राजा शंकरशाह ने अंग्रेजों से कहा, "न धर्म बदलेंगे न पेंशन लेंगे,तोप के सामने बांधकर उड़ा दो"
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राजा शंकरशाह ने अंग्रेजों से कहा, “न धर्म बदलेंगे न पेंशन लेंगे,तोप के सामने बांधकर उड़ा दो”

गोंडवाना साम्राज्य के राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को धोखे से पकड़कर 18 सितंबर सन् 1857 को राजद्रोह के आरोप में तोप के गोले से उड़ा दिया गया था।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Sudhir Kumar Pandey
Sep 18, 2025, 09:39 am IST
inभारत
राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह की वीर गाथा आज भी लोकमानस में जीवंत है।

राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह की वीर गाथा आज भी लोकमानस में जीवंत है।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जनजातीय योद्धा सदैव भारी पड़े हैं, इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें छल से मारा है। गोंडवाना साम्राज्य के राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को धोखे से पकड़कर 18 सितंबर सन् 1857 को राजद्रोह के आरोप में तोप के गोले से उड़ा दिया गया था। तत्समय भारत की यह पहली दुखद घटना थी जब किसी राजा और युवराज को तोप के मुंह से बांधकर उड़ाया गया था। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को पेंशन, भूमि और धर्म परिवर्तन के बदले में मुक्त करने का लालच दिया गया लेकिन उन्होंने ‘स्व’ के लिए प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा था कि “न धर्म बदलेंगे न पेंशन लेंगे, तोप के सामने बांधकर उड़ा दो।”

त्रिपुरी (जबलपुर) के महान कलचुरी वंश का तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अवसान हो गया था, फलस्वरूप सीमावर्ती शक्तियां इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लालायित हो रही थी। अंतत: इस संक्रांति काल में एक वीर योद्धा जादों राय(यदु राय) ने तिलवारा घाट निवासी एक महान ब्राह्मण सन्यासी सुरभि पाठक के भगीरथ प्रयास से त्रिपुरी क्षेत्रांतर्गत गढ़ा- कटंगा क्षेत्र जबलपुर में गोंड वंश की नींव रखी। कालांतर में यह साम्राज्य गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया।

राजा चंद्र शाह की 11 वीं पीढ़ी में (चंद्र शाह, मधुकर शाह , प्रेमनारायण, हृदयशाह, छत्रशाह -हरीसिंह, केशरी शाह, नरेंद्र शाह, महाराज सिंह, दुर्जनशाह – निजाम शाह, नरहरि शाह – सुमेर शाह, शंकर शाह) राजा शंकर शाह का जन्म मंडला के किले में हुआ इनके पिता का नाम सुमेर शाह और दादा का नाम निजाम शाह था। 18 वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में आमूलचूल परिवर्तन आया और मराठाओं ने पेशवा के नेतृत्व में मुगलों से गोंडवाना साम्राज्य हस्तगत कर लिया, साथ ही सुमेर शाह मराठों के प्रतिनिधि के रूप में मंडला में राज्य संभालने थे। सन् 1804 में सुमेर शाह की मृत्यु हो गई।

1818 में मराठाओं के हाथ से निकला गोंडवाना साम्राज्य

सन् 1818 में गोंडवाना साम्राज्य मराठाओं के हाथ से निकल गया, अंग्रेजों ने मंडला को अपने अधीन कर लिया और मध्य प्रांत में मिला लिया। इसके उपरांत राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को जबलपुर में गढ़ा पुरवा के पास के 3 गांव की जागीर देकर पेंशन दे दी गई। राजा शंकर शाह अंग्रेजों के इस दुर्व्यवहार के विरुद्ध थे और अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहते थे।

