विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों जैसे भारत, यूनान, मेसोपोटामिया और मिस्र में मातृ पूजा की प्राचीन परंपरा रही है। यह पूजा समाज की निरंतरता में मातृशक्ति के योगदान को मान्यता देने के लिए आरंभ हुई। विशेषकर भारत में वैदिक साहित्य एवं सरस्वती-सिंधु संस्कृति से मातृदेवियों के पूजन के पुरातात्विक प्रमाण मिलते हैं। देवी पूजा का स्वरूप शक्ति पूजा के रूप में भी पाया जाता है, जहां विभिन्न देवताओं की क्रियाशील शक्तियों और उनकी मातृ शक्तियों की उपासना होती है। मान्यता है कि शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।

अध्यक्ष, विद्वत परिषद, भारतीय इतिहास संकलन समिति हरियाणा
शक्ति पूजा में राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों की भी भूमिका रही है। विदेशी आक्रमणों के विरोध के लिए शक्ति पूजन को बढ़ावा मिला। इसके अतिरिक्त, मनुष्यों के भीतर अंधकार, अज्ञानता या राक्षसी प्रवृत्तियों से संघर्ष और उन पर विजय पाने की इच्छा भी शक्ति पूजा का एक कारण है। शक्ति पूजा हमारे धार्मिक दर्शन में जीवन और सृष्टि की मूलधारा को दर्शाती है, जिसमें मां को जगत जननी माना जाता है। इस पूजा ने सदियों से भारतीय समाज में न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को भी स्थापित रखा है।
वैदिक साहित्य में मातृ देवी
संस्कृत साहित्य में ऋ ग्वेद ही देवी पूजा एवं आराधना का प्रमुख स्रोत है। ऋ ग्वेद में उषा, रात्रि, सरस्वती और अदिति जैसे देवी स्वरूपों के सूक्त और मंत्र मिलते हैं। अदिति को दर्शन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है और उन्हें प्रकृति की शक्तियों की माता कहा जाता है। कालांतर में यही शक्ति दुर्गा और उनके अनेक रूपों के माध्यम से विकसित हुई। ऋ ग्वेद में उषा को मही माता का रूप दिया गया है, जिन्हें सायणाचार्य ने आकाश की पुत्री कहा है। उषा को धन, पशु आदि देने वाली भी माना गया है। ऋ ग्वेद के देवी सूक्त और रात्रि सूक्त में वाक्, पृथ्वी और रात्रि देवी की कल्पना की गई है।
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥
(ऋ ग्वेद 1.89.10)
इस मंत्र में अदिति को प्रकृति का स्वरूप माना गया है, जो आकाश, वायु, माता-पिता और पुत्र के रूप में सर्वव्यापी हैं। सृष्टि में जो कुछ हुआ है और होगा, वह सभी अदिति का रूप है। यह पूर्णतया प्रकृति और ब्रह्माण्ड की जननी का परिचायक है।
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
अहं मित्रवरुणोभा बिभर्म्याहमिन्द्राग्नि अहमश्विनोभा॥
(ऋ ग्वेद 10.125.8)

यहां स्वयं वाक् देवी घोषणा करती हैं कि मैं ही रुद्रगण, वसुओं, आदित्यगणों और विश्वदेवों के साथ रहती हूं। मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि तथा दोनों अश्विनी कुमार सभी को मैं ही धारण करती हूं।
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्या वेशयन्तीम्॥
(ऋ ग्वेद 10.125.3)
