ग्रेटर निकोबार द्वीप विकास परियोजना : देश विरोधी एजेंडे की एजेंट कांग्रेस
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ग्रेटर निकोबार द्वीप विकास परियोजना : देश विरोधी एजेंडे की एजेंट कांग्रेस

ग्रेटर निकोबार परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा व व्यापारिक शक्ति के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। परंतु सोनिया और राहुल गांधी सहित पूरा कांग्रेस कुनबा ‘आदिवासी व पर्यावरणीय चिंताओं’ की आड़ में इसका विरोध कर रहा है। उनका तर्क अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ‘सर्वाइवल इंटरनेशनल’ के अभियान से प्रभावित है, जो विदेशी फंडिंग द्वारा भारत की विकास योजनाओं को बाधित करने की मुहिम चलाता है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 24, 2025, 08:17 am IST
in भारत, विश्लेषण

 दिव्यांश काला

हाल ही में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ‘द हिंदू’ में प्रकाशित अपने लेख में ग्रेटर निकोबार द्वीप विकास परियोजना की तीखी आलोचना की। उन्होंने इसे एक ‘नियोजित दुस्साहस’ करार देते हुए दावा किया कि यह परियोजना ‘बिना संवेदनशीलता के आगे बढ़ाई जा रही है और कानूनी व संस्थागत प्रक्रियाओं की अनदेखी कर रही है।’ उन्होंने आगे तर्क दिया, “इस परियोजना के कारण द्वीप पर बड़ी संख्या में बाहरी लोगों और पर्यटकों का आगमन होगा, जिससे शोम्पेन जनजाति अपनी पुश्तैनी जमीन से वंचित हो जाएगी और अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान खो देगी।” उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कानून और नियमों की उचित प्रक्रिया पर ध्यान नहीं दे रही है और देश के सबसे संवेदनशील समुदायों में से एक को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

उन्होंने यह भी लिखा कि परियोजना के तहत प्रस्तावित बंदरगाह ‘विवादास्पद’ है, क्योंकि इसका कुछ हिस्सा तटीय विनियमन क्षेत्र 1ए के अंतर्गत आता है। अपने लेख के अंत में उन्होंने अपील की कि इस ‘अन्याय और राष्ट्रीय मूल्यों के साथ किए जा रहे समझौते’ के विरुद्ध आवाज उठाई जानी चाहिए, ताकि केंद्र सरकार ग्रेटर निकोबार परियोजना को रोकने पर विवश हो। लेकिन सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र की इस सबसे पुरानी पार्टी को इस परियोजना से आपत्ति क्यों है, जो भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री वर्चस्व दिलाने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है?

महत्वाकांक्षी परियोजना

ग्रेटर निकोबार द्वीप विकास परियोजना 9 अरब डॉलर की एक मेगा योजना है, जिसे नीति आयोग ने परिकल्पित किया है और अंदमान एवं निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम (एएनआईआईडीसी) इसका क्रियान्वयन कर रहा है। इस परियोजना में बंदरगाह, हवाई अड्डा, विद्युत आपूर्ति और टाउनशिप जैसी आधुनिक सुविधाओं का विकास शामिल है। इसे भारत की समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक शक्ति को मजबूत बनाने वाला उत्प्रेरक माना जा रहा है।

आज हिंद महासागर क्षेत्र 21वीं सदी में वैश्विक शक्ति का केंद्र बन चुका है। भारत का लगभग 80 प्रतिशत विदेशी व्यापार और 100 प्रतिशत ऊर्जा आयात इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। ग्रेट निकोबार द्वीप, बंगाल की खाड़ी में अंदमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के दक्षिणी छोर पर स्थित है और यह सिक्स डिग्री चैनल के पास है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के निकट एक रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।

इसी मार्ग से 30-40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और चीन का बड़ा हिस्सा ऊर्जा आयातित होता है। इस सामरिक स्थान पर बंदरगाह बनने से भारत के कार्गो परिवहन लागत में भारी कमी आएगी। फिलहाल भारत के प्रमुख पूर्वी बंदरगाहों की गहराई केवल 8-12 मीटर है, जिससे वे बड़े जहाजों को संभाल नहीं पाते। इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय स्तर के बंदरगाहों की गहराई 12-20 मीटर तक होती है, जो 1,65,000 टन या उससे अधिक भार वाले जहाजों के संचालन में सक्षम हैं।

अभी भारत को लगभग 25 प्रतिशत कार्गो के लिए विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे प्रति वर्ष लगभग 1,500 करोड़ का प्रत्यक्ष बंदरगाह राजस्व और 3,000-4,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। जिस गैलेथिया बे में बंदरगाह प्रस्तावित है, वहां प्राकृतिक गहराई 18-20 मीटर है, जिससे भारत की विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी।

सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण

यह परियोजना सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में चीन, कोलंबो बंदरगाह के एक टर्मिनल को नियंत्रित करता है, जहां से भारत का 25 प्रतिशत कार्गो और 40 प्रतिशत व्यापार होता है। इससे चीन को हमारे व्यापारिक माल की निगरानी करने का अवसर मिलता है। इस नए बंदरगाह का विकास चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति को भी नियंत्रित करने में सहायता करेगा, जिसके अंतर्गत वह हिंद महासागर क्षेत्र में बंदरगाह और सुविधाएं बनाकर प्रभाव बढ़ा रहा है।

इस बंदरगाह के बनने से भारत की समुद्री चौकसी क्षमता को मजबूत होगी, क्योंकि यहां से प्रमुख समुद्री ‘चोकपॉइंट्स’ पर भारत निगरानी कर सकेगा। साथ ही, यह महत्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्र में भारत को एक ‘लॉजिस्टिक्स’ केंद्र बनाने में मदद करेगा। इस प्रकार, हम केवल एक बंदरगाह नहीं बना रहे, बल्कि अपनी समुद्री अवसंरचना की दशकों पुरानी कमजोरी को सुधार रहे हैं।

लेकिन कुछ शक्तियां भारत के हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं। इसलिए वे इस क्षेत्र में हमारे प्रभाव को रोकने के लिए विभिन्न हथकंडे अपना रही हैं। पर्यावरणीय चिंताओं और आदिवासी कल्याण की कथित चिंता को हथियार बनाकर भारत के प्रभाव को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।

सोनिया गांधी के लेख से ठीक एक सप्ताह पहले, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्रीय जनजातीय कल्याण मंत्री जुएल ओराम को पत्र लिखकर इस परियोजना को रोकने की मांग की थी। उनका तर्क था कि यह द्वीप की आदिवासी आबादी को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा। हालांकि, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने ‘द हिंदू’ में ही लेख लिखकर मां-बेटे की तथाकथित ‘जवाबदेही वाली चिंताओं’ का सटीक और तथ्यों पर आधारित उत्तर दिया।

विकास विरोधी लॉबी

लेकिन लगता है कि इस परियोजना को बाधित करने के पीछे एक और बड़ा षड्यंत्र काम कर रहा है, जिसका केंद्र ‘सर्वाइवल इंटरनेशनल’ नामक एक एनजीओ है। अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर यह संगठन दावा करता है कि वह ‘‘जनजातीय लोगों के विनाश को रोकने और उनकी जमीनों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए काम करता है। उन्हें एक मंच प्रदान करता है, जिससे वे दुनिया को उस जातीय हिंसा और नस्लवाद के बारे में बता सकें, जिसका वे रोज सामना करते हैं।” यह संस्था अपने लक्ष्यों को पाने के लिए लॉबिंग, एडवोकेसी और जनसंपर्क अभियानों पर निर्भर है।

इस परियोजना की घोषणा के बाद से ही सर्वाइवल इंटरनेशनल एनजीओ ने जनजातीय अधिकारों के नाम पर इसके विरोध में अभियान चलाया है। अप्रैल 2024 में 12 शिक्षाविदों और एनजीओ कार्यकर्ताओं ने अंदमान और निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि यह परियोजना जनजातीय अधिकारों की अनदेखी कर रही है। उन्होंने इस अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजना को रद्द करने की मांग की।

विडंबना यह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी इस परियोजना को रोकने के लिए ठीक वही आधार अपनाया है, जो इस अंतरराष्ट्रीय एनजीओ द्वारा प्रस्तुत किया गया है! बाद में इन कार्यकर्ताओं द्वारा लिखे गए पत्र को सर्वाइवल इंटरनेशनल ने अपनी वेबसाइट पर एक लेख में उद्धृत किया, जिसका शीर्षक था, ‘‘भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि मेगा-परियोजना से अविकसित द्वीप जनजाति का ‘विलुप्त होना’ तय है।’’

2025 में सर्वाइवल इंटरनेशनल ने संयुक्त राष्ट्र की जातीय भेदभाव उन्मूलन समिति (सीईआरडी) को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें भारत सरकार को मजबूर करने की कोशिश की गई कि वह ‘ग्रेटर निकोबार परियोजना की सभी वर्तमान और भविष्य की योजनाओं को त्याग दे।’ इस रिपोर्ट के शुरुआती पन्नों में पर्यटकों की आमद के कारण स्थानीय जनजातियों पर पड़ने वाले काल्पनिक नकारात्मक प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई थी।

रिपोर्ट में अप्रैल 2024 में एएनआईआईडीसीओ को भेजे गए तथाकथित विशेषज्ञों के पत्र का भी उल्लेख किया गया। यदि इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों की गंभीर समीक्षा की जाए, तो जनजातीय कल्याण और पारिस्थितिकीय चिंताओं की आड़ में छिपे असली और खतरनाक एजेंडे का पर्दाफाश हो जाएगा। उसी पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक थे आशीष कोठारी। कोठारी कल्पवृक्ष और विकल्प संगम के संस्थापक हैं। वे नर्मदा बचाओ आंदोलन से भी जुड़े हुए थे। यह आंदोलन भारत की कृषि अवसंरचना के विकास में बाधा डालने वाला नव-मार्क्सवादी अभियान माना जाता है।

