राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस में संवैधानिक संस्थाओं पर हमला 'संविधान पर हमला है'
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राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस में संवैधानिक संस्थाओं पर हमला ‘संविधान पर हमला है’

राहुल गांधी की 18 सितंबर 2025 प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग पर 'हाइड्रोजन बम' जैसे आरोप: BJP का दावा- संवैधानिक संस्थाओं पर हमला संविधान पर सीधा प्रहार है। वोट चोरी के दावों का विश्लेषण और लोकतंत्र पर प्रभाव।

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान
Sep 20, 2025, 11:41 am IST
in विश्लेषण
Rahul Gandhi Vote Chori

राहुल गांधी

भारतीय लोकतंत्र केवल मतपत्रों का संग्रह नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संसद के प्रति विश्वास का प्रतीक है। ये संस्थाएँ संविधान की आत्मा हैं, जो स्वतंत्रता, निष्पक्षता और शुचिता की गारंटी देती हैं। किन्तु जब राजनीतिक स्वार्थ या भारत विरोधी विदेशी ताकतों के टूलकिट के आधार पर इन संस्थाओं के प्रति अविश्वास फैलाया जाता है और इस तारतम्य में राहुल गांधी चुनाव आयोग पर ही “चुनावी धांधली” , “वोट चोरी”  या “एटम बम”  “हाइड्रोजन बम”  जैसे अतिशयोक्तिपूर्ण जुमलों के माध्यम से बिना सिर पैर वाली प्रेस कांफ्रेंस की जाने लगें तो यह कार्य लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर करता है, तथा करोड़ों मतदाताओं का भी अपमान करता है।

प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि  क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें पड़ोसी देशों के अनुभवों, भारत के चुनावी इतिहास, विशेष रूप से कांग्रेस से जुड़े मामलों, विधिक प्रावधानों और न्यायिक निर्णयों का निष्पक्ष विश्लेषण करना होगा।

पड़ोसी देशों में अविश्वास और अस्थिरता

पड़ोसी देशों में संवैधानिक संस्थाओं खास तौर पर चुनाव आयोग पर अविश्वास के कारण उत्पन्न अस्थिरता भारत के लिए भी चेतावनी है। पाकिस्तान में 2013 और 2018 के आम चुनावों में इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ ने चुनाव आयोग पर धांधली के आरोप लगाए। 2014 में इस्लामाबाद में महीनों तक चले धरने और हिंसा ने राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया, जिससे सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा।

बांग्लादेश 

बांग्लादेश में 2014 के चुनाव में खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनाव आयोग को शेख हसीना की कठपुतली बताकर बहिष्कार किया, जिसके परिणामस्वरूप संसद में विपक्ष का प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त हो गया। नेपाल में 2006-2008 के दौरान माओवादी नेताओं ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, जिससे संविधान सभा के गठन में वर्षों की देरी हुई।

श्रीलंका

श्रीलंका में 2005 और 2010 के राष्ट्रपति चुनावों में विपक्ष ने आयोग पर महिंद्रा राजपक्षे के पक्ष में धांधली का आरोप लगाया, जिसने हिंसक प्रदर्शनों और तमिल-सिंहली तनाव को बढ़ाया। म्यांमार में 2020 के चुनावों में सेना समर्थित यूएसडीपी ने आयोग पर धांधली का आरोप लगाकर 2021 में तख्तापलट कर दिया, जिसने देश को गृहयुद्ध की कगार पर ला खड़ा किया।

परिणाम यह हुआ कि आज ये सारे देश अस्थिर, हिंसाग्रस्त, अभावग्रस्त और विदेशी ताकतों द्वारा बाजार और संसाधनों की लूटपाट का अड्डा बनकर रह गए हैं। वहां गरीब एवम मध्यमवर्ग जनता भूखी मरने की कगार पर है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि संवैधानिक संस्थाओं पर निराधार अविश्वास किसी भी देश के लोकतंत्र को किस प्रकार  अराजकता और हिंसा की ओर धकेलता है।

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भारत में कांग्रेस से जुड़े चुनावी धांधली के मामले

भारत में चुनाव आयोग पर अविश्वास फैलाने का काम कांग्रेस कर रही है, जिसका सत्ता में होने पर निष्पक्ष चुनाव का ट्रेक रिकार्ड कालिमा युक्त है। जो कोर्ट के इन मामलों से स्पष्ट हो जाता है। क्योंकि भारत में 1951 से ही चुनावी विवाद न्यायालयों तक पहुँचे हैं, और कुछ चर्चित मामले कांग्रेस से जुड़े हैं। जैसे 1952 के N.P. Ponnuswami v. Returning Officer मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने से पहले हस्तक्षेप नहीं होगा; निर्वाचन याचिका ही उचित उपाय है। इसी प्रकार 1954 के Jamuna Prasad Mukhariya v. Lachhi Ram के केस में में कोर्ट ने धर्म या जाति के आधार पर कांग्रेस के वोट माँगने को भ्रष्ट आचरण माना, जो कांग्रेस की रणनीतियों पर भी लागू हुआ।

