करवा चौथ: सुहाग, समर्पण और प्रेम का अद्भुत संगम
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करवा चौथ: सुहाग, समर्पण और प्रेम का अद्भुत संगम

सनातन हिंदू संस्कृति में पति-पत्नी का रिश्ता एक जन्म का नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर का माना जाता है। करवा चौथ जैसे सुहाग पर्व इसी प्राचीन मान्यता को पोषित करते हैं और पति-पत्नी के रिश्ते को और मजबूत व समृद्ध बनाते हैं।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Oct 9, 2025, 04:42 pm IST
inधर्म-संस्कृति
karwa chauth date 2025

karwa chauth 2025

भारतीय संस्कृति में करवा चौथ का व्रत महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक हिंदू स्त्री के अपने पति के प्रति अगाध प्रेम, अटूट विश्वास और गहरे समर्पण की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। सनातन हिंदू धर्म विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जिसने आज तक अपनी प्राचीन, गौरवशाली परंपराओं को निर्बाध रूप से कायम रखा है। करवा चौथ का सुहागव्रत एक ऐसी ही प्राचीन परंपरा है, जो भारतीय विवाहित महिलाओं की अपने पति के प्रति समर्पण की दृढ़ ऊर्जा तथा प्रेम और भक्ति की गर्माहट में गहराई से समाहित है। नख-शिख सोलह श्रृंगार से अलंकृत भारतीय सुहागिनों द्वारा निर्जल उपवास की तप ऊर्जा को अंतस में संचित कर कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को चंद्रमा को अर्ध्य देकर परमात्मा से पति के स्वस्थ, सुखी व दीर्घ जीवन की प्रार्थना की परम्परा दुनिया की किसी भी अन्य धर्म-संस्कृति में नहीं मिलती। यह सुहाग पर्व सदियों से भारतीय महिलाओं की अपने पति के प्रति समर्पण की महिमा को पूरे विश्व में फैलाता आ रहा है।

गौरतलब है कि हमारी सनातन हिंदू संस्कृति में पति-पत्नी का रिश्ता एक जन्म का नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर का माना जाता है। करवा चौथ जैसे सुहाग पर्व इसी प्राचीन मान्यता को पोषित करते हैं और पति-पत्नी के रिश्ते को और मजबूत व समृद्ध बनाते हैं। हमारी हिंदू संस्कृति में “सदा सुहागिन” का आशीर्वाद भी इन त्योहारों में झलकता है।यही कारण है कि इस आधुनिक तकनीकी युग में भी हिंदू विवाहित महिलाओं की इन अनमोल त्योहार परंपराओं में गहरी आस्था बरकरार है।

पतिव्रता नारियों की गौरवगाथा

गौरतलब है कि भारतीय इतिहास का हर पन्ना समर्पित महिलाओं के गौरवशाली चरित्रों से भरा पड़ा है। हिंदू धर्मग्रंथ पतिव्रत धर्म (अपने पति के प्रति समर्पण) के गुणों का गुणगान करते हैं। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि पति परायणा नारी वह सद्गति सहज ही प्राप्त कर लेती है जो बड़े बड़े योगी-यती भारी कठिनाइयां सहते हुए प्राप्त नहीं कर पाते। जीवनपथ में कठिन समय आने पर महरानी शैव्या ने राजा हरिश्चन्द्र के साथ, सत्यवती ने सत्यवान के साथ, सुकन्या ने च्यवन ऋषि के साथ तथा जनक नंदिनी सीता ने प्रभु श्रीराम की सहधर्मिणी के रूप में त्याग, प्रेम और समर्पण के जो अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किये; वे हमारी सनातन संस्कृति की अनमोल धरोहर हैं। कुरुराज धृतराष्ट्र की नेत्रहीनता को अंतर्मन से शिरोधार्य कर महरानी गांधारी ने आँखों में पट्टी बाँधने का जो महाव्रत आजीवन निभाया था; महाभारत युद्ध में सौ पुत्रों के खोने वाली वह महासती उसी महाशक्ति के बल पर योगेश्वर श्रीकृष्ण तक को शापित करने की क्षमता अर्जित कर सकी थी।

पतिव्रत धर्म के बल पर त्रिदेवों को छह-छह माह का अबोध शिशु बना देने वाली महासती अनुसूया की महिमा का तो कहना ही क्या ! अरुन्धती, बेहुला, तारा, मंदोदरी, सुलोचना और द्रौपदी जैसी कितनी ही महान भारतीय नारियों के दिव्य चरित्र हमारे पुराण ग्रंथों में मिलते हैं जो बताते हैं कि इस देवभूमि की महान मातृशक्ति पतिव्रत धर्म को कितनी गहन भाव श्रद्धा के साथ निबाहती रही है।

