पाञ्चजन्य द्वारा दिल्ली के द अशोक होटल में 15 सितंबर को एकदिवसीय ‘आधार- Infra Confluence 2025’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के अवधारणा सत्र ‘विकास का दर्शन’ को रा.स्व.संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य मुकुल कानिटकर ने संबोधित किया-
वास्तविकता में जब हम विकास के आधार को समझने का प्रयास करते हैं, तो पाते हैं कि आधुनिक अर्थशास्त्र भी विकास के उद्देश्य की परिभाषा सुख से ही करता है। वास्तव में, अर्थशास्त्र का मूल उद्देश्य मानव को सुखी बनाना है। इसलिए सुख की संकल्पना के बिना विकास पर चर्चा अधूरी रहती है। सामान्यतः सुख की परिभाषा नकारात्मक रूप में की जाती है, यानी अभावों को दूर करने और सुविधाओं को उपलब्ध कराने तक सीमित। यदि विकास को केवल इसी दृष्टिकोण से देखा जाए, जैसा कि पश्चिमी विचारधारा करती है, तो यह सुख की अधूरी संकल्पना होगी। भारत में विकास की जो परिभाषा की गई है, उसे संस्कृत में समुत्कर्ष कहा गया है, अर्थात् सम्यक् उत्कर्ष या संतुलित प्रगति। महाभारत में धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि धर्म वही है जो अभ्युदय (भौतिक प्रगति) और निश्रेयस (आध्यात्मिक प्रगति) दोनों की ओर ले जाए। आज हम जिन बड़े-बड़े पुलों, बांधों और अधोसंरचनाओं को देखते हैं, वे अभ्युदय के ही उदाहरण हैं।
टाटा को विवेकानंद की प्रेरणा
जब 1893 में स्वामी विवेकानंद शिकागो धर्म संसद में गए तो व्याख्यान से एक दिन पहले उन्होंने अपने शिष्य आलासिंगा पेरुमल को एक पत्र लिखा। उसमें उन्होंने लिखा है कि शिकागो में जिस घर में वे ठहरे थे, उसकी छत से पूरे शिकागो शहर का दृश्य देख रहे थे। चारों ओर जगमगाहट, ऊंचे-ऊंचे भवन और उनमें बिजली का उपयोग देखकर वे चकित थे। यह सब देखकर उनके मन में व्यथा उठी और उन्होंने लिखा, ‘मेरा भारत ऐसा कब होगा?’ यह संवेदना यूं ही नहीं थी। उससे पहले वे 6 वर्ष तक कोलकाता से कन्याकुमारी तक पूरे भारत का भ्रमण कर चुके थे। इस यात्रा में उन्होंने भारत की गरीबी, भुखमरी, दुरावस्था और अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए अन्याय और शोषण को करीब से देखा था। इसी पृष्ठभूमि ने उनका मन व्यथित किया और शिकागो की समृद्धि देखकर भारत के भविष्य के लिए उनका प्रश्न और भी गंभीर हो उठा।
इसी कालखंड में जापान से वैंकूवर तक की यात्रा करते समय स्वामी विवेकानंद के साथ उसी जहाज पर जमशेदजी टाटा भी थे। जमशेदजी उस समय जापान से स्टील टेक्नोलॉजी सीखने के उद्देश्य से यात्रा कर रहे थे। जापानी विशेषज्ञों ने उन्हें सलाह दी थी कि भारत में फैक्ट्री लगाने की बजाय जापान में ही इस्पात उत्पादन करें और दुनियाभर में उसे निर्यात करें। कच्चा माल भारत से मंगाइए। यात्रा के दौरान डेक पर हुए संवाद में स्वामी विवेकानंद ने जमशेदजी टाटा को दो महत्वपूर्ण प्रेरणाएं दीं। पहली प्रेरणा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की थी। विवेकानंद ने टाटा से कहा कि यदि स्टील का कारखाना लगाना है, तो भारत में लगाओ; क्योंकि भारत की युवाशक्ति को रोजगार देना तुम्हारा कर्तव्य है। आज भी जमशेदपुर की टाटा स्टील फैक्ट्री के बाहर इस बात का उल्लेख मिलता है कि यह फैक्ट्री स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से स्थापित हुई थी।
