राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संस्कारशाला है शाखा
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संस्कारशाला है शाखा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य का आधार है शाखा। प्रतिदिन एक घंटे लगने वाली शाखा में स्वयंसेवकों को खेल-खेल में अनुशासन और देशभक्ति का ऐसा पाठ पढ़ाया जाता है कि व्यक्ति के जीवन में आ जाता है निखार। इसे ही कहते हैं व्यक्ति निर्माण

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Sep 18, 2025, 10:57 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100
एक शाखा में खेलते बाल स्वयंसेवक

एक शाखा में खेलते बाल स्वयंसेवक

भोजन, पानी और हवा की तरह खेल भी व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है। बच्चे मुख्यतः शारीरिक प्रधान खेल खेलते हैं। बड़े होने पर उसमें कुछ मानसिक खेल भी जुड़ जाते हैं। विश्व की सभी सभ्यताओं में खेल का महत्व रहा है। प्राचीन नगरों की खुदाई में खिलौने तथा शतरंज, चौपड़ आदि मिलते हैं। बचपन में भगवान श्रीकृष्ण ने तो जानबूझ कर यमुना में गेंद फेंकी और इस बहाने कालिया नामक नाग का नाश कर दिया।

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

सभ्यता एवं सम्पन्नता के विकास के साथ क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबाल… आदि उपकरण आधारित खेल बने। इनका विकास पश्चिम में हुआ। टी.वी. तथा महंगी प्रतियोगिताओं ने इन्हें लोकप्रिय बनाया है। क्रिकेट इसमें सबसे आगे है। फिल्मी कलाकारों की तरह उसके खिलाड़ियों के चेहरे भी बिकते हैं। कम्प्यूटर और मोबाइल ने भी खेलों में क्रान्ति की है। बच्चे हों या बड़े, सब उंगलियां रपटाते हुए अपना समय काटते हैं और आंखें भी खराब करते हैं। अतः इनका उपयोग सीमित होना चाहिए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। उसके काम का आधार एक घंटे की शाखा है। शाखा में यद्यपि योग, आसन, सूर्यनमस्कार जैसे शारीरिक तथा गीत, सुभाषित, अमृत वचन, चर्चा आदि बौद्धिक कार्यक्रम भी होते हैं; पर विद्यार्थी और युवा शाखा में 40-45 मिनट बिना उपकरण वाले खेल ही होते हैं। इनमें कुछ खर्च नहीं होता। अतः गरीब हो या अमीर, सब इन्हें खेल सकते हैं। मैदान पर चूने, पत्थर या फिर चप्पल आदि से ही सीमा रेखा बनाकर ये खेल हो जाते हैं। वस्तुतः ये बहुरंगी खेल ही शाखा के प्राण हैं। इनके आकर्षण में ही बच्चे शाखा में आते हैं। संघ का विचार तो उन्हें बाद में समझ आता है।

शाखा में तरुण, बाल, शिशु आदि अलग-अलग समूह (गण) में खेलते हैं। ये खेल केवल मनोरंजन या व्यायाम के लिए नहीं होते। उनकी विशेषता संस्कार देने की क्षमता भी है। इनसे स्वयंसेवक के मन पर संस्कार पड़ते हैं, जो उसकी वाणी, विचार और व्यवहार में सदा दिखायी देते हैं। इन खेलों का कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं है। ‘हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा’ की तरह क्रिया के मामूली परिवर्तन से नया खेल बन जाता है। ये खेल सैकड़ों हैं तथा हर क्षेत्र में इनके अलग नाम हैं। कुछ खेलों के नाम तथा उनके प्राप्त गुणों की चर्चा करना यहां उचित रहेगा। शाखा में कई खेल दो या अधिक दल बनाकर होते हैं।

कबड्डी, बैठी खो, रस्सा या दंड खींच, बंदी बनाना, घोड़ा कबड्डी, डमरू दौड़, टैंक युद्ध, दीवार तोड़ जैसे खेलों में खिलाड़ी अपनी टीम को जिताने का प्रयास करते हैं। अतः उनमें टीम भावना का विकास होता है। शेर बकरी, परमवीर सेनानी जैसे खेलों में एक खिलाड़ी साहस एवं कुशलता से बाकी 15-20 लोगों के बीच में घुसता और निकलता है। सब उसकी पीठ पर घूंसे लगाते हैं। संगठन की जंजीर, हिन्दू बनाना, स्वर्गारोहण जैसे खेलों से संगठन की भावना मजबूत होती है। गणेश छू, हनुमान की पूंछ, अंधे की लाठी आदि मनोरंजन प्रधान खेल हैं। शक्ति परिचय, मुर्गा युद्ध, हाथी युद्ध, घुड़सवार युद्ध तथा एक टांग की दौड़, उल्टी दौड़, मेंढक दौड़, भालू दौड़, हाथी दौड़, बिच्छू दौड़, हनुमान कूद, गोरैया दौड़, तीन टांग की दौड़.. आदि से स्वयंसेवक की निजी ताकत पता लगती है। संख्या कम होने पर त्रिभुज या छोटा गोला बनाकर यज्ञकुंड, मेरा घर, रक्षक जैसे कई खेल होते हैं।

