रिपब्लिकन नेता वैलेंटीना ने यूरोप/अमेरिका में मजहबी 'शरणार्थियों' को बताया 'सबसे बड़ा खतरा', कई देशों में हालात बेकाबू
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रिपब्लिकन नेता वैलेंटीना ने यूरोप/अमेरिका में मजहबी ‘शरणार्थियों’ को बताया ‘सबसे बड़ा खतरा’, कई देशों में हालात बेकाबू

वैलेंटीना गोमेज ने खुलकर कहा कि इस्लामवादी घुसपैठिए 'सबसे बड़ा खतरा' हैं और उन्हें वापस उनके मुस्लिम देशों में भेजा जाना चाहिए। यूरोप में मुसलमान आबादी बेकाबू होती जा रही है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 17, 2025, 12:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
अमेरिकी रिपब्लिकन नेता वैलेंटीना गोमेज

अमेरिकी रिपब्लिकन नेता वैलेंटीना गोमेज

ब्रिटेन में गत दिनों लंदन के मध्य में लाखों लोगों ने ‘शरणार्थी निकालो’ रैली में भाग लिया था। उस जनसागर की तस्वीरें हर अखबार, चैनल में दिखाई दी थीं। लेकिन अधिकांश मीडिया ने इस बात को खुलकर नहीं छापा कि अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी की बेबाक नेता और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोर समर्थक वैलेंटीना गोमेज भी उस रैली में पहुंची थीं। रैली को संबोधित​ करते हुए उन्होंने इस्लामवादी घुसपैठियों के विरुद्ध खुलकर बोला। इस बारे में एक्स पर अपनी पोस्ट में गोमेज ने लिखा कि हम अमेरिका और यूरोप से इस्लाम को हटाकर दम लेंगे। ब्रिटेन के दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट कहे जाने वाले टॉमी रॉबिन्सन की अगुआई में निकली उस विशाल रैली में भी गोमेज ने आह्वान किया था कि कट्टर इस्लामवादी देशों से यहां आकर बसे ये घुसपैठिए ब्रिटेन ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप और अमेरिका के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं। ब्रिटेन के लिए तो ये सिरदर्द बन चुके हैं। ये वही वैलेंटीनी गोमेज हैं जिन्होंने कुरान को लेकर भी बेबाक बयान दिए थे और एक विवादित हुआ वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था।

गोमेज आखिर इस्लामवादियों या मुस्लिम घुसपैठियों को खतरा क्यों मानती हैं? इसे समझने के लिए यूरोप, विशेषकर जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, डेनमार्क जैसे देशों से लगातार आ रहीं उपद्रवों की तस्वीरें देखिए। हर जगह आगजनी और लूटपाट के दृश्य पैदा करने वालों में इसलामी देशों से वहां ‘शरण’ पाए इस्लामी तत्व शामिल दिखते हैं। सेकुलर मीडिया या प्रशासन में बैठे ऐसे लोग इन घटनाओं का सच के आधार पर विश्लेषण न करके नस्लविरोधी ठहरा देते हैं और स्थान विशेष के असल नागरिकों को ही सजा का पात्र ठहरा देते हैं।

आज यूरोप में मुस्लिम आबादी कितनी है और भविष्य में यह कहां तक जा पहुंचेगी, इसे प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़ों से समझा जा सकता है। इस संस्था के अध्ययन के अनुसार, 2016 में यूरोप के लगभग 30 देशों में मुस्लिम आबादी लगभग 4.9 प्रतिशत थी, यानी करीब 25.8 मिलियन लोग। प्रवासन की दर 2014‑16 के दौरान बढ़ती दिखी थी, विशेष रूप से सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और अन्य युद्ध अथवा संघर्षग्रस्त देशों से ‘शरणार्थी’ तेजी से यूरोप के कई देशों में आ बसे थे।

एक्स पर अपनी पोस्ट में गोमेज ने लिखा कि हम अमेरिका और यूरोप से इस्लाम को हटाकर दम लेंगे (File Photo)

जहां आबादी स्थिर रहा करती थी उन हिस्सों में भी जनसंख्या वृद्धि होती है क्योंकि मुस्लिम आबादी तुलनात्मक रूप से युवा है और प्रजनन दर गैर-मुस्लिम आबादी की तुलना में अधिक देखने में आई है, जो कि समय के साथ प्रतिशत के बढ़ते जाने का मुख्य पहलू है।