दूसरी प्रेरणा विज्ञान और अनुसंधान के लिए संस्थान बनाने की थी। विवेकानंद ने टाटा से कहा कि भारत एक समय में स्टील तकनीक का वैश्विक केंद्र था। ग्रीस और रोम तक से लोग भारत में बनी प्रसिद्ध वूट्ज़ स्टील तलवारें लेने आते थे। 18वीं सदी तक अंग्रेज कलेक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि भारत में कम लागत और कम ऊर्जा खपत में अत्यंत शुद्ध इस्पात बनाने की अनूठी तकनीक मौजूद थी। विवेकानंद ने टाटा को प्रेरित किया कि भारत में विज्ञान और अनुसंधान का एक बड़ा संस्थान स्थापित होना चाहिए। इसी प्रेरणा के फलस्वरूप जमशेदजी टाटा ने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ साइंसेस की स्थापना का संकल्प लिया, जो आगे चलकर भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के रूप में अस्तित्व में आया। आज भी आईआईएससी की इमारत के मुख्य लॉबी में विवेकानंद और जमशेदजी टाटा की तस्वीरें तथा उनका पत्र सुरक्षित है। इस प्रकार, भारत के विकास की दृष्टि केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं रही, बल्कि आत्मनिर्भरता, विज्ञान, संवाद और ज्ञान-विज्ञान की संस्थागत परंपरा को जन्म देने वाली रही है। यही भारत की विश्व को दी गई अनूठी दिशा है।

भारत के प्राचीन राजमार्ग
आज हम बड़े-बड़े पुल, विशाल छह मार्गीय, आठ मार्गीय और बारह मार्गीय राजमार्ग देखते हैं। लेकिन विश्व के ज्ञात इतिहास में लगभग 3000 वर्ष पूर्व यदि किसी देश ने ऐसे राजमार्गों की संकल्पना की थी, तो वह देश भारत था। मोतीचंद्र जी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सार्थवाह’ इसका साक्ष्य है। इसमें उल्लेख है कि भारत में ‘उत्तरापथ’ और ‘दक्षिणापथ’ नाम से दो विशाल हाईवे थे, जिनसे पूरे पूरे विश्व में व्यापार होता था। आज की लड़ाई केवल भू-राजनीति की नहीं, बल्कि नैरेटिव की भी है। इसी नैरेटिव की लड़ाई में चीन ने भारत के ‘उत्तरापथ’ का नाम बदलकर ‘सिल्क रूट’ प्रचारित कर दिया और धीरे-धीरे हमारी इतिहास की पुस्तकों में इसे यही लिखा जाने लगा। सच्चाई यह है कि उस मार्ग से रेशम से अधिक मसालों का व्यापार होता था। इसी कारण मीनाक्षी जैन ने लिखा है, ‘It’s more a Spice Route than a Silk Route.’
भारत का प्राचीन नाम ‘उत्तरापथ’ ही सत्य है। इसी उत्तरापथ से आचार्य चाणक्य तक्षशिला से मगध आए थे। यही मार्ग भारत को संपूर्ण मध्य एशिया से होते हुए भूमध्यसागर तक व्यापार के लिए जोड़ता था। यह उत्तरापथ का महान योगदान था। केवल उत्तरापथ और दक्षिणापथ ही नहीं, बल्कि भारत ने विश्व को जलमार्गीय संचार और समुद्री यात्रा की तकनीक भी प्रदान की है। यही भारत की प्राचीन व्यापारिक और सभ्यतागत शक्ति का प्रमाण है।
कृषि प्रधान देश नहीं भारत
आज नौकायन विज्ञान को अंग्रेजी में ‘नेविगेशन’ कहा जाता है। ग्रीस के संस्कृतविद् निकोलस कजानस ने 2011 में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में अपना शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए बताया था कि नेविगेशन की व्युत्पत्ति संस्कृत के शब्द नाव गति से हुई है।
भारत प्राचीन काल से ही नौकाओं द्वारा व्यापार करता रहा है। यह केवल भारत-विश्व के व्यापार तक ही सीमित नहीं था, बल्कि हमारी सभ्यता और नगर संस्कृति भी नदियों के तट पर विकसित हुई थी। उत्खनन में प्राप्त सिंधु-सरस्वती सभ्यता इसके प्रमाण देती है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगन, राखीगढ़ी, धौलावीरा जैसे विशाल नगर सभी नदीमार्गों पर स्थित थे। प्रारंभिक इतिहासकार मानते थे कि नदियों के किनारे सभ्यता का विकास केवल पानी को कृषि संसाधन के तौर पर उपयोग करने के कारण हुआ। किंतु इसकी वास्तविकता इससे कहीं गहरी है। पानी केवल खेती भर के लिए नहीं था, बल्कि संचार और व्यापार का माध्यम भी था।