19वीं शताब्दी मध्यान्ह तक अंग्रेजों के अत्याचार और अनाचार चरम सीमा पार कर गए थे तथा डलहौजी की हड़प नीति के बाद भारत में सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी, जिसकी जानकारी राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को भी लग गई थी। जबलपुर स्थित गढ़ा पुरवा में मंडला, सिवनी, नरसिंहपुर,सागर, दमोह सहित मध्य प्रांत के के लगभग सभी रजवाड़े परिवार, जमींदार, मालगुजार के साथ 52 गढ़ों से सेनानी भी मिलने आने लगे थे।

जबलपुर कैंटोनमेंट क्षेत्र से 52वीं नेटिव इन्फेंट्री के सूबेदार बलदेव तिवारी के साथ कई सैनिक राजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथ शाह से मिलने आते थे। राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध शक्तिशाली संगठन तैयार कर लिया था। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने मध्य प्रांत के रजवाडे़ परिवार जमीदारों और माल गुजारों को एकत्रित करने के लिए रोटी और कमल की जगह दो काली चूड़ियों की पुड़िया जिसमें संदेश लिखा होता था कि “अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो या चूड़ियां पहन कर घर बैठो” युक्ति का प्रयोग किया था जो रजवाड़े परिवार, जमींदार और मालगुजार इस पुड़िया को स्वीकार कर लेते थे तो उसका आशय होता था कि वह अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम में शामिल हैं और जो स्वीकार नहीं करते थे तो यह मान लिया जाता था कि वह साथ नहीं है उनको संदेश दिया जाता था कि चूड़ियां पहन कर घर बैठो। इस तरह से मध्य प्रांत में राजा शंकर शाह वह रघुनाथ शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध एक मोर्चा तैयार हो गया था। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तात्या टोपे तथा कुंवर साहब से भी संपर्क था।

मंगल पांडे ने 1857 में किया था स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद

मंगल पांडे ने 29 मार्च सन् 1857 में बैरकपुर छावनी में 34 वीं नेटिव इन्फेंट्री की ओर से सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद कर दिया। कानपुर लखनऊ और दिल्ली से होने वाली भयंकर घटनाओं के समाचार भी राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह तक पहुंचे। राजा शंकर शाह ने 10 सितंबर 1857 को जबलपुर में गढ़ा पुरवा पुरवा में बैठक बुलाई और मध्य प्रांत में स्वतंत्रता संग्राम का श्रीगणेश करने की योजना भी बना ली, जिसमें मध्य प्रांत के अधिकांश रजवाड़े, जमींदार एवं मालगुजार एकत्रित हुए थे।

ब्रिटिश सैन्य छावनी जबलपुर पर आक्रमण की योजना मोहर्रम के अवसर पर थी परंतु कुछ जमीदारों और माल गुजारों के अनुपस्थित होने और उचित समन्वय ना होने के कारण योजना स्थगित कर दी गई। विजयादशमी को आक्रमण करने की योजना बनायी गई।जबलपुर कैंटोनमेंट छावनी से सैनिकों का राजा शंकर शाह और रघुनाथशाह के यहां आना जाना था, इस बात की जानकारी जबलपुर के डिप्टी कमिश्नर क्लार्क को लग गई थी। इसलिए उसने गिरधारी लाल दास के साथ गुप्तचरों को साधुओं के वेश में रहस्य जानने के लिए भेजा। राजा शंकर शाह को लगा कि यह हमारे ही सहयोगी हैं,इसलिए उन्होंने सारी योजना सविस्तार गुप्त चरों को बता दी। गुप्तचरों ने सारा वृतांत 14 सितंबर 1857 को डिप्टी कमिश्नर क्लार्क को सुनाया।

जबलपुर कमिश्नर इरेस्किन से अनुमति लेकर लेफ्टिनेंट क्लार्क ने 20 घुड़सवार सैनिक तथा 60 पैदल सैनिकों के साथ गढ़ा पुरवा में धावा बोला तथा राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को गिरफ्तार कर लिया गया। उनको मिलिट्री केंटोनमेंट में रखा गया परंतु उसी रात को उन्हें छुड़ाने के लिए सूबेदार बलदेव तिवारी ने अपनी 52वीं नेटिव इंन्फेन्ट्री के साथ बलवा किया, इसलिए राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह को कैंटोनमेंट से हटाकर रेसीडेंसी (रेजीडेंसी) में रखा गया। यहां डिप्टी कमिश्नर और दो अंग्रेज अधिकारी का न्याय आयोग बनाया गया।