इंदिरा गांधी ने रायबरेली में की थी चुनाव धांधली

सबसे चर्चित मामला 1975 का Indira Nehru Gandhi v. Raj Narain है, जिसमें इंदिरा गांधी की रायबरेली सीट से चुनावी धांधली कर पाई गई जीत को, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पर्याप्त सबूतों और सुनवाई के बाद रद्द कर दिया था । उन पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण का भी आरोप था, जैसे कि मतदाता सूची में हेरफेर और प्रचार में अनुचित लाभ।
सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष चुनाव को संविधान की मूल संरचना (बेसिक स्ट्रक्चर ) घोषित किया, हालाँकि आपातकाल के दौरान संशोधनों ने इस फैसले को प्रभावित किया।

बिहार में कांग्रेस ने बूथ कैप्चर किया

इसी प्रकार 1980 के बिहार चुनावों में भी कांग्रेस पर बूथ कैप्चरिंग और मतदाता दमन के आरोप लगे। Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner (1978) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को पुनर्मतदान का अधिकार दिया, जो बिहार में लागू हुआ। 1989 के बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर बूथ कैप्चरिंग और हिंसा के आरोप लगे, जिसके कारण कई जगह पुनर्मतदान हुआ। Gajanan Krishnaji Bapat v. Dattaji Raghobaji Meghe (1995)के मामले में कोर्ट ने बूथ कैप्चरिंग को “लोकतंत्र की हत्या” कहा, जो कांग्रेस से जुड़े मामलों में  प्रासंगिक था।

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हार से झुंझलाए राहुल गांधी संवैधानिक संस्थाओं को बना रहे निशाना 

हाल के दशकों में, विशेष रूप से 2014 और 2019 के चुनावों में बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस नेताओं, खासकर राहुल गांधी ने, EVM हैकिंग और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। 2019 में “चौकीदार चोर है” जैसे नारे और EVM पर अविश्वास ने जनता में भ्रम फैलाया, जिसे आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस और तकनीकी प्रदर्शनों से खारिज किया। इन आरोपों ने न केवल संस्थाओं की विश्वसनीयता को चुनौती दी, बल्कि विधिक दायित्वों को भी उजागर किया।

चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और सर्वोच्च अधिकार देता है। Kanhiya Lal Omar v. R.K. Trivedi (1985) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के plenary powers को रेखांकित किया। आयोग ने EVM की विश्वसनीयता के लिए VVPAT और हैकथॉन जैसे कदम उठाए हैं। फिर भी, जब “एटम बम” ,”हाइड्रोजन बम” जैसे अतिशयोक्तिपूर्ण बयान यदि नेता प्रतिपक्ष की आसंदी से दिए जाते हैं, तो यह संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, मुश्किल तो तब होती है पत्रकारों के पूछने पर की यदि सबूत हैं तो कोर्ट में क्यों नही जाते ?  तब यही नेता कहते हैं कि भारत का लोकतंत्र बचाने की मेरी जिम्मेदारी नही है ।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसका दुरुपयोग

अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, किन्तु अनुच्छेद 19(2) इसके दुरुपयोग पर प्रतिबंध भी लगाता है। Shreya Singhal v. Union of India (2015) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है; यह लोक-व्यवस्था, नैतिकता और संस्थाओं की गरिमा के अधीन है। चुनावी मंचों से बिना ठोस प्रमाण के राजनीतिक स्वार्थों के कारण दिए गए “वोट चोरी”  , ” एटम बम ” “हाइड्रोजन बम” जैसे आरोप न केवल भ्रामक हैं, बल्कि जनता में अविश्वास और अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं, साथ ही किसी विदेशी इशारे पर भारत की संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध अपने कार्यकर्ताओं को भड़काने वाले भी प्रतीत होते हैं।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधान

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(4) किसी उम्मीदवार के निजी चरित्र पर झूठे आरोप को भ्रष्ट आचरण मानती है। धारा 125 धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर वैमनस्य फैलाने को दण्डनीय ठहराती है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 175 (पूर्व IPC 171G) चुनावी संदर्भ में झूठे बयानों को दण्डित करती है, जिसमें जुर्माना या सजा का प्रावधान है। ये प्रावधान नेताओं को निराधार आरोपों से रोकते हैं। उक्त प्रावधानों के अनुसार बीजेपी के जीते हुए विधायक या सांसद अपने अपने क्षेत्रों में राहुल गांधी के इन बयानों पर उनपर एफआईआर कराने का अधिकार रखते है, तथा चुनाव आयोग सख्ती कर दे तो  उनकी कांग्रेस पार्टी की मान्यता भी खतरे में आ सकती हैं। ऐसा हुआ तो परिवारवादी स्लेव्स काफी हल्ला गुल्ला मचाएंगे, लेकिन अभी अपने नेता की बेवकूफियों पर गर्व कर रहे हैं।

राहुल गांधी के झूठे आरोपों और माफी के मानहानि प्रकरण

राहुल गांधी के बयानों ने पहले भी कई बार विधिक विवाद खड़े किए हैं। 2019 में “चौकीदार चोर है” नारे को सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत उद्धरण माना, और राहुल गांधी को 8 मई 2019 को कोर्ट में बिना शर्त माफी माँगनी पड़ी थी । उसी वर्ष “सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों?” ऐसे  गैर जिम्मेदारपूर्ण बयान पर सूरत की अदालत ने उन्हें IPC 500 के तहत दोषी ठहराया और दो वर्ष की सजा सुनाई, जिससे वे सांसद पद से भी अयोग्य हो गए थे । बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2023 में उनकी सजा पर स्थगन दिया। 2018 में भी राहुल गांधी ने केंद्रीय गृहमंत्री श्री अमित शाह पर एक हत्या के मामले में संदिग्ध होने का आरोप भी मानहानि का कारण बना।

RSS पर लगाया था बेतुका आरोप

विदित हो कि 2014 में राहुल गांधी ने कहा कि “RSS के लोग गांधीजी की हत्या के पीछे थे।” इस पर RSS कार्यकर्ता राजेश कुंटे ने मानहानि का मुकदमा दायर किया। Subramanian Swamy v. Union of India (2016)के केस में  में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी संगठन को सामूहिक रूप से दोषी ठहराना मानहानि हो सकता है। गांधी ने बाद में स्पष्ट किया कि उनका इशारा “RSS के कुछ व्यक्तियों” की ओर था। यह मामला अभी भी विचाराधीन है।

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इन मामलों से स्पष्ट है कि श्री राहुल गांधी अभी भी परिपक्व या गम्भीर नेता नही हैं इसलिए बार-बार तथ्यहीन बयान न केवल मानहानि अन्य कानूनों के  उल्लंघन के दायरे में आते हैं, और अपनी पार्टी के लिए लोगों के जनमत को खोते जा रहे हैं ।

न्यायपालिका की भूमिका

न्यायपालिका ने भी बार-बार संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा को रेखांकित किया है। केशवानंद भारती (1973) के केस में कोर्ट ने निष्पक्ष चुनाव को संविधान की मूल संरचना माना। Indira Gandhi v. Raj Narain (1975) के केस में कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा को लोकतंत्र का आधार बताया। Ashok Kumar v. Election Commission (2000) के मामले में कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने वाले बयानों को अस्वीकार्य ठहराया। ये निर्णय संस्थाओं की गरिमा और लोकतंत्र की शुचिता को बनाए रखने के लिए हैं।

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र में आलोचना अपरिहार्य है, किन्तु यह तथ्यों और तर्कों पर आधारित होनी चाहिए। पड़ोसी देशों, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार के अनुभव दर्शाते हैं कि संवैधानिक संस्थाओं पर निराधार अविश्वास राष्ट्र में अस्थिरता और हिंसा को जन्म देता है। भारत में कांग्रेस से जुड़े चुनावी विवाद, विशेष रूप से इंदिरा गांधी और राहुल गांधी के प्रकरण, इस बात को रेखांकित करते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग विधिक और सामाजिक दायित्वों को जन्म देता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और BNS जैसे कानून यह सुनिश्चित करते हैं कि चुनावी शुचिता बनी रहे।

संवैधानिक संस्थाओं पर हमला वस्तुतः संविधान पर हमला है। नेताओं और नागरिकों का दायित्व है कि वे अपनी अभिव्यक्ति को जिम्मेदारी से उपयोग करें, ताकि लोकतंत्र की गरिमा और विश्वास अक्षुण्ण रहे। यह न केवल संस्थाओं की रक्षा का प्रश्न है, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य का सवाल है।

Topics: democracy insultसंवैधानिक संस्थाओं पर हमलाCongress EVM controversyराहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंससंविधान पर हमलाचुनाव आयोग आरोप 2025लोकतंत्र अपमानकांग्रेस EVM विवादRahul Gandhi press conferenceattack on constitutional institutionsattack on Constitutionवोट चोरीElection Commission allegations 2025vote theft
डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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