अर्थात् मैं अनंत कोटि ब्रह्मांड की नायिका हूं। मैं धन-धान्य के खजानों की अधिष्ठात्री हूं और अपने भक्तों को वह प्रदान करती हूं। मैं देवी-देवताओं के बीच सर्व-पूज्य हूं। मैं कई रूपों में, भिन्न अवतारों में और विभिन्न अभिव्यक्तियों के साथ, कई शरीरों में आत्मा बनकर प्रवेश करती हूं, इसीलिए देवताओं ने मुझे अनेक स्थानों पर स्थापित किया है। अतः पृथ्वी और आकाश से परे एक अनंत शक्ति का नाम ही अदिति है।
अथर्ववेद (8.9.20) में कहा गया है कि अष्टयोनिरदितिरष्टपुत्राष्टमीं रात्रिमभि हव्यमेति। अर्थात् अदिति अष्टमी की रात्रि में हविष्यान्न को ग्रहण करती है।
तैतिरीय आरण्यक (10. 8 -10) में अंबिका को रुद्र की पत्नी कहा गया है। केन उपनिषद में उमा देवी को समस्त ब्रह्मविद्या का स्वरूप माना गया है। यह उपनिषद चार खडों में है, जिसमें गुरु-शिष्य संवाद के माध्यम से ब्रह्म की सर्वव्यापकता और उसके गूढ़ रहस्यों का वर्णन है। मुंडक उपनिषद 1.2.4 के अनुसार, अग्नि की सात जीवह्या शक्तियां (काली, कराली, मनोज्वा, सुलोहिता, सुधूम्र वर्णा, स्फूर्लिंगनी और विश्वरुचि) कालान्तर में सप्तमातृका के रूप में विकसित हुईं। ‘जीवह्या शक्ति’ का अर्थ है जीव-जगत में निवास करने वाली वह ऊर्जा या शक्ति, जो जीवन को बनाए रखती है, जिसे जीवन शक्ति या जीवनी शक्ति भी कहते हैं। यह शब्द विशेष रूप से प्राण शक्ति से जुड़ा है, जो सभी जीवित प्राणियों में मौजूद एक मूलभूत शक्ति है और शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।
गृह सूत्रों में दुर्गा, भवानी, भद्रकाली जैसे रूपों का उल्लेख मिलता है, जो स्पष्ट करता है कि उत्तर वैदिक काल से ही देवी के विभिन्न स्वरूप प्रचलित थे। महाभारत, हरिवंश पुराण में शाक्त संप्रदाय का विवरण है, जिसमें दुर्गा, काली, पार्वती के अनेक उल्लेख हैं। अदिति को ऋ ग्वेद में प्रकृति का रूप माना गया है और शक्ति पूजा सामाजिक एवं राजनीतिक संदर्भों में महत्वपूर्ण रही। गुप्त काल तक देवी पूजा विष्णु, शिव जैसे देवताओं की शक्तियों के रूप में विकसित हुई और लोक परंपरा, तंत्र के प्रभाव से शक्ति पूजा व्यापक हुई।
महाभारत के वन पर्व में दुर्गा को यशोदा एवं नंद की कन्या कहा गया है तथा उन्हें माता काली एवं दुर्गा के नाम से संबोधित किया गया है। भीष्म पर्व के अध्याय 23 में श्रीकृष्ण के निर्देश पर अर्जुन ने दुर्गा स्तोत्र का पाठ किया, जिसमें दुर्गा के अनेक नामों का उल्लेख है। कालिदास के रघुवंश महाकाव्य के सर्ग दो में पार्वती द्वारा लगाए गए देवदारू वृक्ष की रक्षा के लिए एक सिंह को नियुक्त करने का उल्लेख है। पार्वती को गौरी, भवानी और चंडी के रूप में भी जाना जाता है। ये नाम रघुवंश महाकाव्य, कुमारसंभवम् तथा मेघदूत में भी पाए जाते हैं। कुमारसंभवम् में शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप का उल्लेख भी है।
मालती माधव अंक 5 में चामुंडा को पद्मावती नगरी में मानव बलि देते हुए दर्शाया गया है। मृच्छकटिकम् (6.27) में शुंभ और निशुंभ का दुर्गा द्वारा वध का वर्णन मिलता है। मार्कण्डेय पुराण के देवी महत्व में दुर्गा की संपूर्ण कथा है। अथर्ववेद में अदिति द्वारा अष्टमी की रात्रि में हविष्यान्न ग्रहण करने का उल्लेख है, जिससे अष्टमी को देवी की विशेष पूजा का स्वरूप मिला।
अष्टयोनिरदितिरष्टपुत्राष्टमीं रात्रिमभि हव्यमेति।