भारत को जानबूझकर कृषि प्रधान देश कहकर सीमित कर दिया गया, जबकि भारत सदियों से एक उत्पादक और कारीगरों का देश रहा है। हमारे जहाजों में भरा हुआ सामान दूर-दूर देशों तक बिकने जाता था, पर वह सामान केवल खेती के उत्पाद नहीं थे। दरअसल, भारत में अन्न कभी व्यापारिक वस्तु नहीं रहा। अनाज किसान अपने घर के लिए पैदा करता था, न कि बेचने के लिए। इसकी पुष्टि भारत सरकार की योजनाओं से होती है। 12वीं पंचवर्षीय योजना (2016) की कृषि संबंधी रिपोर्ट बताती है कि भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान केवल 14 से 16 प्रतिशत है।
इसका मुख्य कारण यह है कि कृषि का लगभग 60 प्रतिशत उत्पादन कभी बाजार तक पहुंचता ही नहीं। किसान अपने लिए उत्पादन करता है और बिक्री के लिए केवल नगदी फसलें ही जाती हैं, जैसे-मसाले, कपास, और वस्त्र उद्योग से जुड़े उत्पाद। योजना आयोग के अर्थशास्त्रियों को चिंता थी कि जब तक किसान अपने संपूर्ण उत्पादन को बेचकर फिर बाजार से अन्न वापस नहीं खरीदेगा, तब तक उसकी हिस्सेदारी जीडीपी में नहीं बढ़ेगी। यह सोच वास्तव में ‘अनर्थशास्त्र’ है। भारत में खेती का उद्देश्य केवल बिक्री नहीं, बल्कि स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता रहा है। इसलिए भारत का वास्तविक व्यापार और वैश्विक योगदान सदियों से कृषि उत्पादों से अधिक शिल्प, वस्त्र और मसालों के रूप में रहा है, जिसने भारत को विश्व व्यापार का केंद्र बनाया।

भारत ने वास्को डी गामा को खोजा
पुराणों में वर्णन आता है कि महर्षि अगस्त्य ने एक अंजुली (हथेली) में जल लेकर समुद्र को पी लिया। यही संदर्भ लेकर स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने लंदन में सागर तट पर बैठकर अपनी कविता ‘सागरा प्राण तळमला’ में लिखा है- ‘‘हे सागर, तू मुझे यहां ले आया है, परंतु मातृभूमि तक क्यों नहीं पहुंचा रहा? तेरी शिकायत मैं उसी अगस्त्य से कर दूंगा, जिसने तुम्हें अंजुली में समेट लिया था।’’
वास्तव में अगस्त्य ऋ षि का सागर को अंजुली में पीने का रूपक केवल काव्यात्मक नहीं, बल्कि नौकायन विज्ञान से संबंधित है। वे महान नौकायन वैज्ञानिक थे, जिन्होंने समुद्री यात्रा और नाविक तकनीक को विकसित किया। इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना है। जब वास्को डी गामा अफ्रीका के तट पर भटक कर भारत का मार्ग खोजने में असफल हो गया और निराश होकर लौटने की सोच रहा था, तभी उसकी मुलाकात भारत के एक व्यापारी से हुई। यह विवरण उसने अपनी डायरी ‘The Journal of Vasco da Gama’ में लिखा है (पृष्ठ 146, मूल पुर्तगाली और अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध)।
उस व्यापारी का नाम कांजी मालजी था, जो गुजरात के भरूच का प्रसिद्ध व्यापारी और जहाज निर्माता था। उसकी नौका वास्को डी गामा की नौका से तीन गुना बड़ी और तीन गुना ऊंची थी। वास्को डी गामा के जहाज में केवल एक डेक था, जबकि कांजी मालजी के पास कई मंजिली विशाल नौका थी। वास्को डी गामा लिखता है कि उसकी नौका को यदि यूरोप में चलाना होता तो 40 नाविकों की आवश्यकता पड़ती, लेकिन कांजी मालजी के जहाज को केवल 16 नाविक चला लेते थे। इसका अर्थ था कि भारत की यांत्रिक अभियांत्रिकी और नौका निर्माण तकनीक यूरोप से कई गुना उन्नत थी। यही कांजी मालजी वास्को डी गामा को लेकर भारत आए। इसलिए यह धारणा गलत है कि ‘वास्को डी गामा ने भारत को खोजा।’ सत्य यह है कि भारत ने वास्को डी गामा को खोजा।

