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होम भारत

तेल, टैरिफ और तकरार : …तेल की धार देखो

भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ और रूसी तेल आयात पर संभावित 500 प्रतिशत शुल्क भारत की ऊर्जा और व्यापार रणनीति के लिए बड़ी चुनौती है। अमेरिका की नीतियां असंगत दिख रही हैं और अंततः यह तनाव उसके लिए उलटा पड़ सकता है

Written byप्रमोद जोशीप्रमोद जोशी — edited by Rajpal Singh Rawat
Sep 8, 2025, 08:15 am IST
in भारत, विश्लेषण

भारतीय उत्पादों पर 27 अगस्त से ट्रंप प्रशासन का 50 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया। यह स्थिति भारत के सामने वैसी ही चुनौती प्रस्तुत करती है, जैसी कोरोना-19 महामारी के समय उत्पन्न हुई थी। तब निर्यात अन्य कारणों से बाधित हुआ था, इस बार वजह अलग है। 2020 में कोरोना महामारी ने तेल की वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया था।

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार

आर्थिक गतिविधियां अचानक ठप हो गईं और तेल की मांग इतनी गिर गई कि तैयार पेट्रोलियम उत्पाद को खरीदने वाला नहीं मिल रहा था। हालात यहां तक बिगड़े कि कच्चे तेल की कीमतें नकारात्मक स्तर पर पहुंच गईं। इसी दौर में ‘डी-डॉलराइज़ेशन’ की वैश्विक बहस ने जोर पकड़ना शुरू किया, जिसे ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने और तेज किया। ब्रिक्स देशों पर उनका हमला इसी दिशा में संकेत कर रहा है।

तेल का खेल

हालांकि, यह तय है कि ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों का युग, जिसमें पेट्रोलियम की भूमिका सबसे अहम है, एक दिन समाप्त अवश्य होगा, लेकिन वह दिन अभी दूर है। दुनिया महामारी से उबरने की प्रक्रिया में ही थी कि फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन के खिलाफ विशेष सैन्य अभियान शुरू कर दिया। इस कदम ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में नए तरह के ध्रुवीकरण की नींव रख दी, जिसके प्रभाव हम आज प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं।

यूक्रेन युद्ध के चलते एक ओर दुनिया की खाद्य आपूर्ति प्रभावित हुई, दूसरी ओर यूरोप की ऊर्जा-निर्भरता रूस पर खुलकर सामने आ गई। ऐसे समय में जबकि अमेरिका भारत पर रूसी गैस खरीदने को लेकर टैरिफ का दबाव बना रहा है, भारत सवाल उठा रहा है कि जब यूरोप और चीन, दोनों ही उससे कहीं अधिक हद तक रूसी पेट्रोलियम पर निर्भर हैं, तो उनकी आलोचना क्यों नहीं होती?

कुछ दशक पहले तक पेट्रोलियम कुछ देशों की समृद्धि का मुख्य आधार माना जाता था। कई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह तेल पर आधारित कर ली थी। उनकी उत्पादन लागत भले ही ऊंची थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम की ऊंची कीमतें उन्हें सुरक्षित रखती थीं। परंतु कोरोना काल में जब तेल की कीमतें ऐतिहासिक रूप से गिर गईं, तो इन देशों की हालत बिगड़ गई।

वेनेजुएला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार होने के बावजूद यह देश आज दिवालिया स्थिति में है। 2016 में वहां पेट्रोलियम उत्पादन लागत 117.50 डॉलर प्रति बैरल थी, जो आज और अधिक हो चुकी होगी। इसी तरह, ईरान में 2016 में यह लागत 51.30 डॉलर प्रति बैरल थी, जबकि सऊदी अरब में उत्पादन लागत 25 डॉलर से भी कम रही है। यही कारण है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अब अपनी अर्थव्यवस्था को ‘पेट्रोल-युग’ से बाहर निकालने और विविधीकरण की दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहे हैं।

एक बैरल कच्चे तेल के उत्पादन की लागत क्षेत्र और उत्पादन पद्धति के अनुसार काफी भिन्न होती है। कुछ ओपेक देशों में यह लागत केवल 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल तक हो सकती है, जबकि ऑयल शेल जैसी विधियों में यह काफी अधिक होती है। अमेरिका में नई परियोजनाओं की यह लागत 70 से 95 डॉलर प्रति बैरल तक हो सकती है। हालांकि, समय के साथ पैमाने और तकनीकी दक्षता बढ़ने से यह लागत घटती भी रहती है। अगस्त 2025 तक कच्चे तेल की भारतीय बास्केट की कीमत लगभग 69.35 डॉलर प्रति बैरल थी। तुलना के लिए देखें तो 2014-15 में ओएनजीसी के लिए उत्पादन लागत 36.80 डॉलर प्रति बैरल रही थी।

भारत की राह

यदि भारत को मजबूरी में रूसी तेल की खरीद बंद करनी पड़ी, तो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी। सैद्धांतिक रूप से पश्चिम एशिया के पास लगभग 35 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त क्षमता है और अफ्रीकी देशों सहित अन्य उत्पादकों से भी तेल खरीदा जा सकता है। लेकिन यह भी सच है कि रूसी तेल की खरीद तुरंत रोकी नहीं जा सकती, क्योंकि भारत की शिपिंग कंपनियों के साथ अग्रिम आपूर्ति अनुबंध हैं और रिफाइनरियों को भी नए स्रोतों से आने वाले कच्चे तेल के अनुरूप तकनीकी बदलाव करने पड़ेंगे।