(अथर्ववेद 8.9.20)
कालान्तर में शक्ति उपासकों का विशेष संप्रदाय शाक्त स्थापित हुआ। वैदिक साहित्य के आधार पर देवी की मूर्तियां भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में पूजित होने लगीं। गुप्तकाल आते-आते विष्णु, ब्रह्मा, कार्तिकेय, इंद्र आदि देवों की शक्तियों के रूप में देवी पूजा होने लगी और इनके आयुध भी देवियों के साथ अंकित किए जाने लगे। इसके पश्चात् लोक परंपरा, स्थानीय मान्यताओं और तंत्र का प्रभाव शक्ति पूजा में समाहित होने लगा।
देवी के मुख्यत: दो रूप होते हैं- सौम्य एवं रौद्र। सौम्य रूप में लक्ष्मी, सरस्वती, गौरी, पार्वती आदि की मूर्तियां बनाई गईं, जो पोषण, शांति और समृद्धि का प्रतीक हैं। रौद्र स्वरूप में देवी के क्रोधित और संहारक रूप प्रस्तुत होते हैं, जैसे-काली, भद्रकाली, महिषासुरमर्दिनी, जिनके हाथों में त्रिशूल, शंख, चक्र, गदा, धनुष, बाण, पास, अंकुश, खटवांग एवं कपाल पात्र जैसे अनेक आयुध होते हैं। उनका एक हाथ अभय या वरद मुद्रा में होता है, जो भक्तों के आश्रय और सुरक्षा का प्रतीक है। आगम ग्रंथों एवं पुराणों में दुर्गा के नौ रूपों का उल्लेख मिलता है। ये हैं-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। देवी का वाहन सामान्यतः सिंह है। विभिन्न रूपों के बीच लक्ष्मी, महिषासुरमर्दिनी और दुर्गा अत्यंत लोकप्रिय हैं, जिनकी पूजा व्यापक रूप से की जाती है।
पुरातत्व में देवी
सरस्वती-सिंधु संस्कृति में मातृ देवी की अनेक मृण्मूर्तियां (मिट्टी की मूर्तियां) मिली हैं, जिन पर कुमकुम और अगरबत्ती के धुएं के चिह्न दर्शाए गए हैं, जो मातृ पूजा के प्राचीन प्रमाण हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में मातृ पूजा प्रचलित थी। ईसा पूर्व दूसरी सदी से मिट्टी और पत्थर की मूर्तियां बनीं, जो विभिन्न रूपों में थीं। कई राजाओं के सिक्कों पर भी देवी के चित्र मिलते हैं।
दुर्गा की मूर्तियों में सिंह वाहन के साथ चतुर्भुजी या अधिक भुजाओं वाली मूर्तियां खजुराहो, एलोरा, बादामी और हिंगलाज जैसे स्थानों पर पाई गई हैं। मोढेरा (गुजरात) के सूर्य मंदिर से भी सिंह वाहन और चतुर्भुज दुर्गा की मूर्तियां मिली हैं। महाबलीपुरम (तमिलनाडु) और ओसियां (राजस्थान) से भी दुर्गा की ऐसी मूर्तियां मिली हैं, जिनमें सिंह वाहन और चतुर्भुज स्वरूप है। ये मूर्तियां भारतीय कला और पूजा परंपरा में देवी पूजा की प्राचीनता और व्यापकता को दर्शाती हैं।
महिषासुरमर्दिनी
माता का महिषासुरमर्दिनी स्वरूप की प्रसिद्धि पूरे भारतवर्ष में व्यापक है। इनका प्रादुर्भाव देवताओं की पराजय के बाद हुआ, जब सभी देवताओं ने एक तेजस्वी देवी की सृष्टि की, जिसमें ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इंद्र, वरुण, सूर्य, कुबेर, प्रजापति, चंद्रमा आदि की शक्तियां समाहित थीं। सभी देवताओं ने देवी को अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए और उन्होंने महिषासुर का संहार किया। यह स्वरूप शक्ति की सामूहिकता व सामाजिक संगठन का प्रतीक और विकास का मूलाधार है। देवी की आकृति में महिषासुर का मस्तक रहित धड़ होता है, जिसमें मानव आकृति उभरती है।
