पाकिस्तान से हैरान करने वाली जानकारी सामने आ रही है कि सेना प्रमुख ‘फील्ड मार्शल’ असीम मुनीर बलूच आंदोलन को कुचलने के लिए इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) को शह दे रहे हैं। इस बाबत चर्चाएं और तेज हुई हैं गत 3 सितम्बर को क्वेटा के शाहवानी स्टेडियम के बाहर हुए आत्मघाती विस्फोट के बाद से। उस हमले की जिम्मेदारी आईएसकेपी ने ली है और अब उसके और पाकिस्तानी सेना के बीच कथित संबंधों पर जिन्ना के देश का मीडिया विश्लेषण छाप रहा है।
3 सितंबर 2025 की रात क्वेटा के शाहवानी स्टेडियम के बाहर हुए आत्मघाती विस्फोट ने न केवल 15 निर्दोष लोगों की जान ले ली, बल्कि बलूचिस्तान की राजनीतिक स्थिरता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह हमला बलूचिस्तान नेशनल पार्टी-मेंगल (बीएनपी-एम) की एक रैली के कुछ ही देर बाद हुआ था। यह रैली वरिष्ठ बलूच नेता सरदार अत्ताउल्लाह मेंगल की याद में आयोजित की गई थी।
उस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) ने बयान जारी किया जिसमें कहा कि बीएनपी-एम की ‘राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक राजनीति’ उनके इस्लामी नजरिए के खिलाफ है। इस बयान पर पाकिस्तान के ही विश्लेषकों का कहना है कि वह हमला केवल मजहबी कट्टरता का ही नतीजा नहीं था, उसमें एक रणनीतिक संदेश भी था।

इसी के साथ पाकिस्तानी मीडिया और सुरक्षा विश्लेषकों में यह बहस भी शुरू हुई है कि क्या पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) आईएसकेपी जैसे संगठनों को बलूच राष्ट्रवादियों के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है?
इस संदेह के पीछे कुछ वजहें हैं। जैसे, ISKP आमतौर पर महबी ठिकानों या सुरक्षा बलों को ही निशाना बनाता आ रहा है। लेकिन इस बार एक राजनीतिक रैली को निशाना बनाना साफ दिखाता है कि यह हमला किसी गहरे राजनीतिक मकसद से किया गया था।
इस हमले को लेकर बलूच नेता सरदार अख्तर मेंगल ने बीबीसी उर्दू को बयान दिया। उन्होंने कहा कि उनकी निजी सुरक्षा पहले ही हटा ली गई थी और उन्हें रैली की इजाजत देने में भी बाधाएं डाली गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने उन्हें चेतावनी दी थी कि ‘एक ताकतवर आदमी’ उनके खिलाफ कार्रवाई करने की तैयारी कर रहा है।
बलूचिस्तान में लोकतांत्रिक राजनीति पहले से ही सीमित है, और बीएनपी—एम जैसे दलों को, जो संवैधानिक ढांचे के तहत बलूच अधिकारों की बात करते हैं, लगातार दबाव का सामना करना पड़ता है।
बलूचों पर उस हमले के बाद वाध शहर में तीन दिन का शोक घोषित किया गया था, उधर मकरान इलाके के वकीलों ने विरोधस्वरूप अदालतों का बहिष्कार किया था। इस बर्बर हमले पर बलूच यकजहेती कमेटी (BYC) और बलूच नेशनल मूवमेंट (BNM) ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे ‘राज्य प्रायोजित हिंसा’ बताया है और कहा है कि यह बलूचों की राजनीतिक आवाज को दबाने की इस्लामाबाद की नीति का हिस्सा है।
जिन्ना के देश के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह हमला केवल आतंकवाद से जुड़ा नहीं था, बल्कि एक रणनीतिक प्रयास था जिससे बलूच राजनीति को कुचला जा सके।

साफ है कि पाकिस्तान की आईएसआई दोहरी नीति पर काम कर रही है। जैसे, 2000 के दशक में पाकिस्तान ने कुछ आतंकवादी संगठनों को पीछे से समर्थन देकर अमेरिका के साथ दोहरी चाल चली थी, वैसे ही अब आईएसकेपी को बलूच राजनीति को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
बीएनपी-एम जैसे बलूच राजनीतिक दल हिंसा के बजाय संवैधानिक रास्ते से अपनी बात रखते आए हैं, लेकिन अब उन्हें निशाना बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि बलूच राजनीति अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
क्वेटा में हुए फिदायीन हमले ने बलूचिस्तान में राजनीतिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिक समाज और राजनीतिक दलों ने इस हमले की स्वतंत्र जांच की मांग की है, ताकि यह साफ हो सके कि क्या यह हमला केवल सुरक्षा की चूक का नतीजा था या राज्य की किसी साठगांठ का!
बीएनएम और बीवाईसी ने मांग की है कि इस हमले और इससे पहले मस्तुंग में हुए हमले की निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि असलियत सबके सामने आए। अगर जिन्ना के देश की सेना और आईएसकेपी के बीच साठगांठ होने के आरोप सही साबित होते हैं तो पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि और आतंकवाद के खिलाफ उसकी प्रतिबद्धता का असल चेहरा एक बार फिर उजागर हो जाएगा।
क्वेटा का शाहवानी स्टेडियम धमाका केवल एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि बलूचिस्तान की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने वाला एक निर्णायक मोड़ हो सकता है। आईएसकेपी की जिम्मेदारी और बीएनपी-एम को निशाना बनाए जाने की इस चाल से साफ है कि बलूच राजनीति को दबाने के लिए एक जिहादी गुट का कथित सहारा लिया जा रहा है। मुनीर की सेना एक बार फिर विरोध को कुचलने के लिए जिहादी तत्वों की गोद में बैठने की हिमाकत कर रही है।
















