पराधीनता के दौर में शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के परिणामस्वरूप भारतीय समाज को जातियों में बांटकर आपसी वैमनस्य बढ़ाया गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हिंदू समुदाय के भीतर गहरी सामाजिक विषमता पैदा हुई और अनेक समुदाय अत्यंत पिछड़ेपन का शिकार हो गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान-निर्माताओं ने इस ऐतिहासिक वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सामाजिक न्याय और समान अवसर को सर्वोच्च महत्व दिया।

सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में सूचीबद्ध किया गया और उनके क्रमिक सशक्तिकरण के लिए विशेष प्रावधान किए गए। सरकारी सेवाओं और शिक्षा-संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य इन्हीं वर्गों की राजनीतिक-सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करना और उन्हें सशक्त बनाना था। लेकिन अजा-अजजा और ओबीसी का कोटा खाने वाले ‘कन्वर्टेड’ लोग अब उन्हें संविधान प्रदत्त विशेषाधिकारों का भी लाभ उठाने की कोशिश में जुटे हैं। इस पर न्यायालय के दो निर्णय ऐतिहासिक हैं।
पहला, हाल ही में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का कोई व्यक्ति कन्वर्ट हो जाता है, तो उसका एससी-एसटी का दर्जा खत्म हो जाता है। ऐसे में वह एससी-एसटी अधिनियम के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता है। यह धोखाधड़ी और अधिकारों का दुरुपयोग है।
दूसरा मामला कन्वर्जन के बाद नौकरी में आरक्षण से जुड़ा है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि बिना आस्था के केवल आरक्षण के लिए किया गया कन्वर्जन संविधान के साथ धोखाधड़ी है। इससे पहले, 1992 में इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ एवं अन्य के ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था एससी-एसटी वर्गों के लिए की गई है। यह व्यवस्था केवल आर्थिक पिछड़ेपन से नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्करण और उत्पीड़न की वास्तविकता से भी जुड़ी है।
केंद्र सरकार ने भी 2022 में एक हलफनामा दाखिल कर कहा था कि ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वे कन्वर्ट ही इसीलिए होते हैं ताकि उन्हें अस्पृश्यता का सामना न करना पड़े। वैसे भी इस्लाम और ईसाइयत जब जाति व्यवस्था को मानते ही नहीं, तो कन्वर्टेड लोगों के लिए एससी-एसटी/ओबीसी एक्ट का कोई मतलब ही नहीं रह जाता।

एससी-एसटी की परिभाषा
आरक्षण का लाभ वास्तविक हकदारों को मिले, इसके लिए अनुच्छेद-366 में एससी-एसटी की परिभाषा तय की गई है। संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के अनुसार, राष्ट्रपति किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में वहां के राज्यपाल से परामर्श के बाद सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा यह घोषित करते हैं कि कौन-सी जातियां, जनजातियां, नस्लें या उनके उप-समूह उस राज्य में अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति माने जाएंगे। इसके अतिरिक्त, संसद को यह अधिकार है कि वह विधि द्वारा एससी-एसटी की सूची में बदलाव कर सके। यानी, किसी जाति, मूलवंश या जनजाति या उसके उपसमूह को सूची में शामिल करना या हटाना संसद के विधिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
कन्वर्जन और आरक्षण
कन्वर्जन कराने वालों के निशाने पर समाज का पिछड़ा और वंचित वर्ग अधिक रहता है। उन्हें यह लालच दिया जाता है कि कन्वर्जन के बाद भी उन्हें आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा। किंतु अनुसूचित समुदाय इस प्रवृत्ति को अपने संवैधानिक अधिकारों पर अतिक्रमण मानते हैं और इसका लगातार विरोध करते रहे हैं। फिर भी, हाल के वर्षों में ऐसे मामलों के बढ़ने से यह प्रश्न गंभीरता से उठने लगा है कि यदि कोई व्यक्ति कन्वर्जन कर इस्लाम या ईसाइयत अपना लेता है, तो क्या वह अब भी एससी, एसटी या ओबीसी की भांति आरक्षण का हकदार होना चाहिए?
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश-1950 में स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य मत-मजहब को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। इसके पीछे कानूनी तर्क है कि जाति व्यवस्था हिंदू सामाजिक व्यवस्था का एक हिस्सा है और ईसाई मत आधिकारिक तौर पर जाति को मान्यता नहीं देता है। सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों ने निर्णय दिया है कि ईसाई मत में कन्वर्ट होने पर व्यक्ति की जातिगत पहचान ‘विलुप्त’ या ‘समाप्त’ हो जाती है। न्यायालयों ने यह भी कहा है कि केवल आरक्षण लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से कन्वर्जन करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