सभ्यता-संस्कृति को व्यापारियों ने फैलाया
इस ऐतिहासिक संदर्भ से स्पष्ट है कि भारत का संचार और परिवहन तंत्र सदियों से अत्यंत विकसित रहा है। यही कारण है कि भारत के मार्गों और पथों की परंपरा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत शक्ति का प्रतीक है। आज जब हम ‘राम पथ’ को पर्यटन के रूप में देखते हैं, तो यह केवल धार्मिक मार्ग नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध अवसंरचना परंपरा का भी प्रतीक है।
रामायण में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि रामजी अकेले यात्रा कर रहे हों। वे हमेशा लोगों के साथ ही चलते हैं। मोतीचंद्र जी ‘सार्थवाह’ में लिखते हैं कि प्राचीनकाल में व्यापारियों का एक समूह जब सामूहिक रूप से यात्रा करता था, तो उसे सार्थवाह कहा जाता था। आज हम इसके लिए उर्दू का शब्द कारवां अधिक प्रचलन में देखते हैं। इसी प्रकार चाणक्य की यात्राएं भी सार्थवाहों के साथ हुई थी। इन्हीं व्यापारियों ने भारत की संस्कृति को पूरे विश्व में फैलाया। भारतीय संस्कृति का परचम ब्राह्मणों या ऋषियों ने नहीं, बल्कि व्यापारियों ने विश्वभर में फहराया। इंडोनेशिया, बाली और अंकोरवाट जैसे प्रसिद्ध मंदिर वास्तव में व्यापारियों के प्रयासों से बने। कंबु नामक व्यापारी (इन्हीं से कंबोडिया का नाम पड़ा) तमिलनाडु के तिरुनेलवेल्ली क्षेत्र से कपड़ा लेकर चीन तक जाया करते थे। एक बार जहाज खराब होने के कारण वे एक टापू पर रुक गए। वहां की स्थानीय जनजातियां जहर बुझे तीरों से किसी भी बाहरी व्यक्ति का स्वागत करती थीं। लेकिन जब उन्होंने कंबु को देखा (उसके वस्त्र, उसका तेज, उसका प्रेम और स्नेह) तो वे प्रभावित हुए। कंबु ने उन्हें वस्त्र धारण करने की संस्कृति सिखाई और अंततः वहीं के निवासी उन्हें अपना राजा मानने लगे। आज वही प्रदेश कंबोडिया कहलाता है।
इस प्रकार भारतीय व्यापारियों ने ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता को दूर-दूर तक पहुंचाया। इन्हीं व्यापारियों को भारत में ‘श्रेष्ठि’ कहा जाता था। यही शब्द बाद में अपभ्रंश होकर सेठ जी बना। प्राचीन समय में व्यापारी शोषक नहीं, बल्कि समाज के पोषक माने जाते थे; क्योंकि वे पूरे समाज को संवारने और विकसित करने में योगदान देते थे। आज जिन समुदायों को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा गया है, इतिहास में वे कभी अत्यंत कुशल कारीगर और व्यापारी थे। उन्होंने उत्पादन और व्यापार के बल पर भारत को समृद्ध बनाया। इसी श्रम और कौशल ने भारत को ‘सोने का गरुड़’ बनाया।
अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन ने अपनी पुस्तक ‘Economic History of the World: A Millennial Perspective (2004)’ में लिखा है कि 15वीं शताब्दी तक विश्व की कुल जीडीपी में 46 प्रतिशत योगदान भारत का था। यह योगदान किसी और का नहीं, बल्कि भारत के इन्हीं कारीगरों, उत्पादनकर्ताओं और व्यापारियों का था। दुर्भाग्यवश अंग्रेजों ने भारत की सामाजिक संरचना को तोड़कर इन्हें हाशिए पर पहुंचा दिया।