प्रारंभिक मूर्तियों में देवी को त्रिशूल से महिषासुर पर प्रहार करते हुए दर्शाया गया, जबकि मध्यकालीन मूर्तियों में असुर की कटी गर्दन से मानव देहधारी असुर निकलते हुए और देवी त्रिशूल से प्रहार करते हुए दिखाई देती हैं। महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियों का निर्माण कुषाण काल से शुरू हुआ और गुप्त काल में यह अत्यधिक लोकप्रिय हुई। विष्णु धर्मोत्तर पुराण और अपराजितपृच्छ आदि शिल्प ग्रंथों में देवी के स्वरूप निर्धारित किए गए हैं। ये मूर्तियां प्राचीन भारतीय कला एवं धार्मिक मान्यताओं में देवी स्वरूप की महत्ता को दर्शाती हैं।
इसी तरह, महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियों का निर्माण कुषाण काल में आरंभ हुआ, जो गुप्त काल में अधिक लोकप्रिय हुईं। गुप्त काल में देवी की मूर्तियों में भुजाओं की संख्या चार से बढ़कर बीस तक हो गई। यह स्वरूप अत्यंत जनप्रिय रहा। राजस्थान के टोंक जनपद के उनियार क्षेत्र और नागर क्षेत्र से महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियां मिली हैं, जिसका काल ईसवी सन् के आरंभ का माना जाता है।
मध्यकाल में महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियां लगभग सभी प्रमुख मंदिरों जैसे एलोरा, ओसियां, महाबलीपुरम, भुवनेश्वर और खजुराहो में बनीं। ज्यादातर मूर्तियों में देवी को असुर का संहार करती हुई दिखाया गया है, जिसमें देवी का दाहिना पैर असुर के वाम कंधे पर होता है और सिंह आक्रमण की मुद्रा में होता है। कुछ मूर्तियों में असुर की मानव आकृति निकलती हुई दिखाई देती है-जैसे महाबलीपुरम और एलोरा के कैलाश मंदिर की मूर्ति।
कुषाण काल से मध्यकाल तक महिषासुर मर्दिनी की आठ मूर्तियां राजस्थान के उदयपुर के समीप अंबिका मंदिर में प्राप्त हुई हैं। खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर, कंदरिया महादेव मंदिर और वहां के संग्रहालय में भी महिषासुर मर्दिनी की मूर्तियां मौजूद हैं, जिनमें देवी के चार से 18 हाथ दर्शाए गए हैं। लक्ष्मण मंदिर की मूर्ति में देवी त्रिशूल से महिष की गर्दन काटती हुई और सिंह महिष पर आक्रमण करता दिखाया गया है। भुवनेश्वर में भी महिषासुरमर्दिनी की अनेक मूर्तियां मिली हैं, जिनमें देवी असुर का संहार करती हुई, दिव्य मुद्रा में अपने दाहिने पैर से असुर के वाम कंधे पर तथा सिंह आक्रमण की मुद्रा में उत्कीर्ण हैं। एलोरा के गुफा नंबर 14, 15, 16, 17, 21 और 27 में ऐसी दस मूर्तियां हैं, जिनमें देवी के हाथों की संख्या चार से आठ तक है। कैलाश मंदिर की अष्टभुजी मूर्ति और महाबलीपुरम की भी ऐसी मूर्तियां हैं, जिनमें देवी शरसंधान की मुद्रा में हैं। वाराणसी के कला भवन में 9वीं से 11वीं शताब्दी की महिषासुरमर्दिनी की 12 भुजाओं वाली मूर्तियां भी हैं।