इस परिदृश्य में रूस को भी नए खरीदार खोजने होंगे और सबसे संभावित विकल्प चीन होगा। यदि चीनी रिफाइनर अधिक तेल खरीदते हैं, तो उन्हें वही लाभ मिलेगा, जो अभी तक भारतीय कंपनियों को मिल रहा है। इससे भारत को घाटा होगा, लेकिन चीन को बाजार में रणनीतिक बढ़त मिल जाएगी। जो हाल के महीनों में तेजी से स्टॉक बढ़ा रहे हैं, जिससे उन्हें पर्याप्त शक्ति मिल रही है।
ऐसी स्थिति में ट्रंप की रणनीति उलटी पड़ सकती है, क्योंकि वे चीन से सीधा टकराव मोल लेने की स्थिति में नहीं हैं। दूसरी ओर, इससे वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। बढ़ती ऊर्जा लागत को ट्रंप प्रशासन लंबे समय तक झेल नहीं पाएगा और अंततः उसे पीछे हटना पड़ सकता है, जैसा कि 2018-19 में ईरान पर प्रतिबंधों के बाद हुआ था।

2022 में जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल का बहिष्कार शुरू किया, तो भारत को इसमें एक बड़ा अवसर दिखाई दिया। यूरोप के लिए निर्धारित लगभग 26 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल भारी छूट पर उपलब्ध था। भारत, जिसने 2021 में रूस से लगभग नगण्य मात्रा में ही खनिज तेल आयात किया था, इस मौके का तुरंत फायदा उठाने लगा। वर्तमान में भारत प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल रूसी कच्चे तेल का आयात करता है, जो उसके कुल आयात का लगभग 35 से 40 प्रतिशत है। पिछले तीन वर्ष तक यूक्रेन का समर्थन करने वाले देशों ने इस पर कोई विशेष आपत्ति नहीं जताई। यह रणनीति भारत के लिए समझदारी भरी भी साबित हुई, क्योंकि इससे भारतीय रिफाइनरियां सस्ता कच्चा तेल खरीदकर दुनिया भर को परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध करा रही थीं। अमेरिका ने भी इस चरण में भारत के इस कदम का मौन समर्थन किया।

हालांकि, स्थिति अब बदल रही है। रूस ने संकेत दिया है कि वह यूक्रेन में अपना सैन्य अभियान रोकने के पक्ष में नहीं है। इसके बीच अमेरिकी संसद में एक विधेयक विचाराधीन है, जिसके तहत रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक का शुल्क लगाने का प्रस्ताव है। यदि यह लागू होता है, तो भारत की वर्तमान ऊर्जा रणनीति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

क्या है अमेरिकी मंशा?

मूलतः विवाद का केंद्र व्यापार समझौते से जुड़े मतभेद थे। रूसी पेट्रोलियम का मुद्दा अपेक्षाकृत देर से और अचानक उभरा। दरअसल, यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे, लेकिन खनिज तेल की खरीद पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं था। ऐसे में दंडात्मक टैरिफ का विचार भी ट्रंप की टोली के दिमाग में देर से आया। अब यह महसूस किया जा रहा है कि अमेरिकी निर्णय प्रक्रिया पहले जैसी ‘प्रोसेस-ड्रिवन’ नहीं रही, बल्कि कहीं अधिक आकस्मिक और नेतृत्व की ‘सनक’ पर आधारित है। यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका की आंतरिक नीतियों में भी झलकता है। ट्रंप जिस तरह से केंद्रीय बैंक से टकराव मोल ले रहे हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं को महत्व देने के इच्छुक नहीं हैं। यह केवल भारत की बात ही नहीं है, ट्रंप जिस तरह से अपने केंद्रीय बैंक से पंगा ले रहे हैं, उससे भी लगता है कि वे अपनी लोकतांत्रिक-संस्थाओं का सम्मान करने को भी तैयार नहीं हैं।

भारत का इतिहास अमेरिकी प्रतिबंधों के उल्लंघन का नहीं रहा है। उदाहरण के लिए, ट्रंप के पिछले कार्यकाल में जब ईरानी तेल खरीदने पर रोक लगाई गई, तो भारत ने उसका पालन किया था। संभव है इसी अनुभव के आधार पर ट्रंप यह मान बैठे कि इस बार भी भारत दबाव मान लेगा। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा है कि भारत हर परिस्थिति का सामना करेगा। फिर भी, जोखिम यथावत है। कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि टैरिफ तक ही बात सीमित नहीं रहेगी। अमेरिका धमकी दे सकता है कि रूस से जुड़ी खरीद-फरोख्त में शामिल किसी भी बैंक, बंदरगाह या कंपनी को अमेरिकी वित्तीय तंत्र से बाहर कर दिया जाएगा।

Topics: डी-डॉलराइजेशनDe-Dollarizationअंतरराष्ट्रीय बाजारRussian oil importsoilIndia's energyतेलbarrels of crude oilपाञ्चजन्य विशेषरूसी तेल आयातinternational marketsभारत की ऊर्जाट्रंप प्रशासनबैरल कच्चे तेलTrump AdministrationUS Tariffsअमेरिकी टैरिफ
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