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पश्चिमी देशों का डर और यूक्रेन की मदद करने की मजबूरी

पश्चिमी देशों ने रूस को उलझाए रखने के लिए यूक्रेन नाम की कमजोर दीवार तो खड़ी कर दी, लेकिन उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि इस दीवार के ढहते ही रूस यूक्रेन तक नहीं रुकेगा, वो दूसरे पश्चिमी देशों पर भी हमले करेगा।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Sep 21, 2025, 08:11 am IST
inविश्व, विश्लेषण
Russia Ukraine War western countries fear

प्रतीकात्मक तस्वीर

रूस और यूक्रेन के बीच पिछले 3 साल से भी अधिक वक्त से युद्ध चल रहा है। फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन के खिलाफ मिलिट्री अभियान की शुरुआत की थी। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच चल रहा युद्ध तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। रूसी हमलों से यूक्रेन का पूर्वी हिस्सा तबाह हो चुका है। नाटो और पश्चिमी देशों की मदद से वह हांफते ही सही अभी भी युद्ध में टिका हुआ है। लेकिन, रूस की आक्रामकता को देखते हुए पश्चिमी देश न चाहते हुए भी यूक्रेन की मदद करने के लिए मजबूर हैं।

अब तो रूस ने एक-एक करके नाटो देशों पर भी हमले करने शुरू कर दिए हैं। हाल ही में नाटो ने यूक्रेन में अपनी सेना को भेजने की भी बात कही थी, जिसके बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के चेतावनी दी थी कि इस युद्ध में जिस किसी भी देश की सेना यूक्रेन में घुसेगी, वही उनका पहला टार्गेट होगा। यानि की पुतिन यूक्रेन से पहले उस देश पर मिसाइलें बरसाएंगे। पुतिन की धमकियों के बाद किसी भी देश ने ऐसी हिमाकत करने की चेष्टा नहीं की।

हालांकि, पश्चिमी देश अभी भी लगातार यूक्रेन को फंडिंग के साथ ही हथियारों की भी आपूर्ति कर रहे हैं। वे सहायता को रोकने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। जबकि, इनके खुद के देश की हालत पतली होती जा रही है। नाटो और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के लिए यह द्वंद्व न केवल रणनीतिक है, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक भी।

क्या है पश्चिमी देशों का डर?

पश्चिमी देशों ने युद्ध की शुरुआत में यूक्रेन को नाटो में शामिल होने का झांसा देकर युद्ध की आग में झोंक दिया। उन्हें लगा था कि रूस पीछे हट जाएगा। लेकिन, उनकी अपेक्षाओं के विपरीत रूस न केवल मजबूती से खड़ा है, बल्कि अब तो वह नाटो देशों लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया पर भी हमले कर चुका है। जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस समेत कई प्रमुख पश्चिमी देश बंकरों का निर्माण कर रहे हैं। साथ ही विश्वयुद्धों के दौरान बनाए गए बंकरों को भी रिपेयर कर रहे हैं। पश्चिमी देशों ने रूस को उलझाए रखने के लिए यूक्रेन नाम की कमजोर दीवार तो खड़ी कर दी, लेकिन उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि इस दीवार के ढहते ही रूस यूक्रेन तक नहीं रुकेगा, वो दूसरे पश्चिमी देशों पर भी हमले करेगा।

इसे भी पढ़ें: मेटा का शर्मनाक खेल: UK में पुरुषों को आकर्षित करने के लिए स्कूली लड़कियों की फोटो से ऐड चलाया, भारत के लिए चेतावनी

यही है वो डर, जो कि पश्चिमी देशों को यूक्रेन की मदद करने के लिए मजबूर कर रहा है। इस बात को इससे समझा जा सकता है कि हाल ही में फिनलैंड के राष्ट्रपित एलेक्जेंडर स्टब ने कहा है कि रूस से लड़ने के लिए यूक्रेन की सुरक्षा गारंटी लेनी होगी। असलियत में ये यूक्रेन का युद्ध में टिके रहना पश्चिमी देशों के लिए सुरक्षा की गारंटी है। इसी को ध्यान में रखते हुए अमेरिका और यूरोप ने PURL प्रोग्राम शुरू किया है, जिसके तहत नाटो देश अरबों डॉलर के हथियार खरीद रहे हैं। 26 देशों ने यूक्रेन को सैन्य सहायता का वादा किया है।

घरेलू दबावों से जूझ रहा पश्चिम

पश्चिमी नेता घरेलू दबावों जैसे आर्थिक चुनौतियां और आंतरिक राजनीति के बाद भी यूक्रेन की सहायता जारी रखे हुए हैं। उन्हें लगता है कि रूस की जीत यूरोपीय एकजुटता को चूर-चूर कर देगी। एक ओर डर से सैन्य खर्च बढ़ रहा है, दूसरी ओर मजबूरी से सहायता का बोझ। 1275 दिनों से चली आ रही जंग में पीड़ा और हानि के बीच, यूक्रेन की उम्मीद पश्चिम पर टिकी है। भविष्य में यदि युद्धविराम हुआ, तो सुरक्षा गारंटी का पेच सुलझाना होगा।

Topics: Russia-Ukraine warयूक्रेनukraineWestern countriesपश्चिमी देशपश्चिमी देशों की यूक्रेन की मजबूरीरूसी आक्रामकताWestern countries' compulsion against UkraineRussian aggressionरूस-यूक्रेन युद्ध
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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