महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से लगभग 100 किलोमीटर दूर नेरल के पास बन रहा ‘सुकून एंपायर’ हाउसिंग प्रोजेक्ट, पिछले दिनों एक विवाद का विषय बनकर उभरा। दरअसल इस प्रोजेक्ट का एक प्रचार वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें इस प्रोजेक्ट को ‘हलाल लाइफस्टाइल टाउनशिप’ के रूप में पेश किया गया है। इसे विशेष तौर पर ‘मुस्लिम समुदाय के लिए’ बताया गया। वीडियो में दावा किया गया है कि यहां परिवार अपने मजहबी तौर-तरीकों से समझौता किए बिना रह सकते हैं और बच्चे हलाल माहौल में बड़े होंगे। इस पूरे प्रकरण ने सोशल मीडिया, राजनीतिक गलियारों और बौद्धिक समाज में हलचल मचा दी। शिवसेना (शिंदे गुट) नेता संजय निरुपम ने इसे ‘हाउसिंग जिहाद’ करार दिया है।

सदस्य राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
एनसीपी (शरद पवार गुट) के रोहित पवार ने कहा, ‘यह देश हर समुदाय का है। मजहब के आधार पर विज्ञापन देना संविधान का उल्लंघन है, इसे रोका जाना चाहिए।’ भाजपा विधायक अतुल भातखलकर ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर ऐसे विज्ञापनों पर तत्काल रोक लगाने और कड़ी कार्रवाई की मांग की। उन्होंने इसे समाज में वैमनस्य और ‘जमीन जिहाद’ को बढ़ावा देने वाला बताया। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (एनएचआरसी) ने इस मामले का गंभीर संज्ञान लिया और महाराष्ट्र सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा है। एनएचआरसी का मानना है कि इस तरह की मार्केटिंग न केवल मानवाधिकारों के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि यह रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट (रेरा) का भी उल्लंघन है।
सामंजस्य बनाम अलगाव की प्रवृत्ति
भारत में सदा से ही सांप्रदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक सामंजस्य की परंपरा रही है। यहां विभिन्न मत-पंथ के मानने वालों ने एक-दूसरे की आस्थाओं को स्वीकार करते हुए सहअस्तित्व का मार्ग चुना है, लेकिन जब एक वर्ग अपने लिए अलग-थलग बस्तियां बनाता है और उन्हें मजहबी पहचान पर आधारित करता है, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है। इतिहास इसका साक्षी है कि जब भी भारत में इस्लामिक आक्रांताओं ने अपनी सभ्यता और संस्कृति थोपने की कोशिश की, तब उसका परिणाम संघर्ष, हिंसा और रक्तपात के रूप में सामने आया। आठ सौ वर्षों तक चले इस संघर्ष ने भारत की आत्मा को आहत किया।
विभाजन भी इसी सांस्कृतिक टकराव का चरम परिणाम था। बावजूद इसके, बहुसंख्यक हिंदुओं ने मुसलमानों को उनके रीति-रिवाजों सहित स्वीकार किया। स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की जड़ें और गहरी हुईं और सह-अस्तित्व की यह परंपरा और मजबूत हुई। ऐसे में ‘हलाल हाउसिंग सोसाइटी’ का विचार भारत की इस साझा संस्कृति के लिए घातक है। यह प्रयास एक ऐसा माहौल बनाने का है, जिसमें केवल मुसलमान रहें, केवल उसी परिवेश में पलें-बढ़ें और केवल उसी दृष्टिकोण से समाज को देखें।
बचपन से अलगाव की मानसिकता
यदि मुसलमान बच्चों को केवल मुसलमानों के बच्चों के साथ खेलने, केवल इस्लामिक स्कूलों में पढ़ने और केवल अपने ही समुदाय के परिवारों से संपर्क में रहने की आदत डाली जाएगी, तो सहिष्णुता और समझदारी कहां से विकसित होगी? जब ये बच्चे बड़े होकर सामाजिक जीवन में उतरेंगे तो वे दूसरे समुदायों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।
परिणामस्वरूप तनाव, अविश्वास और दूरी पनपेगी। यह स्थिति न केवल सामाजिक असंतुलन को जन्म देगी, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी घातक होगी। इस तरह की परियोजनाएं केवल मजहबी जीवनशैली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे गहरे राजनीतिक उद्देश्य छिपे हैं। मुस्लिम आबादी को अलग-थलग रखकर उन्हें एक ठोस वोट बैंक में बदलना ही ऐसी योजनाओं का वास्तविक लक्ष्य होता है। यह आबादी का नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटों को एकमुश्त करने का प्रयास है।
हलाल की राजनीति
आज ‘हलाल अर्थव्यवस्था’ और ‘हलाल राजनीति’ की चर्चा के बीच ‘हलाल टाउनशिप’ एक और चिंताजनक कदम है। सब जानते हैं कि 1947 में भारत का विभाजन हुआ। लाखों लोग मारे गए। यदि आज फिर उसी आधार पर अलग-थलग टाउनशिप बनाई जाएंगी, तो कल को महाराष्ट्र में भी कोई अलग ‘इस्लामिक जोन’ की मांग कर सकता है। क्या हम इतिहास से कोई सीख नहीं ले रहे हैं?

भारत के संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि किसी भी नागरिक के साथ उसके मत और पंथ के आधार पर भेदभाव न किया जाए। समाज में सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे। ऐसे में मजहबी आधार पर विशेष टाउनशिप बनाना सीधे-सीधे संविधान की भावना का उल्लंघन नहीं तो और क्या है। मानवाधिकारों का सीधा अर्थ यही है कि नागरिक अपने अधिकारों का उपभोग करते हुए संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करें। जब किसी समुदाय को मजहबी आधार पर अलग प्रावधान दिए जाते हैं, तो यह मानवाधिकारों की संकल्पना को ही कमजोर करता है।
सोशल मीडिया की भूमिका
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि देश की बहुसंख्य आबादी इस पूरे मामले से अनभिज्ञ थी। ‘हलाल टाउनशिप’ जैसा गंभीर मामला चल रहा था, लेकिन किसी को इसकी खबर तक नहीं थी। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे के उठने से पहले गूगल पर ‘हलाल टाउनशिप’ शब्द को लगभग खोजा ही नहीं गया था। लेकिन जैसे ही यह मामला सामने आया, 5 और 6 सितंबर को हर घंटे साढ़े चार हजार बार तक इस ‘कीवर्ड’ को सर्च किया गया। यह न केवल सोशल मीडिया की ताकत को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जनमानस अब खतरे की आहट को पहचान रहा है। जनता का स्वतः जाग्रत होना इस बात का प्रमाण है कि समाज अब सजग है।
वस्तुत: ‘हलाल टाउनशिप’ जैसी अवधारणाएं भारत की एकात्म परंपरा के लिए गंभीर खतरा हैं। यह प्रवृत्ति न केवल सामाजिक असंतुलन को जन्म देती है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी देश को विखंडित करने की साजिश करती है।
भारत का भविष्य केवल तभी सुरक्षित है जब हम सांप्रदायिक सौहार्द और सहअस्तित्व की परंपरा को मजबूत करें। ऐसे में मजहबी टाउनशिप जैसी विभाजनकारी प्रवृत्तियों को समय रहते रोके जाने की जरूरत है।
















