अमेरिका की वीजा नीतियों के निर्धारकों की ओर से भारत के लिए आया ताजा झटका एक प्रशासनिक आदेश भर नहीं है। इसके प्रभाव की लहरें वैश्विक प्रतिभा प्रवाह, नवाचार-इकोसिस्टम, पूंजी के प्रवाह और भारत-अमेरिका समीकरण तक उथल-पुथल मचा सकती हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो बिना सोचे-समझे और असंगत फैसले लेने के लिए प्रतिदिन (कभी-कभी तो दिन में दो-तीन बार भी) सुर्खियों में रहते हैं, एक बार फिर मुस्कुराहट और असमंजस के भंवर में हैं।
ट्रंप एच-1बी वीजा शुल्क को लगभग छह लाख रुपये से बढ़ाकर करीब 88 लाख रुपये करने के साथ गैर-अमेरिकी पेशेवरों पर नई पाबंदियां लगा चुके हैं। भारत के लिए छोड़िए, यह कदम स्वयं अमेरिका के लिए इतना अप्रत्याशित था कि उनके घर में ही इसका जोरदार विरोध हुआ। अमेरिकी टेक कंपनियां, शोध संस्थान और नीति-निर्माताओं का बड़ा वर्ग इसे अर्थव्यवस्था और नवाचार, दोनों के लिए प्रतिकूल मान रहा है।
स्मरण रहे, एच-1बी धारकों का सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय रहा है। 2024 में अमेरिका जाने वालों में 71 प्रतिशत भारतीय थे। यही वही समुदाय है, जिसने अमेरिका की टेक कंपनियों, मेडिकल शोध व वित्तीय क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बढ़त दिलाई। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या यह नीति सचमुच अमेरिकी नागरिकों के लिए नौकरियां बढ़ाएगी या अमेरिका की नवाचार-चालित अर्थव्यवस्था की पकड़ ढीली कर देगी? और भारत के संदर्भ में, क्या यही संकट ‘रिवर्स ब्रेन-ड्रेन’ और भारत-स्थित वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) की अगली लहर के रूप में अवसर में बदल सकता है?

ट्रंप के फैसलों को समझना आसान नहीं है। कई बार उनकी घोषणाएं और आदेश न्यायालयों में टिक नहीं पाए हैं। जन्मसिद्ध नागरिकता पर रोक जैसी कवायद को सिएटल की संघीय अदालत ने 23 जनवरी, 2025 को संविधान के 14वें संशोधन के विरुद्ध मानकर ठुकरा दिया। कुछ राज्यों/संगठनों को मिलने वाली संघीय फंडिंग रोकने का आदेश को असंवैधानिक बताकर रोका गया। सरकारी कर्मचारियों के ‘वैकल्पिक इस्तीफे’ का प्रस्ताव भी न्यायिक अड़चन में फंस गया। न्यायालय ने साफ कहा, ऐसा कदम संसदीय अनुमति के बिना संभव नहीं। यह शृंखला दिखाती है कि त्वरित, राजनीतिक रूप से उत्तेजक, किंतु अटपटे निर्णय अक्सर संवैधानिक दीवारों से टकरा जाते हैं।
एच-1बी पर कड़ाई का तर्क यह है कि विदेशी ‘श्रम’ कम होगा तो अमेरिकी नागरिकों को ज्यादा ‘अवसर’ मिलेंगे। किंतु यह इतना सीधा समीकरण नहीं है, क्योंकि यहां ‘श्रम’ के साथ कुशलता की अनिवार्य जुगलबंदी अपेक्षित है और ‘अवसर’ सामान्य नौकरी की अपेक्षा दक्षता केंद्रित परिणाम पर टिके हैं। उद्योग-जगत की अनुभवजन्य समझ इस विषय में स्पष्ट संकेत देती है। टेक, बायोमेडिकल रिसर्च, सेमीकंडक्टर डिजाइन और साइबर-सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में वास्तविक समस्या ‘कौशल-घाटा’ है। जिन टीमों में एच-1बी धारकों की भागीदारी अधिक है, वहीं उच्च कौशल की कमी सबसे अधिक है। फीस की उछाल और नियमों की नई कसावट से खासकर स्टार्टअप और शोध संस्थानों की टैलेंट-सप्लाई लाइन टूटती है। यही संस्थान भविष्य की नौकरियां, उत्पादकता व नवाचार की भूमि तैयार करते हैं।
