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जाति को लेकर यूपी सरकार का बड़ा कदम, पुलिस रिकार्ड से लेकर रैली तक जाति का उल्लेख प्रतिबंधित  

उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर जाति आधारित रैलियों, एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो और सोशल मीडिया पर जाति उल्लेख पर रोक लगा दी। SC/ST मामलों को छोड़कर सभी दस्तावेजों से जाति कॉलम हटेगा। प्रवीण छेत्री मामले से निकला यह फैसला संवैधानिक समानता को मजबूत करेगा।

Written byसुनील रायसुनील राय
Sep 22, 2025, 01:36 pm IST
inउत्तर प्रदेश
Yogi Aadityanath

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश सरकार ने जाति आधारित रैलियों पर रोक लगा दी है। सार्वजनिक स्थानों, पुलिस रिकार्ड एवं सरकारी दस्तावेजों में जाति का उल्लेख किए जाने पर रोक लगा दी गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने जाति आधारित राजनीति और भेदभाव पर लगाम लगाने के यह महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कार्यवाहक मुख्य सचिव दीपक कुमार ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है।

अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने आपने आदेश में कहा है कि आप अवगत हैं कि एक सर्वसमावेशी, संवैधानिक मूल्यों के अनुकूल व्यवस्था, उत्तर प्रदेश सरकार की घोषित नीति है। इस हेतु यह आवश्यक है कि समाज में व्याप्त जातिगत विभेदकारी प्रवृत्तियों के उन्मूलन के दृष्टिगत पुलिस अभिलेखों एवं सार्वजनिक संकेतों में जाति आधारित अंकन एवं प्रदर्शन रोका जाए तथा जातीय प्रदर्शनों द्वारा जातीय संघर्ष प्रेरित करने वाले तत्वों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही की जाए।

उल्लेखनीय है कि क्रिमिनल मिसलेनियस एप्लीकेशन 482 संख्या-31545/2024 प्रवीण छेत्री बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य में उच्च न्यायालय, इलाहाबाद द्वारा 16 सितम्बर को आदेश के माध्यम से पुलिस के अभिलेखों में अभियुक्तों की जाति का उल्लेख न किये जाने तथा वाहनों, सार्वजनिक स्थानों पर साइन बोर्ड, सोशल मीडिया आदि में जातीय महिमामंडन से सम्बन्धित निर्देश दिए गए हैं। निर्देश के अनुसार, सोशल मीडिया, इंटरनेट पर जाति का महिमामंडन या नफरत फैलाने वाले कंटेंट के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी।

इसे भी पढ़ें: Navratri 2025: ‘दुर्गा’ सिर्फ देवी नहीं, चेतना की ऊर्जा हैं, पढ़िए सनातन परंपरा और वैज्ञानिक सोच का अद्भुत संगम

गिरफ्तारी, एफआईआर और मेमो से हटाया जाएगा जाति का कॉलम

एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो और चार्जशीट आदि दस्तावेजों से जाति का कॉलम हटाया जाएगा। अभियुक्त की पहचान के लिए पिता के साथ ही माता का भी नाम लिखा जाएगा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के क्राइम क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम (सीसीटीएनएस) के साफ्टवेयर में कुछ तकनीकी बदलाव किये जायेंगे। इस फार्मेट को भरते हुए जाति वाले कॉलम को खाली छोड़ा जाएगा। आगे चलकर इस कॉलम को हटवाने की व्यवस्था की जाएगी। वाहनों आदि पर भी जाति का उल्लेख या महिमामंडन करने पर कार्रवाई की जायेगी। नोटिस बोर्ड या फिर अन्य सार्वजनिक स्थलों पर जाति सम्बंधित नारा लिखने पर प्रतिबन्ध रहेगा। सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार का जाति आधारित नारा लिखने या महिमामंडन करना अब से प्रतिबंधित रहेगा। एससी/एसटी एक्ट मामले में जो भी एफआईआर दर्ज की जाएगी, उसमें  जाति का उल्लेख जरूरी होने के कारण इस आदेश से उसमें छूट गई है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया सरकार को निर्देश

उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि पुलिस रिकॉर्ड में अभियुक्त की ‘जाति’ का  उल्लेख करने की प्रथा को तत्काल समाप्त किया जाए। यह प्रथा, संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करती है और भारत में संवैधानिक लोकतंत्र के लिए यह गंभीर चुनौती है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 16 सितंबर 2025 को दिए गए इस महत्वपूर्ण निर्णय में उत्तर प्रदेश सरकार को दस्तावेजीकरण प्रक्रियाओं में व्यापक बदलाव करने का निर्देश दिया था।

क्या था पूरा मामला 

प्रवीण छेत्री नाम के व्यक्ति के खिलाफ पुलिस ने शराब तस्करी के मामले में कार्रवाई की थी। प्रवीण छेत्री की ओर से उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई। याचिकाकर्ता प्रवीण छेत्री का कहना था कि वह इटावा में किसी रिश्तेदार के यहां से लौट रहे थे। वहां पर सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध न होने के कारण उन्होंने स्कॉर्पियो से लिफ्ट मांगी। उस स्कार्पियो चालक ने उन्हें अपनी गाड़ी में बैठा लिया। कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में जब पुलिस ने वाहन चेकिंग की तो स्कॉर्पियो की डिग्गी में शराब की बोतलें बरामद हुईं, याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्हें इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी कि स्कॉर्पियो की डिग्गी में शराब रखी हुई है।

बता दें कि  पुलिस ने वाहन चेकिंग के दौरान 29 अप्रैल 2023 को स्कार्पियो की डिग्गी से 106 बोतल शराब बरामद हुई थी  इस मामले में प्रवीण छेत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस के दस्तावेज में अभियुक्तों के कॉलम में याचिकाकर्ता की जाति पहाड़ी राजपूत के रूप में दर्ज की गई थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रवीण छेत्री की याचिका की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक से अभियुक्तों की जाति लिखे जाने के बारे में शपथ पत्र दाखिल करने के लिए कहा था। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने अपने शपथ पत्र में यह कहा कि अभियुक्त की पहचान में किसी भी भ्रम से बचने के लिए, अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम के अंतर्गत डिजाइन किए गए फॉर्मों में कॉलम की अनिवार्यता और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत मामलों में जाति दर्ज करने की आवश्यकता पड़ती है।”

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक के तर्क को  खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि आधार कार्ड, फिंगरप्रिंट और मोबाइल कैमरों जैसे आधुनिक उपकरणों के युग में पहचान के लिए जाति पर निर्भरता एक प्रकार की  “कानूनी भ्रांति” है। उच्च न्यायालय के इसी आदेश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने जाति संबंधी उक्त आदेश जारी किया है।

Topics: इलाहाबाद हाईकोर्ट आदेशएफआईआर में जाति उल्लेखप्रवीण छेत्री मामलाcaste-based ralliescaste mention in FIRAllahabad High Court OrderPraveen Chhetri caseउत्तर प्रदेश सरकारUttar Pradesh GovernmentSC/ST ActSC/ST एक्टजाति आधारित रैलियां
सुनील राय
सुनील राय
पाञ्चजन्य ब्यूरो चीफ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश [Read more]
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