राजा शंकर शाह पर चलाया राजद्रोह का मामला

राजा शंकरशाह और रघुनाथ शाह पर 3 दिन तक राजद्रोह का आपराधिक मामला चलाया गया और उनकी स्वरचित कविताएँ, जिसमें उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य के सर्वनाश की कामना माँ कालिका से की थी। उस पर गंभीर आपत्ति उठाई गई साथ ही लाल रंग की रेशमी थैली में जो देसी रजवाड़ों जमीदारों और मालगुजारों से पत्र व्यवहार किए थे उनको पढ़ा गया, जिसमें मध्य प्रांत में अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकने की अपील की गई थी। राजा शंकर शाह और कुँवर रघुनाथ शाह ने सारे आरोप स्वीकार कर लिए, तब न्याय आयोग ने संधि प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसकी शर्तें थीं – राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह ईसाई मत स्वीकार स्वीकार करें, उन्हें एक अच्छी पेंशन दी जाएगी और वह विद्रोहियों का पता बता दें, इन शर्तों के मानने के बाद दोनों पिता-पुत्र को माफ कर दिया जाएगा, परंतु राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने यह स्वीकार नहीं किया तब न्याय आयोग ने उन्हें फांसी की सजा सुनाने का निर्णय लिया।

राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह ने कहा कि हम ठग, पिंडारी, चोर, लुटेरे, डाकू हत्यारे नहीं है जो हमें फांसी दी जाए, हम गोंडवाना के राजा हैं, इसलिए हमें तोप के मुंह से बांधकर उड़ाया जाए।

न्याय आयोग ने भी विचार किया कि जनता में दहशत फैलेगी, इसलिए अच्छा है की तोप के मुंह से बांधकर ही उड़ाया जाए। उधर राजा शंकर शाह बुद्धिजीवी थे और वह चाहते थे कि जब सार्वजनिक रूप से उन्हें तोप के गोले से उड़ाया जाएगा तो जन आक्रोश फैलेगा और मध्य प्रांत में भयानक संग्राम होगा।

18 सितंबर 1857 को तोप के मुंह में बांध कर उड़ा दिए गए राजा शंकर शाह

18 सितंबर 1857 को प्रातः 11:00 बजे 33वीं मद्रास नेटिव इन्फेंट्री सहित पांच हजार सैनिकों के घेरे में रेसिडेंसी के सामने राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह को तोप के मुंह पर बांधा गया चारों ओर अपार जनसमूह उमड़ आया था, दोनों पिता और पुत्र शांत चित्त होकर खड़े थे उनके चेहरों में किसी भी प्रकार के भय के लक्षण नहीं थे।

लेफ्टिनेंट क्लार्क के तोप के गोले से उड़ाने के आदेश के पूर्व राजा शंकरशाह ने उस स्व रचित कविता का प्रथम छंद गाया जिसमें अंग्रेजों के सर्वनाश की प्रार्थना की थी और इसी कविता को अंग्रेजों ने अपराध का एक आधार बनाया था। इस कविता का अंग्रेजी अनुवाद जबलपुर के कमिश्नर इरेस्किन ने किया था।

कविता का प्रथम छंद राजा शंकरशाह ने इस प्रकार गाया-

“मूंद मुख डंडिन को चुगलों को चबाई खाई,
खूंद डार दुष्टन को शत्रु संघारिका,
मार अंगरेज रेज पर देई मात चंडी,
बचे नहीं बेरी बाल बच्चे संहारिका,
संकर की रक्षा कर दास प्रतिपाल कर,
दीन की पुकार सुन जाय मात हालिका,
खाय ले म्लेच्छन को झेल नहीं करो मात,
भच्छन कर तत्छन ही बैरिन को घौर मात कालिका। “

