक्तिगत उग्रता का मामला नहीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और भारत के संविधान की मर्यादा पर सीधा प्रहार है। इस घटना से यह प्रश्न उठता है कि आखिर आस्था पर आधारित हमारे लोकतंत्र के प्रति यह अनास्था क्यों? क्यों कुछ लोग उस व्यवस्था को चुनौती देने में गौरव महसूस करते हैं, जो हमें स्वतंत्रता, न्याय और अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करती है।

क्या हमारी संस्कृति ने यही सिखाया है कि जब संवाद कठिन लगे, तो हिंसा को विकल्प बना लिया जाए! यह प्रश्न हमारी सामाजिक चेतना को झकझोरता है। विशेष रूप से तब, जब हमारी परंपरा ने ‘न्यायमूर्ति’ शब्द में ही ‘मूर्ति’ अर्थात् श्रद्धा का भाव समाहित किया है। परंतु आज वही श्रद्धा न्याय के मंदिर में असम्मान के रूप में बदल जाती है। यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति की गंभीर विस्मृति है।

सनातन दृष्टि से ऐसा कृत्य हर स्तर पर निंदनीय और अस्वीकार्य है, क्योंकि यह न केवल आस्था के मूल्यों का हनन है, बल्कि उस सभ्यता पर भी प्रहार है जिसने संवाद, संयम और सम्मान को अपना धर्म माना है।

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 16, श्लोक 2 में स्पष्ट कहा गया है- अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। अर्थात् अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति और अपैशुन्य ही दैवी गुण हैं। यह सिद्धांत हमारे आचरण का मार्गदर्शन करता है, परंतु जूता उठाना या हमला करने जैसे कृत्य इन दैवी गुणों के एकदम विपरीत हैं।

मत भूलिए कि न्यायपीठ का बोधवाक्य ही है- यतो धर्मस्ततो जयः। पीठ की गरिमा के आलोक में इस कृत्य को कैसे देखा जाए! न्याय पर प्रहार का अर्थ है-धर्म पर प्रहार।

सनातन परंपरा हमें संवाद का मार्ग दिखाती है, टकराव का नहीं। हमारे ऋषियों ने असहमति को शास्त्रार्थ का आधार बनाया, हिंसा का नहीं। तो क्या हम अपनी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं या केवल उसके नाम पर शोर मचाने वाले?

आस्था और व्यवस्था का संबंध विरोध का नहीं, पूरकता का है। जो लोग मंदिर की पवित्रता की बात करते हैं, वही संसद को लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं, तो फिर न्यायालय क्या है? निस्संदेह, यह उस लोकतांत्रिक मंदिर का पवित्र स्तंभ है, जो न्याय और संविधान की नींव पर खड़ा है। ऐसे में प्रश्न उठता है- फिर इस स्तंभ पर प्रहार क्यों?

क्या इसलिए कि न्यायालय हर बार हमारी इच्छाओं के अनुरूप निर्णय नहीं देता? क्या इसलिए कि हमने अपनी संवैधानिक मर्यादाओं को राजनीतिक असंतोष के नाम पर तोड़ना शुरू कर दिया है?

इस बढ़ती अनास्था की राजनीति को ईंधन कौन दे रहा है- वे जो स्वयं को सनातनी कहते हैं या वे जो हर व्यवस्था को गिराने में सुख ढूंढते हैं? सनातन दर्शन कहता है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और संविधान हमें भाईचारे व एकता को सशक्त करने का संदेश देता है। फिर यह विभाजन, यह विद्वेष, यह अपमान किसकी शिक्षा है? निश्चित ही न तो यह सनातन की है, न संविधान की। संवैधानिक दृष्टि से भी ऐसा कृत्य न केवल अनुचित, बल्कि पूर्णतः अस्वीकार्य है, क्योंकि यह हमारे लोकतंत्र की आत्मा पर आघात करता है।

अनुच्छेद 19(1)(ए) हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) स्पष्ट करता है कि यह स्वतंत्रता मर्यादा और शांति के विपरीत नहीं हो सकती। अनुच्छेद 51ए प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह संविधान, उसकी संस्थाओं और राष्ट्र की एकता का सम्मान करे।
इसलिए न्यायालय के प्रति हिंसक व्यवहार केवल एक अपराध नहीं, बल्कि संविधान के प्रति अविश्वास का खुला प्रदर्शन है। हमारा लोकतंत्र खूनी क्रांति का प्रतीक नहीं, बल्कि संवाद पर आधारित परिवर्तन का उदाहरण है।

जो लोग न्यायपालिका पर जूता उठाते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि जब उंगली न्यायालय की ओर उठती है, तो उसी हाथ की चार उंगलियां उनके अपने ही आचरण पर प्रश्न खड़ा करती हैं।

लोकतंत्र संवाद से चलता है, टकराव से नहीं। न्यायालय आलोचना से ऊपर नहीं है, परंतु वह निश्चित ही अपमान से परे है। सनातन परंपरा हमें सत्य, संयम और सहिष्णुता का मार्ग दिखाता है, तो फिर हिंसा किस ग्रंथ में लिखी है? यदि लोकतंत्र के इस मंदिर में कहीं धूल जम गई है, तो उसका समाधान उसे तोड़ना नहीं, बल्कि साफ करना है। त्रुटियां हों तो उन्हें सुधारिए, पर आस्था के मंदिर को अपवित्र मत कीजिए।

न्यायमूर्ति पर जूता उठाना केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि समाज की आत्मा पर सीधी चोट है। यह घटना हर दृष्टि से निंदनीय है, क्योंकि यह उस भारत पर प्रहार है जिसकी पहचान ही न्याय, आस्था और अनुशासन है।

सनातन का सार न्याय है और न्याय का सार सनातन। सनातन परंपरा में तो पूरा न्याय दर्शन समाहित है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। इन दोनों के सम्मान में ही भारत की असली पहचान सुरक्षित है और यदि हम इस पहचान को ही खो दें, तो हमारे पास न संस्कृति बचेगी और न संविधान।

इसलिए त्रुटियां सुधारिए, सवाल पूछिए, पर आस्था के मंदिर को अपवित्र मत कीजिए; क्योंकि जब न्याय की गरिमा टूटती है, तब समाज के आत्मविश्वास का आधार ही डगमगा जाता है।

@hiteshshankar

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