भारत का विकास दर्शन सदैव अभ्युदय और निश्रेयस के संतुलन पर आधारित रहा। अर्थ और काम की पूर्ति धर्म के आधार पर होती थी। यही कारण है कि भारत में तकनीक और उत्पादन सदैव पर्यावरण अनुकूल रहे। आज पूरा विश्व सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण संरक्षण की बात करता है, विश्व सम्मेलन आयोजित होते हैं। किंतु भारत में यह दृष्टि हजारों वर्ष पूर्व से रही है, क्योंकि यहां अर्थ का आधार सदैव धर्म रहा है।
… तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी
धर्म का शाब्दिक अर्थ है, वह जो प्राणियों को धारण करता है या जिसे अंग्रेजी में ‘सस्टेन’ कहते हैं। इसलिए ‘सस्टेनेबल’ शब्द का मूल अर्थ है जो धारण करने में सक्षम हो, अर्थात् ‘धारणा करने योग्य’ या ‘शाश्वत’। यदि विश्व को सच्चा सुख चाहिए तो धर्माधिष्ठित अर्थव्यवस्था ही उसका मार्ग है। ऐसी अर्थव्यवस्था जिसे हमारी माताएं और दादियां चलाती थीं—बिन बर्बादी की, वस्तुओं का पुनः उपयोग करने वाली, जो वस्तुओं का आदान-प्रदान करती है और व्यर्थ नहीं गवाती। यह धर्माधिष्ठित अर्थव्यवस्था है, जो सदैव सस्टेनेबल होती है। आज विश्व में जिस समय विभिन्न राष्ट्र अपने-अपने हितों के लिए एक-दूसरे पर टैरिफ लगाते हैं, वहीं सबसे समृद्ध देश अमेरिका के सामने भी ऋ ण चुकाने की चुनौती है। अमेरिका की राष्ट्रीय ऋ ण उसकी कुल जीडीपी से कहीं अधिक है। अक्तूबर महीने में उसे 9 खरब डॉलर का कर्ज चुकाना है। अमेरिकी जीडीपी लगभग 29 खरब डॉलर के करीब है, जबकि उसका ऋ ण 36 खरब डॉलर है। अमेरिका का कुल बकाया ऋ ण 101 खरब डॉलर से भी अधिक है। इसी कारण उसकी आर्थिक स्थिति अस्थिर है और इस वित्तीय दबाव के बीच ‘ट्रंप ताऊ जी’ की हालात कमजोर हो रही हैं।
यदि दुनिया के पांच प्रमुख देश डॉलर का प्रयोग करना बंद कर देंगे, तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था डूब जाएगी। बिना किसी बड़े प्रयास के अक्तूबर के पहले सप्ताह में अमेरिका से खबर आ सकती है कि सरकार ने ‘शटडाउन’ कर दिया है। वर्तमान स्थिति में अमेरिका के पास कम से कम एक सप्ताह की सैलरी देने के लिए धन नहीं है और संभव है कि यह अवधि तीन सप्ताह तक भी बढ़ जाए। ये हालात उस अनर्थ व्यवस्था के कारण हैं, जो तथाकथित ‘श्रीमंत देशों’ में व्याप्त है। इस अनर्थ को सुधारने का मार्ग केवल भारत के पास है। यही भारत की शक्ति है। इसलिए भारत को आत्मनिर्भर बनना अत्यंत आवश्यक है।
जब मैं विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में सचिव था और अजीत डोवल जी निदेशक, तब वे कहते थे कि विश्व का सर्वश्रेष्ठ खेल कबड्डी है। क्योंकि कबड्डी शरीर का संपूर्ण विकास करती है-बल, चपलता, स्टैमिना, पावर सभी चाहिए। आलसी व्यक्ति कबड्डी नहीं खेल सकता। यह खेल केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि तितिक्षा और फेफड़ों की क्षमता भी मांगता है। ठीक इसी प्रकार, भारत को जीडीपी के क्षेत्र में भी नंबर वन बनने के लिए आधुनिक तकनीक का विकास करना होगा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि सारी अर्थव्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर का मूल आधार मनुष्य है। आज के सूचना युग में 5जी, 6जी, 8जी, 10जी जैसी तकनीकों के लिए फाइबर ऑप्टिक और साइबर हाईवे चाहिए। परंतु यह सब कुछ सफल तभी होगा, जब उसका आधार एकात्म मानव धर्म और धर्माधिष्ठित अर्थव्यवस्था होगी। यही आधार है जो भारत विश्व को दे सकता है।


















