सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो जमानत देने की प्रक्रिया को लेकर निचली अदालतों को आईना दिखाने वाला है। मामला है एक कपल का, जिस पर एक प्राइवेट कंपनी को 6 करोड़ से ज्यादा का चूना लगाने का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि जमानत ऐसे ही नहीं दी जाती, ये फैक्ट्स और आरोपी के बर्ताव पर टिकी होनी चाहिए। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और एसवीएन भट्टी की बेंच ने निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया और अधिकारियों को ट्रेनिंग का आदेश दिया।
क्या है पूरा मामला?
सबसे पहले तो ये समझिए कि आखिर माजरा क्या था। एम/एस नेटसिटी सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी ने आरोप लगाया कि आरोपी कपल ने 1.9 करोड़ रुपये लिए थे, वादा किया था कि बदले में जमीन ट्रांसफर कर देंगे। लेकिन बाद में पता चला कि वो जमीन तो पहले ही बेच और गिरवी रख चुकी थी। कपल ने पैसे लौटाने से इनकार कर दिया। ब्याज जोड़कर कंपनी का दावा 6 करोड़ से ऊपर पहुंच गया। कंपनी ने 2017 में शिकायत दर्ज कराई, जिससे 2018 में FIR हुई। ये सब धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का केस था। कपल ने शुरू में कोर्टों को गुमराह करने की कोशिश की, झूठे वादे किए कि पैसे लौटा देंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
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निचली अदालत का रुख
2023 में इस दंपति ने दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका दायर कर अग्रिम जमानत की मांग की, जिसे कोर्ट ने रिजेक्ट कर दिया। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की कि सालों से कोर्टों को बेवकूफ बना रहे हैं, झूठे हलफनामे देकर गिरफ्तारी से बच रहे हैं। फिर भी, नवंबर 2023 में एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (ACMM) ने रेगुलर बेल दे दी। उनका तर्क था कि चार्जशीट फाइल हो चुकी है, तो कस्टडी की जरूरत नहीं। अगस्त 2024 में कड़कडूमा कोर्ट के सेशंस जज ने इस फैसले को बरकरार रखा। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी दखल न देने का फैसला किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को ये सब पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा कि निचली अदालतों ने आरोपी के पिछले बर्ताव को नजरअंदाज कर दिया और हाईकोर्ट की चेतावनी को भूल गए।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि बेल केस फैक्ट्स और सर्कमस्टांस पर तय होते हैं। यहां तो साफ दिख रहा था कि बेल नहीं मिलनी चाहिए। कोर्ट ने प्रोसीडिंग की गड़बड़ियों पर बात करते हुए कहा कि आरोपी अक्टूबर 2023 में मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर हुए, लेकिन बिना किसी अंतरिम रिलीज ऑर्डर के कोर्ट से निकल गए। नवंबर तक इंतजार करवाया गया। कोर्ट ने इसे गंभीर चूक बताया।
इसे लापरवाही मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ACMM, सेशंस जज और हाईकोर्ट के बेल ऑर्डर कैंसल कर दिए। साथ ही दो सप्ताह के अंदर आरोपियों को सरेंडर करने का आदेश दिया है।
जज को ही ट्रेनिंग के लिए भेजा
इस केस में लापरवाही भरा फैसला देने के मामले में सख्त होते हुए शीर्ष अदालत ने ACMM और सेशंस जज को कम से कम सात दिन की स्पेशल ट्रेनिंग दिल्ली न्यायिक अकादमी में लेने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि हम अपनी ड्यूटी निभाने में नाकाम रहेंगे अगर ऐसी गलतियों को अनदेखा करेंगें। पुलिस की तरफ से भी लापरवाही दिखी। इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर का बेल प्रोसीडिंग्स में स्टैंड इतना कमजोर था।
दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को इस मामले की व्यक्तिगत जांच करने का आदेश दिया कि वो अधिकारी की भूमिकाओं की जांच करके उनके खिलाफ एक्शन लें।