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बॉन्टा का आकलन है कि इस तरह की नीति कंपनियों के लिए अनिश्चितता और अप्रत्याशितता पैदा करती है, जिससे विकास दर पर नकारात्मक असर पड़ना तय है। एक बड़ी अमेरिकी कंपनी के निदेशक अभिषेक शर्मा बताते हैं कि एच-1बी पर आए पेशेवरों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को वास्तविक मजबूती दी है। उदाहरण के लिए, एलन मस्क दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका आए। 1990 के दशक के ‘डॉटकॉम बूम’ में स्टार्टअप बनाया, स्पेस-एक्स में निवेश किया और टेस्ला की स्थापना की। 2002 में अमेरिकी नागरिक बने और लाखों नौकरियां सृजित कीं।
यह ध्यान रखना चाहिए कि नवाचार-केंद्रित उद्यमिता की नींव खुली, पारदर्शी तथा इसके साथ-साथ प्रतिभा को तुरंत लपकने और सहेजने वाली नीति पर टिकी होती है, अड़चनों और राजनीतिक अटपटेपन से उसका तालमेल नहीं बैठता, यह बात मस्क-ट्रंप दूरी की कहानी भी कहती है। एक समय था जब एलन मस्क और डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती की चर्चा सिर्फ अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया में होती थी। जब ट्रंप जीते तो उन्होंने मस्क को नवगठित डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (डीओजीई) का नेतृत्व सौंपा गया, जिसका उद्देश्य सरकारी खर्च में कटौती और दक्षता बढ़ाना था।
व्हाइट हाउस के कई बड़े फैसलों में मस्क का हस्तक्षेप रहता था, लेकिनयह साझेदारी लंबे समय तक स्थिर नहीं रही। स्थिति तब और बिगड़ी जब मस्क ने ट्रंप की कर और खर्च में कटौती से जुड़े विधेयक को सिरे से खारिज करते हुए इसे घृणित करार दिया। मस्क का मानना था कि इससे उनके विभाग के पूरे मिशन को कमजोर किया जा रहा है। ऐसे ही कई मतभेदों के चलते कई बार दोनों ने एक दूसरे पर सार्वजनिक मंच से तीखी बयानबाजी भी की। ट्रंप ने पलटवार करते हुए यह भी चेताया कि यदि मस्क ने विरोध जारी रखा तो उनकी कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी सरकार के संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। अंततः बढ़ते विवादों और अविश्वास के चलते दोनों अलग हो गए।
अमेरिका को दिखाया आईना

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बिना नाम लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा संदेश दिया है। गत 24 सितंबर को वह संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिस्सा लेने पहुंचे थे। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘एट द हार्ट ऑफ डेवलपमेंट: एड, ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी’ नामक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि दुनिया को वैश्विक कार्यबल की आवश्यकता है। लेकिन कई देश इस वास्तविकता से बच नहीं सकते कि राष्ट्रीय जनसांख्यिकी के कारण कई देशों में वैश्विक कार्यबल की मांग पूरी नहीं की जा सकती। इसलिए हमें सोच समझकर कदम उठाना होगा।
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपल आईटी) लखनऊ के निदेशक डॉ. अरुण मोहन शैरी का आकलन है कि बड़ी अमेरिकी कंपनियां शायद यह अतिरिक्त लागत झेल लें, लेकिन स्टार्टअप्स और छोटे शोध संस्थान वैश्विक प्रतिभा को बुलाने से कतराएंगे। ऐसे वातावरण में मेधा-प्रवाह अमेरिका से हटकर उन देशों की ओर मुड़ेगा जहां प्रवेश-बाधाएं कम हैं। जिसका नुकसान अमेरिका की कंपनियों एवं अर्थव्यवस्था को आने वाले समय में उठाना पड़ सकता है। जहां तक भारत की बात है, ग्लोबल कैपटिव सेंटर यानी वैश्विक क्षमता केंद्रों, जिन्हें (जीसीसी) कहा जाता है, की संख्या बढ़ेगी।
जीसीसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विदेशों में स्थित इकाइयों को कहते हैं, जो उन्हें सहायता उपलब्ध कराती हैं। वैसे भी भारत दुनिया के करीब 50 प्रतिशत ग्लोबल कैपिसिटी सेंटर की मेजबानी करता है। हो सकता है इसमें थोड़ा समय लगे, लेकिन इस फैसले से अमेरिकी कंपनियां ज्यादा से ज्यादा आउटसोर्स करने के लिए बाध्य होंगी। इसका फायदा भारत को होगा। भारतीयों के लिए देश में रहकर नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे। भारतीय प्रतिभाओं के पलायन में कमी आएगी।
बाजी पलटने की पहेली यहीं से जुड़ी है। जानकार इसे अमेरिकी कंपनियों और अर्थव्यवस्था को मध्यमावधि में क्षति और भारत जैसे देशों में अवसरों की तेज़ बढ़ोतरी के रूप में भी देखते हैं। भारत के लिए परिदृश्य रोचक है। एक ओर, व्यापार वार्ताओं में कृषि और डेयरी के हितों के विरुद्ध शर्तें न मानने के बाद ट्रंप-प्रशासन की बंदिशों का सिलसिला असहज करता है। दूसरी ओर यही पल घरेलू खपत, आपूर्ति और निर्यात के तंत्र को मज़बूत करने का अवसर बन सकता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. आलोक पुराणिक का तर्क है, अमेरिका को कम लागत पर जो भारतीय प्रतिभा मिलती रही है, उससे वंचित होना उसके लिए आसान नहीं है। भारत के पेशेवर, वैकल्पिक रास्ते ढूंढ लेंगे। संभव है कि अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां अपने बिजनेस को भारत या दूसरे देशों में शिफ्ट करें, जहां भारतीयों पेशेवरों पर ऐसी कोई बंदिश न लगाई गई हों।
भारतीयों का योगदान बड़ा
यूएस सेंसस ब्यूरो और प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार भारतीय-अमेरिकी परिवारों की औसत सालाना आय लगभग 1,40,000 डॉलर है, जो अमेरिकी औसत की दोगुना है। अनुमान है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय मूल के लोगों का वार्षिक योगदान 600 अरब डॉलर से अधिक है। अमेरिका की 25 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी में यह 2 प्रतिशत के आसपास आता है। उनका सबसे ज्यादा प्रभाव टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, फाइनेंस और उद्यमिता के क्षेत्रों में है। समुदाय-आधारित हिस्सेदारी की दृष्टि से यह असाधारण है। यह बताने को पर्याप्त है कि प्रतिभा-आव्रजन महज वीजा-कोटा का मसला नहीं, बल्कि उत्पादकता, कर-आधार और नवाचार का प्रश्न है।
माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में लगभग 49 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इनमें से 80 प्रतिशत से ज्यादा उच्च शिक्षित हैं। नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी के अनुसार अमेरिकी स्टार्टअप्स में से एक-तिहाई यूनिकॉर्न भारतीय मूल के संस्थापकों द्वारा स्थापित किए हैं। तकनीकी क्षेत्र में भारतीय-अमेरिकियों की सबसे अधिक मौजूदगी है।
उदाहरण के तौर पर भारतीय मूल के जय चौधरी की साइबर सिक्योरिटी कंपनी ‘जीस्केलर’ 25 अरब डॉलर की है। साल 2024 में इसका वार्षिक राजस्व लगभग 2 अरब डॉलर रहा और कंपनी में 6,000 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। भारतीय मूल के ही थॉमस कुरियन गूगल क्लाउड के प्रमुख हैं। उनके नेतृत्व में साल 2024 में गूगल क्लाउड की कमाई 36 अरब डॉलर से अधिक रही और इसके कर्मचारियों की संख्या 65,000 से ज्यादा है। अरुण सरीन पूर्व में वोडाफोन के पूर्व सीईओ रहे हैं। अपने कार्यकाल में वह कंपनी का वार्षिक टर्नओवर 50 अरब डॉलर से अधिक तक ले गए थे। लाखों कर्मचारियों का प्रबंधन उन्होंने संभाला था।