पर्व पूजन की दिव्य भावना

करवाचौथ पर विवाहित महिलाओं द्वारा प्रमुख रूप से शिव-पार्वती के साथ गणेश और कार्तिकेय के पूजन की पुरातन परम्परा है। इस सुहाग पर्व पर प्रत्येक सुहागिन यह प्रार्थना करती है कि उन्हें भी माता पार्वती जैसा एकनिष्ठ सुहाग का अनुदान वरदान मिले, उनकी संतति गणेश व कार्तिकेय की तरह विवेकी व अप्रतिम साहसी बने। उन्हें माता पार्वती जैसी शक्ति और साधना हासिल हो सके ताकि वे भी अपने पति के प्रत्येक सुख दुख में उनके कंधे से कंधा मिलाकर अर्धांगिनी का कर्तव्य पूरा कर सकें। चंद्रमा को अर्ध्य देने के पीछे मूल भाव यह है कि उनके वैवाहिक जीवन में चंद्रमा सी शीतलता सदैव बनी रहे। इस तरह भाव रूप में यह सुहाग पर्व एक सुहागिन की उस अदम्य शक्ति का प्रतीक है, जो अपने प्रेम और तप के बल पर अपने जीवन साथी की रक्षा का व्रत लेती है। इस तरह करवाचौथ सिर्फ एक ‘व्रत’ नहीं, बल्कि सुहाग, समर्पण और प्रेम का एक जीवंत उत्सव है।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पर्व की प्रासंगिकता

हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो अपनी पुरातन परम्पराएं आज तक सनातन रूप से निभाता आ रहा है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इस पर्व की प्रासंगिकता पर विचार करें तो पाएंगे कि करवाचौथ का यह सुहाग व्रत केवल जीवनसाथी की आयु ही नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने का मार्ग भी है। करवा चौथ के व्रत पर्व पर एक सुहागिन का समर्पण शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक; तीनों स्तरों पर दिखाई देता है। पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए निर्जला व्रत की तपस्या उस दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प को दर्शाती है, जो एक महिला अपने पति के कल्याण व दीर्घायु के लिए रखती है। यह पर्व सुहागिन स्त्री की निष्ठा, संयम, श्रद्धा और सामाजिक समरसता का उत्सव है जो पारिवारिक रिश्तों को मजबूती, संस्कृति को जीवंतता और जीवन मूल्यों को स्थायित्व प्रदान करता है। प्रेम, समर्पण और आस्था का पर्व करवाचौथ परिवार और समाज में संतुलन, अपनेपन और प्रेम की भावना का भी अनूठा पर्व है।

संध्याकाल में जब सोलह श्रृंगार से अलंकृत सुहागिनें आपस में बैठकर कथा सुनती हैं और अपने करवे बदलते हुए मंगल गीत गाती हैं तब इस पर्व की सामूहिकता और समरसता को गहराई से महसूस किया जा सकता है।

इस सुहाग पूजा में उपयोग होने वाला ‘करवा’ (मिट्टी का घड़ा) समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। तत्पश्चात चंद्रोदय की प्रतीक्षा और चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति के हाथों से जल ग्रहण कर उपवास पूर्ण करना भावनात्मक समर्पण का बेहद भावपूर्ण पल होता है।वर्तमान दौर में करवाचौथ का पर्व केवल एकतरफा समर्पण नहीं, बल्कि पारस्परिक प्रेम और सम्मान का भी प्रतीक बनता जा रहा है। पत्नी के त्याग और समर्पण के प्रति पति का प्रेम और आदर ही उसका प्रतिदान है। चंद्र अर्घ्य के उपरांत पत्नी को अपने हाथ से पानी पिलाकर पति उसकी भावनाओं और प्रेम का सम्मान करता है और पत्नी को उपहार कृतज्ञता व्यक्त करता है। इससे वैवाहिक बंधन में नयी मिठास और मजबूती घुल जाती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही पर्व की यह परम्पराएं न केवल हमारी धार्मिक आस्था बल्कि सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक विरासत की सुंदरता को भी बनाए रखती हैं।

धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत की शक्ति अकाल मृत्यु को भी दूर भगा सकती है। करवा चौथ की कथा में वीरवती की कहानी इसी विश्वास को दर्शाती है कि यमराज भी इस व्रत के प्रभाव से बाधित हो जाते हैं। इन्हीं पावन भावों के साथ दुनिया भर में; खासतौर से उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश व बिहार में कार्तिक मास की चतुर्थी को चंद्रोदय तिथि में मनाया जाने वाला यह सुहाग पर्व सदियों से हिन्दू धर्म की सुहागिन स्त्रियों को ऊर्जान्वित करता आ रहा है।

Topics: Indian CultureKarwa Chauth 2025Karwa Chauth storyImportance of Karwa ChauthKarwa Chauth fastKarwa Chauth worship methodreligious significance of Karwa Chauth
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