बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित तथाकथित मतदाता अधिकार यात्रा 1 सितंबर को पटना में समाप्त हुई। 17 अगस्त से शुरू हुई यह यात्रा बिहार के 20 जिलों और 60 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरी। 1300 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद इस यात्रा का समापन हुआ। राहुल गांधी की बिहार यात्राएं कोई नई बात नहीं हैं, किंतु इस बार की यात्रा ने कांग्रेस और राजद का वास्तविक चेहरा उजागर कर दिया।
यात्रा के दौरान जिस तरह के झूठे आरोप लगाए गए और जिस प्रकार अभद्र भाषा का प्रयोग हुआ, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि सत्ता की लालसा में राहुल गांधी और उनके साथी दल कितनी गिरावट तक जा सकते हैं। 28 अगस्त को दरभंगा जिले में राहुल गांधी का काफिला पहुंचा। जाले विधानसभा क्षेत्र के सिमरी में कांग्रेस टिकट के दावेदार मोहम्मद नौशाद की ओर से स्वागत मंच तैयार किया गया था।
दोपहर लगभग एक बजे इस मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वर्गीय माताजी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया गया। हालांकि पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए भोपुरा गांव निवासी आरोपी मो. रिजवी उर्फ राजा को गिरफ्तार कर लिया। किंतु उसके द्वारा आपत्तिजनक शब्द बोले जाने का वीडियो वायरल हो चुका था। एनडीए कार्यकर्ताओं ने इसे मुद्दा बनाकर सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह कोई अकेली घटना नहीं थी। कई स्थानों पर प्रधानमंत्री को भद्दी गालियां दी गईं और गाली देने वाले लोग कांग्रेस-राजद के झंडे तले ही खड़े थे।
प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश यात्रा से लौटकर इस घटना पर कहा कि 55 वर्ष की सामाजिक-राजनीतिक यात्रा में उनकी माताजी का योगदान अविस्मरणीय रहा। उनकी माता ने उन्हें परिवारिक बंधनों से मुक्त कर मां भारती की सेवा के लिए समर्पित किया। 100 वर्ष की आयु पूरी कर सिधारी उस मां की तपस्या का अपमान केवल नरेंद्र मोदी का अपमान नहीं, बल्कि इस देश की करोड़ों माताओं का अपमान है। भारतीय संस्कृति में मां का स्थान देवी से भी ऊंचा माना जाता है, क्योंकि मां के बिना जीवन संभव नहीं। कांग्रेस-राजद के मंच से यह अपमान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारतीय समाज और उसकी मातृशक्ति की अस्मिता का था।
यही कारण है कि दरभंगा की घटना ने बिहार की जनता के दिलों को झकझोर दिया। गरीब मां की पीड़ा को समझना गांधी कुनबे के ‘युवराज’ के बस की बात नहीं। कांग्रेस को कामदारों की सफलता कभी रास नहीं आती, उसका दृष्टिकोण हमेशा नामदारों की राजनीति तक सीमित रहता है।
भाजपा-जदयू के पक्ष में आए लोग
दरभंगा प्रकरण के बाद पूरे बिहार में जनाक्रोश उमड़ पड़ा। सोशल मीडिया पर जहां पहले ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ ट्रेंड कर रही थी, वहीं घटना के बाद ‘मोदी जी की मां’ सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। कांग्रेस और राजद के लिए यह ‘सेल्फ गोल’ साबित हुआ। जो लोग एनडीए से नाराज चल रहे थे, वे भी इस प्रकरण के बाद भाजपा-जदयू गठबंधन के पक्ष में खड़े हो गए।
यात्रा के दौरान कांग्रेसियों ने ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ और ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नारे लगाए। किंतु यही यात्रा हास्यास्पद घटनाओं का प्रतीक भी बनी। दरभंगा में राहुल गांधी के सुरक्षा गार्ड ने रोड शो के लिए एक स्थानीय युवक की बाइक ली थी, जो फिर लौटी ही नहीं। विडंबना यह है कि ‘वोट चोर’ का नारा लगाने वाली कांग्रेस की यात्रा में एक साधारण नागरिक की बाइक चोरी हो गई।
‘यात्रा’ असल में कांग्रेस की अपनी खोई जमीन वापस पाने का प्रयास थी। सहयोगी दलों के प्रति राहुल गांधी का रवैया उपेक्षापूर्ण ही रहा। तेजस्वी यादव को कहीं भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। यात्रा का पूरा मीडिया कवरेज राहुल गांधी पर केंद्रित रहा। तेजस्वी यादव केवल सहयात्री बनकर रह गए।
आंतरिक कलह
यात्रा में कांग्रेस कार्यकर्ता ही उपस्थित थे। वे ही कांग्रेस के झंडे लहराते नजर आए, जबकि राजद का झंडा नाममात्र को दिखा। यही कारण था कि कई स्थानों पर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में विवाद भी हुआ। पूर्वी चंपारण (मोतीहारी) में यह टकराव चरम पर पहुंचा। कांग्रेस जिलाध्यक्ष गप्पू राय और उनके सहयोगी अनुराग तिवारी ने आरोप लगाया कि मेयर और राजद नेता प्रीति गुप्ता व उनके पति देव गुप्ता ने कांग्रेस के पोस्टर फाड़ दिए और उनकी जगह राजद के पोस्टर लगा दिए। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जान से मारने की धमकी तक दी गई। इस मामले में नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज हुई। यह घटना बताती है कि गठबंधन का दावा करने वाले दलों में कितनी गहरी अविश्वास की खाई है।
यात्रा में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन तो शामिल हुए, किंतु तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने दूरी बनाई। उन्होंने केवल यूसुफ पठान और ललितेश त्रिपाठी को भेजा, जिनका पार्टी में कोई विशेष महत्व नहीं है। उद्धव ठाकरे भी स्वयं आने से परहेज करते रहे। यह सब कांग्रेस की नेतृत्वहीनता और घटती स्वीकार्यता को उजागर करता है।

गालीबाज परंपरा और कांग्रेस
कांग्रेस नरेंद्र मोदी को गाली देने की अपनी ओछी हरकत से कभी बाज नहीं आई। 2007 में सोनिया गांधी ने उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा, नतीजा कांग्रेस की हार। 2013-14 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद तो कांग्रेस नेताओं ने गालियों की झड़ी लगा दी। यहां तक कि कांग्रेसी नेता इमरान मसूद ने मोदी के टुकड़े-टुकड़े करने की धमकी दी। मणिशंकर अय्यर ने चाय बेचने पर व्यंग्य कसते हुए उनको अपमानित किया। परिणाम यह हुआ कि 2014 के चुनाव में कांग्रेस केवल 44 सीटों पर सिमट गई।
यह सिलसिला बाद में भी नहीं रुका। 2022 के गुजरात चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी की तुलना रावण से की। जनता ने इसे नकारते हुए भाजपा को रिकॉर्ड 156 सीटों की ऐतिहासिक जीत दिलाई। अब बिहार की इस यात्रा में भी कांग्रेस-राजद ने वही गलती दोहराई। गाली की राजनीति, झूठ का सहारा और सत्ता की चाह- यही इस यात्रा की पहचान बन गई।

