ट्रंप के ऐसे फैसलों से छात्र-स्तर पर भी हलचल दिख रही है। 2024 में अमेरिका पढ़ने गए भारतीय छात्रों की संख्या 3.31 लाख रही, 2023 से 23 प्रतिशत अधिक। पर 2025 में सख्ती के चलते जुलाई माह में भारत से अमेरिका जाने वाले छात्रों में 46 प्रतिशत गिरावट आंकी गई। कुल मिलाकर विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 2025 में 18 लाख मानी जा रही है, लेकिन अमेरिका की हिस्सेदारी घटते हुए जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों की ओर झुकाव बढ़ा है, जहां वीजा-प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद कमाई (पोस्ट-स्टडी वर्क) के रास्ते अपेक्षाकृत स्थिर हैं।
अन्य देश देख रहे अवसर
ट्रंप के इस फैसले के बाद वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है चीन और ब्रिटेन जैसे देशों ने भारतीय प्रतिभाओं को लुभाने के अवसर तलाशने शुरू कर दिए हैं। चीन ने 1 अक्तूबर से नया ‘केे-वीजा’ शुरू करने का ऐलान किया है। यह विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग आदि से जुड़े युवाओं और कुशल पेशेवरों के लिए है। ब्रिटेन ‘ग्लोबल टैलेंट वीजा’ की फीस घटाने/माफ करने पर विचार कर रहा है। इसके तहत टॉप-5 विश्वविद्यालयों के स्नातक या बड़े अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारधारियों के लिए पूरी फीस में छूट देने तक की बात है। वर्तमान में ‘ग्लोबल टैलेंट वीजा’ की फीस 766 यूरो (लगभग 80 हजार रु) है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी पहले ही लचीली नीतियों से प्रतिभाओं को अपनी ओर खींचने की दौड़ में हैं। संदेश साफ है, जो देश कम व्यवधान, अधिक अवसर और स्थिर रास्ते देगा, प्रतिभा वहीं जाकर टिकेगी।
यहीं भारत के लिए बड़ा प्रश्न उठता है, क्या हम लौटती/रुकती प्रतिभा को तेजी से उत्पाद-नेतृत्व और बौद्धिक संपदा निर्माण में बदल सकते हैं? जीसीसी का पहला दौर श्बैक-ऑफिस’ का पर्याय था, दूसरा दौर ‘कोर प्रोडक्ट, डिजाइन और शोध’ की तरफ परिवर्तन है। एआई, साइबर-सिक्योरिटी, हेल्थ-टेक, सेमीकंडक्टर डिजाइन और एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में भारत-स्थित टीमों के पास दुनिया की सबसे बड़ा बाजार-सूझ-बूझ और इंजीनियरिंग कौशल है। अगर नीतिनिर्माता तेजी से और सही दिशा में निर्णय लेते रहे तो, डेटा-सेंटर, 24×7 पावर, सुरक्षित क्लाउड, शहरी स्तर पर विश्वस्तरीय आवास, स्कूल, कनेक्टिविटी आदि कारक प्रतिभा को वापस लाने वाले चुंबक साबित होंगे। एक प्रतिष्ठित अमेरिकी कंपनी में कार्यरत अमित मानते हैं कि भारत की तेजी से और सकारात्मक रूप से बदलती परिस्थितियों तथा इसके साथ-साथ बदलते वैश्विक परिदृश्य यह मिलकर ऐसा समीकरण तैयार करेंगे कि रिवर्स ब्रेन-ड्रेन स्वत: स्फूर्त होगा।

विकल्प तलाशें और आगे बढ़ें
जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू का अनुभव बताता है कि ‘विश्व-स्तरीय भारत’ कोई दूर का सपना नहीं। अमेरिका से लौटकर 1996 में उन्होंने जोहो की नींव रखी। आज कंपनी क्लाउड-आधारित सॉफ्टवेयर (ईमेल, अकाउंटिंग, सीआरएम, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट) की वैश्विक श्रेणी में अग्रणी है और 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का टर्नओवर दिखाती है। वेम्बू का संदेश सरल है-यह मायूसी का समय नहीं, अवसर का समय है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट में लिखा है कि देश के विभाजन के समय लाखों लोग खाली हाथ होकर भी अपनी मेहनत और साहस से फिर खड़े हुए, वैसे ही आज अमेरिका में एच-1बी वीजा की अनिश्चितता झेल रहे भारतीय भारत लौटकर नई शुरुआत कर सकते हैं।
