वोटर अधिकार यात्रा’ से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने और भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने चले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और उनके साथ खड़े विपक्षी दल औंधे मुंह गिरे हैं। चुनाव आयोग के खिलाफ राहुल के झूठे आरोपों की हवा निकल गई है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने अक्तूबर-नवंबर में प्रस्तावित बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) पर रोक लगाने और चुनाव आयोग के घोषित कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की मांग ठुकरा दी है। साथ ही इसे चुनाव आयोग का दायित्व और अधिकार बताते हुए पूरे देश में एसआईआर को चलाने का रास्ता भी साफ कर दिया है। यही नहीं, न्यायालय ने आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने की विपक्ष की कोशिशों को भी झटका दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि ‘आधार’ सिर्फ पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार
हालांकि न्यायालय ने यह कहा है कि मतदाता सूची से अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाने और योग्य मतदाताओं के नाम शामिल करने की प्रक्रिया पूर्व निर्धारित तिथि 1 सितंबर के बाद भी चलती रहेगी। विपक्ष इसे अपनी जीत बताकर पीठ थपथपा रहा है, पर यह चुनाव आयोग की सामान्य प्रक्रिया है। इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कह दिया कि किसी को भी आयोग पर इतना अविश्वास नहीं दिखाना चाहिए। राहुल सहित कांग्रेस और विपक्ष को ऐसे निराधार आरोपों से बाज आने की नसीहत दी गई। अदालत ने कहा कि बिहार में समय पर चुनाव कराना सर्वोपरि है। इसलिए उसने स्पष्ट कर दिया कि बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चलेगी। विपक्ष, खासकर कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका है।
विपक्ष के प्रयासों को झटका
संयोग से सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय उस दिन आया जिस दिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजद के नेतृत्व में एसआईआर के विरुद्ध बिहार में चल रही ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का समापन हुआ। अपेक्षा के अनुरूप भीड़ न जुटने और ममता बनर्जी व अरविंद केजरीवाल की गैरहाजिरी ने पहले ही साफ कर दिया था कि प्रधानमंत्री मोदी को घेरने का राहुल का प्रयास असफल रहा है। पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने विपक्ष की उम्मीदों को भी तोड़ दिया। हालांकि लगता नहीं कि वे इससे कोई सबक लेंगे। विपक्ष के अन्य दल राहुल की नीति, नीयत और नेतृत्व क्षमता पर पुनर्विचार करेंगे या नहीं, यह समय बताएगा।
पहले ईवीएम, अब वोट चोरी
याद दिला दें कि ईवीएम में गड़बड़ी कर चुनाव जीतने का आरोप लगाकर भाजपा की जीत को जनता के समर्थन से काटने की कोशिश कांग्रेस पहले भी करती रही है। अब भाजपा पर चुनाव आयोग से मिलीभगत कर ‘वोट चोरी’ करने का आरोप लगाया जा रहा है। राहुल का दावा है कि इसी ‘वोट चोरी’ से मोदी सरकार तीसरी बार बनी और भाजपा ने कई राज्यों में जीत हासिल की। पर उनके तर्कों से विपक्ष की समझदारी पर सवाल उठते हैं। यदि राहुल सही हैं तो उन्हें बताना चाहिए कि 2014 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार होते हुए मोदी ने ‘वोट चोरी’ कैसे कर ली। तब तो यह राहुल और उनके परिवार की योग्यता पर सवाल है।
