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भारत में बांग्लादेश की घटनाओं की कवरेज से खफा क्यों हैं मोहम्मद यूनुस?

बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान हिंदू मंदिरों पर हमले बढ़े, मोहम्मद यूनुस भारत पर फेक न्यूज का आरोप लगाते हैं। कट्टरपंथ का उदय, अल्पसंख्यक उत्पीड़न और महिलाओं पर अत्याचार: सच्चाई सामने आ रही है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Sep 28, 2025, 01:27 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
dr muhammad yunus

मोहम्मद यूनुस

बांग्लादेश में हालात जिस प्रकार बिगड़ रहे हैं और जिस प्रकार हिन्दू मंदिरों को दुर्गा पूजा के दौरान भी निशाना बनाया जा रहा है, उससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि बांग्लादेश अंतत: किस राह पर चल रहा है। रोज ही बांग्लादेश से किसी न किसी मंदिर या पूजा पंडाल पर हमले के समाचार आ रहे हैं, मगर इसी दौरान बांग्लादेश के अनिर्वाचित अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस का कहना है कि भारत से फेक न्यूज़ बांग्लादेश के विषय में फैलाई जाती हैं।

UN  के बाहर यूनुस के खिलाफ बांग्लादेशियों का प्रदर्शन

मोहम्मद यूनुस के अमेरिका में यूएन मुख्यालय में भाषण के दौरान यूएन मुख्यालय के बाहर बांग्लादेश के लोगों ने प्रदर्शन किया था और मोहम्मद यूनुस के खिलाफ नारे लगाए थे। ऐसा कहा जा रहा है कि ये लोग अवामी लीग के समर्थक थे और ये लोग मोहम्मद यूनुस को पाकिस्तानी कह रहे थे। इसके साथ ही यह भी नारे लगा रहे थे कि “बांग्लादेश में इस्लामिक आतंक को न कहें!” मोहम्मद यूनुस के बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दू अपने पर्व को लेकर ही सुरक्षित अनुभव नहीं कर रहे हैं। बांग्लादेश हिन्दू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के महा सचिव द्वारा हस्ताक्षरित एक बयान में 2 सितंबर से 23 सितंबर तक 9 घटनाएं ऐसी हो चुकी हैं, जिनमें या तो पूजा मंडप या फिर मंदिरों में प्रतिमाओं के साथ तोडफोड की गई है।

भारत के खिलाफ जहर उगल रहे मोहम्मद यूनुस

मोहम्मद यूनुस की तरफ से हालांकि सुरक्षा प्रदान करने का दावा और वादा दोनों किया गया है, परंतु वह कितना धरातल पर है, वह वहाँ पर घटित हो रही घटनाओं के सामने आने से प्रतीत हो रहा है। अमेरिका में मोहम्मद यूनुस यह कह रहे हैं कि “बांग्लादेश को भारत से समस्या है। क्योंकि एक तो भारत ने बांग्लादेश की निर्वासित प्रधानमंत्री शेख हसीना को शरण दे रखी है, और दूसरा भारत को बांग्लादेश में हुआ छात्र आंदोलन पसंद नहीं आया।“

मोहम्मद यूनुस ने कहा कि भारत से जो प्रोपोगैंडा चल रहा है, उसमें यह कहा जा रहा है कि जो कुछ भी हुआ, वह एक इस्लामिक आंदोलन है, जिसने बांग्लादेश पर कब्जा कर लिया है और वे यह भी कहते हैं कि मोहम्मद यूनुस तालिबान है।

मगर मोहम्मद यूनुस को यह तो दिखाई देता है कि भारत की मीडिया यह कह रही है कि बांग्लादेश में जो कुछ हुआ, वह इस्लामिस्ट मूवमेंट है, तो क्या उन्हें यह नहीं दिखाई देता कि कैसे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार कट्टरपंथियों के आगे झुक रही है। कैसे कट्टरपंथी लोग बांग्लादेश के हिन्दू, बौद्ध और साथ ही वहाँ की लड़कियों का जीवन कष्टमय बना रहे हैं।

इसे भी पढ़ें: ‘अब इन्हें वैक्सीन भी हलाल चाहिए’, खसरे से जूझ रहे इंडोनेशिया के मुस्लिमों की हिचक बनी मुसीबत

बांग्लादेश के हालात को इस्लामिक मूवमेंट कहना कहां गलत? 