एक और मिसाल तनुष शरणार्थी की है। लगातार तीन साल तक लॉटरी के माध्यम से मिलने वाले एच-1बी वीजा को पाने में असफल रहने के बाद उन्होंने एआई में शोध, प्रोडक्ट-बिल्डिंग और प्रकाशनों पर फोकस किया और अंततः O-1 वीज़ा हासिल किया। यह वही मेरिट-आधारित श्रेणी है जो विज्ञान, शिक्षा, व्यवसाय, कला और खेलों में असाधारण क्षमता वालों को मिलती है। पीईएस बेंगलुरु से इंजीनियरिंग, जॉन्स हॉपकिंस से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में मास्टर्स करने वाले शरणार्थी कैलिफोर्निया में आईबीएम में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।
भरोसा करना आसान नहीं
ट्रंप की बयानबाजी के उतार-चढ़ाव भरोसा करने को मुश्किल बना देते हैं। कभी भारत को प्रमुख सहयोगी, कभी पाकिस्तान पर तीखा वार, फिर किसी साक्षात्कार में पाकिस्तानियों की तेज दिमागी की तारीफ, ये झूलते संकेत कूटनीति में असहजता तो लाते ही हैं, उद्योग और छात्रों के दीर्घकालिक निर्णयों को भी दुविधा में डालते हैं। ऐसे में कंपनियों और पेशेवरों के लिए किसी एक नेता के वक्तव्यों पर नहीं बल्कि इसके चलते पैदा होने वाले प्रभाव तथा समस्त संस्थागत परिदृश्य और कानूनी स्थिरता पर आधारित दीर्घकालिक अनुमान लगाना ही विवेकपूर्ण है। अमेरिका की दुविधा साफ है, घरेलू वेतन-दबाव और नौकरी-सुरक्षा बनाम वैश्विक प्रतिभा से मिलने वाला उत्पादकता-लाभ। उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में घरेलू कौशल-आपूर्ति अब भी मांग से पीछे है; ऐसे में प्रवेश-बाधा ऊंची करने का सीधा परिणाम यह होगा कि कंपनियां प्रतिभाशाली पेशेवरों को वहीं काम पर रखेंगी जहां वह उपलब्ध हैं। भारत, पूर्वी यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया, और कार्य का ढांचा ‘डिस्ट्रीब्यूटेड-फर्स्ट’ की ओर घूम सकता है। इससे अमेरिका के भीतर नवाचार का स्वभाव और संख्या घटने का जोखिम है, जबकि भारत जैसे देशों का प्रभाव निश्चित ही बढ़ेगा।
भारत के नीति-निर्माताओं के सामने रास्ता और लक्ष्य स्पष्ट है, वापसी करती प्रतिभा के लिए दोबारा शोध वृत्ति के अवसर, नई पहल और शोध के लिए पूंजी, प्रयोगशालाओं तक सहज प्रवेश विश्वविद्यालयों से उद्योगों को तकनीक का हस्तांतरण पेटेंट और बौद्धिक संपदा निर्माण, शोध नवाचार या अन्य क्षेत्रों में भी परिणाम आधारित प्रोत्साहन, शहरों में विश्वस्तरीय अवसंरचना। छात्रों के लिए क्रेडिट-रिकग्निशन और तेज-ट्रैक इन्क्यूबेशन, उद्योग के लिए कर नियमों में स्पष्टता और स्थिरता। यही वह मिश्रण है जो एच-1बी की अनिश्चितता को भारत में अवसरों की निश्चितता में बदल सकता है।
अंततः, ट्रंप-शैली की तात्कालिक राजनीति कुछ समय के लिए तालियां बटोर सकती है, पर दीर्घावधि में वही देश आगे निकलते हैं जो प्रतिभा पर दीवारें नहीं, पुल बनाते हैं। अदालतें जब-जब अतिरेक पर अंकुश लगाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत दिखती है। कंपनियां जब-जब प्रतिभा के पक्ष में खड़ी होती हैं, नवाचार का तंत्र जीवित रहता है। भारत के लिए यही वह क्षण है, जीसीसी 2.0, डीप-टेक स्टार्टअप्स, और रिवर्स ब्रेन-ड्रेन को नीतिगत सहारे के साथ जोड़ दीजिए। आने वाले दशक में हम केवल तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि इनोवेशन-पावरहाउस के रूप में भी सामने आ सकते हैं। सवाल यह नहीं कि प्रतिभा कहां जाएगी। सवाल है उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग कौन करेगा।

















