छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के बोटेचांग गांव में हाल ही में तीन परिवारों ने अपने मूल धर्म में घर वापसी की है। यह घटना स्थानीय लोगों के लिए गर्व का विषय बन गई है। लगभग 4-5 साल पहले ये परिवार इलाज के बहाने ईसाई मत में परिवर्तित कर दिए गए थे लेकिन अब उन्होंने अपने पूर्वजों की संस्कृति और परंपराओं की ओर लौटने का फैसला किया। परिवारों ने बताया कि अब वे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ गर्व महसूस कर रहे हैं और अन्य लोगों को भी अपने मूल धर्म में लौटने के लिए प्रेरित करेंगे।
रविवार, 28 सितंबर 2025 को गांव में इन परिवारों का भव्य स्वागत किया गया। स्थानीय ग्रामीणों ने घर वापसी के अवसर पर पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए पगड़ी पहनाई और स्वागत किया। इस अवसर पर जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम ने भी शामिल होकर परिवारों का पांव पखारकर सम्मान किया। इस स्वागत समारोह ने गांववासियों में एक उत्साह और एकजुटता की भावना पैदा कर दी।
बोटेचांग गांव में ही पेसा अधिनियम 1996 और संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत धर्मांतरण गतिविधियों पर रोक लगाने का प्रस्ताव पारित किया गया। गांव में एक सूचना बोर्ड भी लगाया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि पास्टर या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा धर्मांतरण क्रियाकलाप करना वर्जित है। इस कदम से गाँव में पारंपरिक धर्म और संस्कृति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है।
घर वापसी करने वाले परिवारों ने कहा कि अब वे अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा करेंगे और अपनी संस्कृति और परंपराओं के अनुसार जीवन जीएंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांकेर जिले में धर्मांतरण के विरोध में सक्रिय आंदोलन चल रहा है। दलित और जनजातीय समाज अब अपनी धार्मिक पहचान को बचाने और अपने पूर्वजों की परंपराओं से जुड़ने की इच्छा जता रहे हैं। कई गांवों में ईसाई प्रचार और मिशनरी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। कुछ गांवों में बाहरी व्यक्तियों के आने-जाने पर रोक भी लगा दी गई है, ताकि लोगों को प्रभावित करने की कोशिशें न हो सकें। कांकेर जिले के यह हालात यह दिखाते हैं कि स्थानीय समाज अब अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को लेकर अधिक सजग और जागरूक हो रहा है। घर वापसी के इस कदम से गांव में सामूहिक उत्साह का माहौल बन गया है।

