विदेशी फंडिंग

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कोठारी, नर्मदा बांध विरोधी होने के बावजूद सरकार की नदी घाटी परियोजनाओं पर पर्यावरण मूल्यांकन समिति और जैव विविधता अधिनियम के लिए विशेषज्ञ समितियों में भी शामिल रहे हैं। दुनिया भलीभांति जानती है कि संप्रग का 10 साल लंबा शासन दिल्ली दरबार में शहरी नक्सलियों को सत्ता के गलियारों में स्थान देने के लिए बदनाम था। लेकिन जो बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है वह यह कि आशीष कोठारी एक तथाकथित स्वतंत्र मीडिया प्लेटफॉर्म ओपन डेमोक्रेसी से भी जुड़े रहे हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह मीडिया प्लेटफॉर्म लगातार जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिदयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन जैसी विवादास्पद संस्थाओं से फंडिंग प्राप्त करता रहा है।

  •  2021 में ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (ओएसएफ) ने ‘ट्रेकिंग द बैकलैश’ परियोजना को 24 महीनों की अवधि के लिए 6,00,000 डॉलर का अनुदान दिया था।
  •  उसी वर्ष ओएसएफ ने ओडीआर प्रोजेक्ट को समर्थन देने के लिए फिर से 24 महीनों के लिए 1,60,000 डॉलर का अनुदान दिया।
  • इसके अलावा ओएसएफ ने ‘जलवायु संकट और चिली में संवैधानिक सुधारों के इर्द-गिर्द जागरूकता और बहस को समृद्ध करने’ के लिए 25,000 डॉलर की सात महीने की निधि प्रदान की थी।
  •  2020 में, सोरोस की एक और संस्था ओपन सोसाइटी पालिसी सेंटर ने 40,000 से 60,000 यूरो ओपन डेमोक्रेसी को दिए थे।
    2012 से 2021 के बीच भारत की विकास यात्रा को बाधित करने वाले कई संस्थानों द्वारा इस तरह की फंडिंग बार-बार की गई। किसी भी एनजीओ को मिलने वाली फंडिंग उसे अपने फंडिंग करने वालों के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बाध्य कर देती है। ग्रेटर निकोबार द्वीप परियोजना के मामले में भी यही खेल खेला जा रहा है।यह पहली बार नहीं है जब सर्वाइवल इंटरनेशनल ने भारत की विकास यात्रा को बाधित करने का प्रयास किया है। 2021 और 2022 की इसकी वार्षिक रिपोर्ट में एक अभियान का उल्लेख मिलता है – ‘आदिवासीस अगेंस्ट कोल।’ इस अभियान की आड़ में इसने भारत की ऊर्जा अवसंरचना को बाधित करने और ऊर्जा सुरक्षा को कमजोर करने का प्रयास किया। आयकर विभाग ने एन्वायरोनिक्स ट्रस्ट को 104 पन्नों का नोटिस भेजा, जिसमें एनजीओ की फंडिंग गतिविधियों और कॉरपोरेट-विरोधी प्रदर्शनों में संलिप्तता को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए। इस पत्र में आरोप था कि एन्वायरोनिक्स ट्रस्ट ने लंदन स्थित सर्वाइवल इंटरनेशनल के साथ मिलकर झारखंड के गोड्डा स्थित अडाणी प्लांट के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भड़काए, ताकि अडाणी विरोधी आंदोलन को मजबूत किया जा सके।यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत के खिलाफ एक सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है, जिसका उद्देश्य है भारत की विकास यात्रा को बाधित करना। ये शक्तियां झूठे नैरेटिव गढ़कर भारत के खिलाफ प्रचार को हथियार बनाती हैं। दुष्प्रचार प्रोपेगंडा का उद्देश्य ही होता है- जनता का राज्य पर से भरोसा कम करना और वैकल्पिक लेकिन झूठे विमर्श के माध्यम से भ्रम और अविश्वास का वातावरण तैयार करना।

    गलत सूचनाएं और विमर्श ऐसे माध्यम बन जाते हैं, जिनके जरिए लोगों की सोच और विचारों को विकृत किया जाता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस लोकतंत्र की सबसे पुरानी पार्टी भारत की विकास गति को रोकने की इस गहरी और खतरनाक साजिश का हिस्सा क्यों बनती जा रही है? (लेखक स्तंभकार हैं)

Topics: पाञ्चजन्य विशेषसमुद्री सुरक्षा#ग्रेटर निकोबारसर्वाइवल इंटरनेशनलदिव्यांश कालादेश विरोधी एजेंडेएजेंट कांग्रेससोनिया गांधीविदेशी फंडिंगद हिंदू
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