शिविर आदि में संख्या 100 या इससे भी अधिक होती है। ऐसे में दो समूह बनाकर चक्रव्यूह, कच्छप व्यूह, चतुर्व्यूह आदि बड़े खेल होते हैं। सभी आयु और कद-काठी के लोग मिलकर पिरामिड भी बनाते हैं। शाखा पर 40-45 मिनट में प्रायः 10-12 खेल हो जाते हैं। इसके लिए दक्ष, आरम्, एकशः सम्पत्, गण विभाग आदि आज्ञाओं द्वारा बार-बार रचना बनती एवं बदलती है। इनसे अनुशासन का विकास होता है। खेल में खिलाड़ियों की लम्बाई के आधार पर ही टीमें बनती हैं। हर जाति, आयु और वर्ग के खिलाड़ी साथ मिलकर दूसरी टीम से संघर्ष करते हैं। इससे स्वयंसेवक के मन में समरसता का भाव पैदा होता है। खेल समाप्ति पर ‘कौन जीता, संघ जीता’ के उद्घोष से प्रतिद्वंद्विता का मनो-मानिल्य मिट जाता है।

देशभर में 83,139 शाखाएं

मार्च, 2025 में बेंगलुरु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा में सह सरकार्यवाह श्री सी.आर. मुकुंद ने बताया था कि देशभर में एक करोड़ से अधिक स्वयंसेवक हैं और इनमें से करीब 6 लाख प्रतिदिन शाखा जाते हैं। इसके अतिरिक्त भी कई स्वयंसेवक विविध क्षेत्रों में संघ प्रेरित संगठनों में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया था कि वर्तमान में देश भर के 73,646 स्थानों पर संघ की गतिविधियां चल रही हैं। इनमें से 51,710 स्थान पर दैनिक गतिविधियां और 21,936 स्थान पर साप्ताहिक गतिविधियां चल रही हैं। 83,139 शाखाएं देश भर में चल रही हैं। पिछले साल के मुकाबले लगभग 10 हजार शाखाएं बढ़ी हैं। पिछले तीन वर्ष में संघ ने ग्रामीण क्षेत्र में विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया है। कुल 58,981 ग्रामीण मंडलों में से 30,770 स्थानों पर शाखाएं लग रही हैं और पिछले साल के मुकाबले इसमें 3 हजार की वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि सरसंघचालक के आह्वान पर दो साल का समय देने वाले 2,453 लोगों ने अपना घर छोड़ा है।

ताली बजाकर मस्ती में उत्साहवर्धक गीत गाने से पसीने के साथ ही थकान भी दूर हो जाती है। इससे उत्साह एवं आनंद का वातावरण बन जाता है। वर्षा या ठंड में कमरे में बैठकर या भागदौड़ के खेलों से थककर बौद्धिक खेल होते हैं। इनसे मनोरंजन के साथ बुद्धि का विकास भी होता है। अंत्याक्षरी, सूचना, मुक्ताक्षरी, प्रश्नोत्तरी, उल्टी गिनती, खाएंगे, चिड़िया उड़, काला सफेद, ऐसा करो वैसा करो, नेता की खोज, डाकघर, मछली की आंख.. आदि ऐसे ही खेल हैं। खेलों के बीच में स्थानीय भाषा-बोली में कई तरह के नारे और उद्घोष बोले जाते हैं। इनसे देशभक्ति, हिन्दुत्व प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता आदि विचार मन में दृढ़ होते हैं।

‘भारत माता की-जय’, ‘वन्दे-मातरम्’, ‘हर हर-बम बम’, ‘रुद्र देवता-जय जय काली’, ‘जय शिवाजी-जय भवानी’, ‘अलग है भाषा, अलग है वेश-फिर भी अपना एक देश’, ‘जय हो-विजय हो’, ‘संगठन में-शक्ति है’, ‘संघे शक्ति-कलौयुगे’, ‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी-वो कश्मीर हमारा है; जो कश्मीर हमारा है-वो सारे का सारा है’, ‘हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, छुआछूत को-नहीं सहेंगे’, ‘हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, भेदभाव को-दूर करेंगे’, ‘हिन्दू हिन्दू-भाई भाई’’ ‘एक दो तीन चार-भारत मां की जय जयकार’, ‘अन्न जहां का हमने खाया, वस्त्र जहां के हमने पहने, उसकी रक्षा कौन करेगा-हम करेंगे हम करेंगे’ आदि…। शाखा पर खेल होते हैं; पर वह खेल क्लब नहीं है। इसलिए वहां से बड़े खिलाड़ी तो नहीं; पर देश के प्रति समर्पित नागरिक जरूर निर्माण हो रहे हैं। संघ का उद्देश्य भी तो यही है।

Topics: RSS chief Mohan Bhagwatशताब्दी वर्षRSS 100 Yearsविजय कुमार100 years of RSS100 years of sangh yatrarss vision for future100 वर्ष की संघ यात्राराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघशाखा में स्वयंसेवकSarsanghchalak Mohan BhagwatRSS की स्थापना 1925पाञ्चजन्य विशेष
विजय कुमार
विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ [Read more]
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