राहुल से यह भी पूछा जाना चाहिए कि यदि 2014 और 2019 में वोट चोरी करके मोदी ने सरकार बनाई तो 2024 में वे 240 सीटों पर क्यों अटक गए। भाजपा यदि हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में वोट चोरी से जीती तो तेलंगाना और झारखंड क्यों हारी? वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट कहते हैं कि विपक्ष मान चुका है कि तथ्यों और तर्कों के आधार पर मोदी को हराना असंभव है। मोदी ने कल्याणकारी योजनाओं के जरिए लाभार्थी वर्ग तैयार किया और सनातन मूल्यों को सम्मान देकर जातीय खांचों को भी कमजोर किया। इसलिए राहुल और विपक्ष का उद्देश्य भ्रम फैलाकर माहौल बनाना है।
नतीजों से बढ़ा दुस्साहस
भट्ट कहते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्ष को झूठ की राजनीति करने का दुस्साहस दे दिया। चुनाव के दौरान मोदी सरकार पर संविधान बदलने, आरक्षण खत्म करने और जातीय जनगणना न कराने जैसे आरोपों का कोई आधार नहीं था, पर चुनाव नतीजों में इन नारों का असर दिखा। इसी से विपक्ष भ्रम पाल बैठा है कि झूठ दोहराने से लोग भरोसा कर लेंगे। वोट चोरी का आरोप भी उसी प्रयास का हिस्सा है। तथ्यों पर कसें तो लगता है कि 100 से अधिक चुनावी असफलताओं पर परदा डालने के लिए राहुल जानबूझकर भ्रम फैला रहे हैं।
उदाहरण के लिए, बंगलौर सेंट्रल की महादेवपुरा सीट पर भाजपा की जीत को आधार बनाकर राहुल ने फर्जी मतदाताओं और मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाया, जिसे चुनाव आयोग ने खारिज कर दिया। आयोग के बार-बार कहने पर भी राहुल अपनी शिकायत दर्ज नहीं कराते। कई मतदाता स्वयं सामने आकर राहुल के आरोपों को झुठला चुके हैं। मृतकों के नाम या जीवित लोगों के नाम गायब होने की शिकायतें नई नहीं हैं। इन्हीं त्रुटियों को सुधारने के लिए आयोग ने लगभग दो दशक बाद देशभर में एसआईआर शुरू किया है, जिसकी शुरुआत बिहार से हुई है।
मुस्लिम मतों पर नजर
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी कहते हैं कि नेहरू परिवार अपनी असफलताओं पर परदा डालने के लिए हमेशा दूसरों पर दोषारोपण करता आया है। मतदान प्रक्रिया में सुधार ने कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। मतदाता पहचान पत्र लागू होने के बाद से कांग्रेस को कभी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। जैसे-जैसे चुनाव सुधार हुए, फर्जी वोटिंग रुकी, कांग्रेस कमजोर हुई। भाजपा के उभार और हिंदू मतदाताओं की गोलबंदी ने कांग्रेस और विपक्ष की राजनीति को मुस्लिम वोटों पर निर्भर बना दिया। देश में करीब 6 करोड़ बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान अवैध रूप से रह रहे हैं, जिनमें से कई मतदाता सूची में दर्ज हैं। एसआईआर से इनके नाम कट सकते हैं। यही कारण है कि विपक्ष वोट चोरी का नारा देकर एसआईआर को विवादित करना चाहता है।
बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का फोकस मुस्लिम बहुल इलाकों पर रहा। यह भी बताता है कि राहुल की रणनीति क्या है। इसके साथ ही हिंदी विरोधी राजनीति करने वाले नेताओं को बिहार बुलाकर भाषण कराना यह दर्शाता है कि राहुल हिंदू और हिंदी विरोध की राजनीति को भी साध रहे हैं। उनका लक्ष्य क्षेत्रीय दलों पर दबाव बनाकर कांग्रेस के लिए ज्यादा हिस्सेदारी पाना भी है। तेजस्वी यादव ने प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल का नाम लिया, पर बिहार में मुख्यमंत्री पद पर राहुल की चुप्पी बताती है कि कांग्रेस का निशाना क्षेत्रीय दल भी हैं। विपक्षी दल राहुल का असली उद्देश्य समझेंगे या नहीं, यह आगे पता चलेगा। लेकिन फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने राहुल के वोट चोरी विमर्श को करारा झटका दिया है।

