दूसरा छंद पुत्र रघुनाथशाह ने और भी उच्च स्वर में सुनाया-

” कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन,
डार मुण्डमाल गरे खड्ग कर धर ले,
सत्य के प्रकाशन औ असुर बिनाशन कौ,
भारत समर माँहि चण्डिके संवर ले,
झुंड – झुंड बैरिन के रुण्ड मुण्ड झारि-झारि,
सोनित की धारन ते खप्पर तू भर ले,
कहै रघुनाथशाह माँ फिरंगिन को काटि-काटि,
किलकि – किलकि माँ कलेऊ खूब कर ले “।…

तदुपरान्त लेफ्टिनेंट क्लार्क ने तोप चलाने का आदेश दिया था, और भयंकर गर्जना के साथ चारों तरफ धुआं भर गया राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह की हाथ – पांव तोप से बंधे रह गए परंतु शेष शरीर के मांस के लोथड़े और हड्डियां 50-50 गज दूर जाकर गिरीं, जिन्हें उनकी वीरांगना पत्नियों क्रमशः फूलकुंवर और मन कुंवर ने एकत्रित किया तथा कुंवर रघुनाथ शाह के पुत्र लक्ष्मण शाह ने अंतिम संस्कार किया।

भारत में तोप से उड़ाए जाने वाले पहले बलिदानी

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भारत के रजवाड़ों में प्रथम बलिदानी, जिन्हें तोप मुंह से बांधकर उड़ाया गया,वो राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ही थे। चार्ल्स बाल ने द हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी में लिखा है कि “राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह को जब तोप के मुंह से बांधा गया था तब भी उनकी आंखों में दया या याचना का भाव तक नहीं था”।

एक चश्मदीद अंग्रेज अफसर के हवाले से द हिस्ट्री ऑव इंडियन इंडियन म्यूटिनी में कहा गया है कि” उनके पैर हाथ जो बांध दिए गए थे, तोप के मुंह के पास पड़े थे और सिर तथा शरीर का ऊपरी भाग सामने की ओर लगभग पचास गज की दूरी पर जा गिरे थे। उनके चेहरों को जरा भी क्षति नहीं पहुंची थी और वे बिल्कुल शांत थे।”

बात यहीं खत्म नहीं हुई क्योंकि राजा शंकर शाह की सहधर्मचारिणी रानी फूलकुंवर ने मंडला में अंग्रेजों से लड़ते हुए अपना स्वयं आत्मोत्सर्ग किया। राजा शंकर शाह और कुँवर रघुनाथ शाह के विचार फलीभूत हुए कि “हमारे इस बलिदान के उपरांत सारे मध्य प्रांत में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छिड़ जाएगा” और वैसा ही हुआ। संपूर्ण मध्य प्रांत के अधिकांश रजवाडे़ परिवार एवं जमींदार और मालगुजारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा दिया। जबलपुर से 52वीं नेटिव इंन्फेन्ट्री के सूबेदार बलदेव तिवारी ने 700 से अधिक सैनिकों को लेकर पाटन और कटंगी को जीत लिया और अंग्रेज कमांडर मैकग्रेगर तथा जेनकिंस का वध करके अपने राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का बदला लिया।

राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है आज भी उनकी बलिदान गाथा पर गीत और लोक गीत गाए जाते हैं।

 

Topics: गोंडवाना साम्राज्यकुंवर रघुनाथ शाह1857 का स्वतंत्रता संग्रामबदिलान दिवसपाञ्चजन्य विशेषराजा शंकर शाह
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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“एक कमरा, एक रसोई और दीवार पर नेशनल अवॉर्ड की तस्वीर… ऐसा था नाना साहेब का घर और जीवन”

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