अगर घुसपैठ बंद भी हो जाए तब भी उन देशों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा, क्योंकि कथित एजेंडे के तहत प्रजनन दर कहीं ज्यादा है। उदाहरण के लिए, 2050 तक यूरोप में मुस्लिम आबादी 4.9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 7.4 प्रतिशत हो सकती है। जिन देशों में ‘शरणार्थियों’ का आना अपेक्षाकृत कम है वहां भी अनुमान है कि मुस्लिम आबादी 11.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। बहुत अधिक घुसपैठ हुई तो यह आंकड़ा इसी कालखंड के बीच 14 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

2024 के कुछ आंकड़े बताते थे कि ‘अनियमित’ रूप से सीमा पार कर घुसपैठ करने वालों की संख्या में कमी आई है। फ्रंटेक्स नाम की एजेंसी ने बताया कि 2024 में यूरोपीय संघ से जुड़े देशों में अनियमित घुसपैठ में कुल मिलाकर लगभग सीमा पार करने की 239,000 घटनाएं हुई थी।

रिपब्लिकन नेता गोमेज मुस्लिम प्रवासी नहीं उन्हें सीध ‘घुसपैठिये’ कहती हैं। वे मानती हैं कि ये ‘शरणार्थी’ का दर्जा पाने लायक नहीं होते। स्थानीय मूल नागरिकों में इनकी वजह से भी भय, अविश्वास और अपनी संस्कृति/सांस्कृतिक पहचान को खोने देना का डर बढ़ता जा रहा है। उग्रपंथी घुसपैठिए नागरिकों के हक छीन रहे हैं, उन्हें लूट रहे हैं, सरेआम हत्या तक कर दे रहे हैं। वे सामाजिक और आर्थिक बोझ बन चुके हैं।

स्थानीय मूल नागरिकों में इनकी वजह से भी भय, अविश्वास और अपनी संस्कृति/सांस्कृतिक पहचान को खोने देना का डर बढ़ता जा रहा है (File Photo)

कुछ स्थानों पर तो आर्थिक या सामाजिक माहौल में जबरदस्त गिरावट दर्ज की जा रही है। ब्रिटेन के अनेक शहर आज ऐसे तत्वों के लिए मनमानी करने के पसंदीदा ठिकाने बन गए हैं। सड़कें रोककर नमाज पढ़ना, सार्वजनिक स्थानों पर नमाज के बहाने जनजीवन अस्तव्यस्त करना वे अपना ‘मजहबी फर्ज’ समझते हैं। शिक्षा, रोजगार, सामाजिकता, आवास जैसे क्षेत्रों में विकट समस्याएं खड़ी हुई हैं।

हालांकि यह भी सच है कि यूरोप के ही कई नेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए इन घुसपैठियों का पक्ष लेते हैं और दारूल उलूम के उनके एजेंडे को हवा देते हैं। इस्लामाफोबिया को खुलेआम नकारते हैं और इसे ‘नस्लविरोधी’ ठहराते हैं। सेकुलर मीडिया एवं कई सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर उन घुसपैठियों के कट्टर विचारों ​को तेजी से हवा देते हैं।

वैश्विक शरणार्थी संकट पैदा करने वालों में मुख्य रूप से सीरिया, अफगानिस्तान, इराक आदि से आने वाले घुसपैठिए सबसे आगे हैं। उनका लगातार आना यूरोप के लिए एक बड़ी चुनौती है। वहां के देशों में यदि मुस्लिम आबादी ऐसे ही बढ़ती गई तो ये चुनौत्ी विकराल रूप ले लेगी और तब तक शायद देर हो चुकी होगी।

गोमेज ने खुलकर कहा कि इस्लामवादी घुसपैठिए ‘सबसे बड़ा खतरा’ हैं और उन्हें वापस उनके मुस्लिम देशों में भेजा जाना चाहिए। यूरोप में मुसलमान आबादी बेकाबू होती जा रही है। वहां प्रवासन नीतियों, नागरिक अधिकारों और सामाजिक सामंजस्य की नीतियों की समीक्षा कर उन्हें और मजबूत करने की मांग उठ रही है।

यूएनएचसीआर के अनुसार, यूरोप में 2024 के अंत तक लगभग 12 लाख शरणार्थी रह रहे हैं। ये मुस्लिम देशों से ही आए हैं। यूरोनेज संस्था ने एक तथ्य-जांच रिपोर्ट में बताया है कि ‘शरणार्थियों’ के मजहब का पता ऐसे लगता है जैसे किसी देश ने बताया कि 2013‑19 के बीच वहां 69.7 प्रतिशत मुस्लिम शरणार्थी रह रहे थे। निश्चित ही आज उन ‘शरणार्थियों’ की संख्या बढ़ चुकी होगी।

Topics: मुस्लिमअमेरिकाAmericaयूरोपशरणार्थीMuslims in EuropeIllegal Immigrationवैलेंटीना गोमेजlondon rallyvalentina gomez
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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