यदि यह कहा जा रहा है कि बांग्लादेश में जो कुछ हुआ, वह इस्लामिस्ट मूवमेंट था तो उसमें क्या गलत है, क्योंकि इस कथित आंदोलन के बाद से ही लगातार बांग्लादेश में हिंदुओं के प्रति अत्याचार की घटनाओं में वृद्धि हुई है। मंदिरों को निशाना बनाया गया और बार-बार यह कहा जा रहा है कि 1971 के संविधान को बदला जाए।

सवाल कई

समस्या शेख हसीना के भ्रष्टाचार से थी, तो फिर उसके लिए शेख मुजीबुर्रहमान, जिन्होंने बांग्ला भाषा और बंगाली अस्मिता के लिए पाकिस्तान से विद्रोह किया, और बांग्लादेश का निर्माण किया, उनकी विरासत और धरोहरों पर हमले क्यों किए गए?

उनके घर को क्यों आग के हवाले किया गया? यदि कट्टरपंथी तत्व हावी नहीं हो रहे हैं, तो फिर लगातार महिला विरोधी कदम क्यों उठाए जा रहे हैं? महिला आयोग की अनुशंसाओं पर कट्टरपंथियों ने आंदोलन की चेतावनी क्यों दी? और क्यों हिफाजत ए इस्लाम ने जो महिला आयोग की अनुशंसाओं के खिलाफ रैली की थी, उसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाए गए, बल्कि इन अनुशंसाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

यदि कट्टरपंथी तत्व हावी नहीं हैं या यह आंदोलन इस्लामिस्ट मूवमेंट नहीं था तो इस्लामिस्ट पार्टी के पदाधिकारी क्यों छात्र संघ के चुनावों में चुनकर आ रहे हैं और इतना ही नहीं मुस्लिम पहचान पर जोर दिया जा रहा है।

यूनुस को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत

और भारत की मीडिया पर दोषारोपण करने से पहले मोहम्मद यूनुस को अपने गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए कि कैसे उनके शासनकाल में लगातार बांग्लादेश कट्टरपंथियों की गिरफ्त में जाता जा रहा है। अल्पसंख्यक महिलाओं के साथ यौन हिंसा किसी महामारी की तरह फैल रही है।

बांग्लादेश अल्पसंख्यक मानवाधिकार कांग्रेस (एचआरसीबीएम) ने ही हाल में चौंकाने वाली रिपोर्ट दी थी, जिसमें बताया गया था कि वहाँ पर साल की पहली तिमाही में ही दुष्कर्म के 342 मामले आधिकारिक रूप से दर्ज हुए थे और उनमें 87% पीड़ित लड़कियां 18 वर्ष से कम उम्र की थीं।

यह मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ही है, जिसके शासनकाल में पुस्तक मेले तक में इस सीमा तक असहिष्णुता थी कि बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन की पुस्तकें बेचने वाले प्रकाशक को अपना स्टॉल बंद करना पड़ गया था, क्योंकि उस स्टॉल पर कट्टरपंथियों ने हमला कर दिया था। यह सब भारत की मीडिया के दिमाग की उपज नहीं है, बल्कि सत्य घटनाएं हैं।

बांग्लादेश में महिलाओं का जीना हुआ दूभर

यह मोहम्मद यूनुस की सरकार के अंतर्गत पनपते कट्टरपंथी ही हैं, जिनके कारण शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाली प्रोफेसर जुबैदा ने यह बताया था कि कैसे नए बांग्लादेश में आम महिलाओं का जीना दूभर होता जा रहा है। जुबैदा ने बताया था कि कैसे लड़कियों को भद्दी भाषा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उन्होनें बताया था कि कैसे उन्हें एक पत्र मिला था, जिसमें यह सलाह दी गई थी कि वे सिर ढक कर यूनिवर्सिटी आया करें। और उन्होंने यह कहा था कि जो कोई भी कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ बोलने की हिम्मत करता है, उसे निशाना बनाया जा रहा है।