न्यायालय के निर्णय
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का हाल का निर्णय गुंटूर जिले के अक्कला रामी रेड्डी से जुड़े मामले में आया। रेड्डी पर हिंदू से ईसाई बने चिंतादा ने जातिसूचक गालियां देने का आरोप लगाया था। चिंतादा की शिकायत पर पुलिस ने एससी/एसटी विशेष अदालत में आरोपपत्र दायर किया, जिसके खिलाफ रेड्डी ने उच्च न्यायालय में कार्यवाही रद्द करने की याचिका लगाई। सुनवाई के बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ईसाई मत अपनाने के बाद कोई व्यक्ति स्वयं को एससी/ओबीसी बताकर इन वर्गों के लिए आरक्षित लाभ नहीं ले सकता। चूंकि चिंतादा ने स्वयं स्वीकार किया कि वह पिछले दस वर्ष से ईसाइयत का पालन कर रहा है अतः पुलिस को इस मामले में एससी/एसटी अधिनियम लागू नहीं करना चाहिए था। न्यायालय ने इसे अधिनियम का दुरुपयोग बताया।
न्यायालय ने एससी-एसटी अधिनियम के वैधानिक ढांचे का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका संरक्षण संविधान के अनुच्छेद 366 के अंतर्गत परिभाषित अनुसूचित जातियों और जनजातियों तक ही सीमित है। रिकॉर्ड और गवाहों से यह साबित हुआ कि चिंतादा न केवल ईसाई मत का अनुयायी है, बल्कि पादरी के रूप में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। उसने ‘पास्टर फेलोशिप’ के कोषाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया, जो केवल ईसाई समुदाय से जुड़ा पद है।
इसी तरह, 26 नवंबर, 2024 को सी. सेल्वरानी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि कोई व्यक्ति किसी अन्य मत-मजहब को तभी अपनाता है, जब वह उसके सिद्धांतों, पांथिक व आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित होता है। दरअसल, याचिकाकर्ता सी. सेल्वरानी के पिता वल्लुवन जाति से थे, जो अनुसूचित जाति में शामिल है। लेकिन वे कन्वर्ट होकर ईसाई बन गए और सेल्वीरानी भी उसी का पालन करती रही। लेकिन जब नौकरी में आरक्षण पाने की बारी आई तो सेल्वीरानी ने खुद को हिंदू बताते हुए अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र की मांग की।
मद्रास उच्च न्यायालय ने इस मांग को खारिज कर दिया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी सही ठहराया। साथ ही, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ईसाइयत में कन्वर्ट होने के बाद व्यक्ति की जातिगत पहचान समाप्त मानी जाएगी। यदि कोई व्यक्ति पुन: अनुसूचित जाति के लाभ का दावा करना चाहता है, तो उसे न केवल हिंदू धर्म में पुनः स्वीकार करना होगा, बल्कि अपनी मूल जाति द्वारा स्वीकार किए जाने का ठोस प्रमाण भी प्रस्तुत करना होगा। कन्वर्जन का उद्देश्य सिर्फ आरक्षण या अन्य लाभ प्राप्त करना नहीं हो सकता। यदि यह बिना वास्तविक आस्था के किया जाता है, तो यह संविधान के साथ धोखाधड़ी मानी जाएगी।
वंचित वर्ग और सामाजिक न्याय
कानूनी प्रावधानों और न्यायालयों के स्पष्ट निर्णयों के बावजूद यदि कोई व्यक्ति कन्वर्जन के बाद भी पूर्व श्रेणी का लाभ उठाता है, तो इसका सीधा असर वास्तविक रूप से वंचित वर्गों पर पड़ता है। शिक्षा और रोजगार में अवसरों की कमी से जूझ रहे इन वर्गों के अधिकार छिन जाते हैं और सामाजिक न्याय की पूरी अवधारणा कमजोर हो जाती है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब कन्वर्जन से नए अवसर प्राप्त करने के बावजूद पुराने अधिकारों का दुरुपयोग किया जाता है। ऐसा करना न केवल संविधान की मर्यादा, बल्कि न्याय की मूल भावना से भी खिलवाड़ है।
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का ताजा फैसला इस दिशा में एक स्पष्ट कानूनी संदेश अवश्य देता है, लेकिन यह विषय केवल न्यायिक व्याख्या तक सीमित नहीं है। यह नीति-निर्माण और राजनीति, दोनों दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और व्यापक प्रभाव डालने वाला मुद्दा है। आज भी अनेक ईसाई और मुसलमान अपनी जातिगत पहचान (जैसे ‘मेहतर ईसाई’, ‘दलित मुस्लिम’) का हवाला देकर आरक्षण की मांग करते हैं, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय तथा आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णयों को न्यायपालिका की संवेदनशील हस्तक्षेप और सक्रियता के रूप में देखा जाना चाहिए, जो संविधान के मूल उद्देश्य -वास्तविक वंचितों तक न्याय और अवसर पहुंचाना- को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


