इसके अलावा, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे-इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम आदि में भी महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। इस स्वरूप की मूर्तियां कई यूरोपीय देशों और अमेरिकी संग्रहालयों में भी उपलब्ध हैं। बौद्ध वज्रयान परंपरा में भी अनेक हिंदू मूर्तियों को शामिल किया गया है, जिनमें चीन के केयुवान मंदिर में महिषासुरमर्दिनी विशेष रूप से अंकित हैं। 8वीं से 11वीं शताब्दी के बौद्ध मंदिरों में उत्तर-पूर्व भारत, अफगानिस्तान और इंडोनेशिया में भी महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियां देखने को मिलती हैं।
मुद्राओं पर देवी का अंकन
माता लक्ष्मी का सर्वप्रथम अंकन दूसरी शती ईसवी पूर्व की कौशांबी की मुद्राओं पर मिलता है। लगभग इसी युग की उज्जैनी की मुद्राओं पर भी लक्ष्मी का चित्र अंकित है। शुंग शासक सुज्येष्ठ की मुद्रा पर दाहिने हाथ में पुष्प लिए कमल पर माता लक्ष्मी खड़ी हैं, जिनके दोनों ओर कमल पर खड़े हाथी अपनी सूंड में कलश लेकर जल छिड़क रहे हैं। बृजभूषण श्रीवास्तव के अनुसार यह गज लक्ष्मी का मुद्रा चित्रण है, जो बाद में अयोध्या के राजा वायुदेव, विशाख देव एवं शिव दत्त की मुद्राओं पर भी मिलता है।
मथुरा से प्राप्त गोमित्र, ब्रह्म मित्र, घोष दत्त आदि की मुद्राओं में लक्ष्मी को दाहिने हाथ में कमल लिए खड़ी मुद्रा में दर्शाया गया है, जो अत्यंत लोकप्रिय रही। कई विदेशी शासकों ने भी इस मुद्रा को अपनाया, जिनमें अजिशीलेज, रजबुल और सोडास की मुद्राएं उल्लेखनीय हैं। कुछ मुद्राओं पर देवी का चित्र दोनों ओर अंकित है। भारतीय सिथियन राजवंश की एक स्वर्ण मुद्रा में दर्शाई गई स्त्री प्रतिमा को गार्डनर ने पुष्कलावती का नगर देवता कहा, परंतु वह लक्ष्मी ही हैं।
कनिष्क के सिक्कों पर भी देवी का चित्र मिलता है, जिसमें वह पाश और राज दंड लिए हुए हैं। गुप्त काल के सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम (305 ई. से 325 ई.) के सिक्कों पर सिंहवाहिनी देवी का, जबकि समुद्रगुप्त के स्वर्ण सिक्के पर लक्ष्मी के बाएं हाथ में धनुष तथा दाहिने में तीर है। ये सभी मुद्राएं लक्ष्मी की प्राचीनता और मान्यता को दर्शाती हैं।
इस प्रकार, वेदों से लेकर आधुनिक लेखन और भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों तक में देवी के विभिन्न रूपों के हजारों संदर्भ मिले हैं। वहीं पुरातत्व में मूर्तियां, सिक्के, भित्ति चित्र आदि पर भी देवी के अनेक रूप अंकित हैं। भारत में वर्ष में दो बार नवरात्रि पर्व के समय देवी की विशेष पूजा होती है, जिसकी अवधि क्षेत्रीय रूप से भिन्न होती है। आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी से लेकर आश्विन शुक्ल नवमी तक 15 दिन की पूजा का उल्लेख भी मिलता है, जबकि सामान्य रूप से आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रथमा से नवमी तक पूजा होती है।
बंगाल में छठी से नवमी अथवा सप्तमी से नवमी तक पूजा की जाती है। केवल अष्टमी या नवमी के दिन भी पूजा का विकल्प पुराणों में मिलते हैं। चैत्र मास में भी ऐसी पूजा की जाती है। इस प्रकार पूजा में विविधताएं हैं, पर यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। जिस प्रकार महिषासुरमर्दिनी में दैवीय एकता है, उसी प्रकार राष्ट्र निर्माण में भी सभी राष्ट्रीय शक्तियों के बीच सामंजस्य अत्यावश्यक है। n

