मोहम्मद यूनुस यह तो शिकायत करते हैं कि भारत की मीडिया प्रोपोगैंडा चलाता है, मगर वे अपने मुल्क में झाँककर नहीं देखते। वे यह नहीं देखते कि कैसे बांग्लादेश के संविधान, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय पहचान पर निशाना साधा जा रहा है? कैसे कट्टरपंथी बांग्ला अस्मिता के स्थान पर इस्लामिक पहचान को प्राथमिकता दे रहे हैं और कैसे बार-बार यह कहा जा रहा है कि जहां पर 91 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम हैं, वहाँ पर शरिया ही लागू होना चाहिए, तो क्या कोई मीडिया इन सब बातों को बताए भी नहीं? क्या मोहम्मद यूनुस यह चाहते हैं कि भारत बांग्लादेश के विषय में केवल वही बातें करें जो मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार दिखाती है?

या फिर यह कहा जाए कि मोहम्मद यूनुस भारत की मीडिया को भी उसी प्रकार नियंत्रित करना चाहते हैं जिस प्रकार वे अपने मुल्क की मीडिया को नियंत्रित करने का असफल प्रयास कर रहे हैं? क्योंकि भारत की मीडिया यदि कुछ लिखती है तो अंतत: स्रोत तो बांग्लादेश के ही होते हैं।

बांग्लादेश के कट्टरवाद और हिंसा की ओर बढ़ने पर संयुक्त राष्ट्र में चिंता जताई गई

जब मोहम्मद यूनुस भारत को लेकर यह कह रहे थे कि भारत का मीडिया प्रोपोगैंडा फैलाता है तो उसी समय जेनेवा में अधिकार समूह इंटरनेशनल फोरम फॉर सेक्युलर बांग्लादेश (आईएफएसबी) ने जेनेवा में एक पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन किया था, जिसमें बांग्लादेश में कट्टरपंथी कट्टरता और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं पर ध्यान आकर्षित किया गया। इस दो दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के 60वें सत्र के दौरान 26-27 सितंबर को किया गया था।

एएनआई के अनुसार इस पहल का नेतृत्व मानवाधिकार कार्यकर्ता रहमान खलीलुर मामून ने किया था, और  कट्टरपंथी इस्लामी कट्टरवाद का उदय, सांप्रदायिक हिंसा और अल्पसंख्यक उत्पीड़न, प्रेस की स्वतंत्रता का दमन और पत्रकारों का उत्पीड़न, भीड़ द्वारा आतंकवाद और महिलाओं व बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा और शेख हसीना, विश्व चेतना: मानवता की जननी, जैसे विषयों पर पोस्टर प्रदर्शित किये गए थे।

महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों के चित्र देखकर कैमरून के कार्यकर्ता चोंगी जोसेफ भावुक हो गए थे। बांग्लादेशियों में सोशल मीडिया पर निराशा और हताशा देखी जा सकती है और ऐसी भी पोस्ट्स लोग लिख रहे हैं कि “हम पहले बेहतर थे!”।

मोहम्मद यूनुस को यह देखना चाहिए कि यह सब भारत की मीडिया नहीं कर रहा है, बल्कि सच्चाई है जो स्वयं अपना रास्ता खोज रही है और अब भारत को कोसने के स्थान पर मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेश में बढ़ रही कट्टरता पर ध्यान देना चाहिए, जिससे कि वहाँ पर रहे रहे अल्पसंख्यक अर्थात हिन्दू, बौद्ध और ईसाई समुदाय भी स्वयं को सुरक्षित अनुभव सके और सुरक्षित तरीके से अपने पर्व मना सके।

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