‘अनंत चतुर्दशी’ पर विशेष : विलक्षण है प्रतिमा विसर्जन का तत्वदर्शन
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‘अनंत चतुर्दशी’ पर विशेष : विलक्षण है प्रतिमा विसर्जन का तत्वदर्शन

गणेश विसर्जन के पीछे छिपा है आत्मा की अनश्वरता का संदेश। जानें अनंत चतुर्दशी का महत्व और इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव क्यों है आवश्यक।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Sep 5, 2025, 09:24 pm IST
inमत अभिमत, धर्म-संस्कृति

गणेशोत्सव के समापन पर गणपति की स्थापना, पूजन व विर्सजन की परम्परा है। अनभिज्ञ लोग जिज्ञासा व्यक्त करते हैं कि इतने स्वागत-वंदन के बाद उस प्रतिमा का विसर्जन क्यूं कर दिया जाता है? वस्तुत: इसके पीछे हमारी सनातन संस्कृति का आत्मा की अनश्वरता का गूढ़ तत्वदर्शन निहित है। गणपति प्रतिमा का विसर्जन यह संदेश देता है कि पुनः नये रूप स्वरूप में प्रकट होने के लिए मोह-माया को छोड़कर हमें भी एक दिन प्रकृति में ही विलीन होना पड़ेगा।

विसर्जन का शाब्दिक अर्थ और महत्व

संस्कृत भाषा में विसर्जन शब्द का शाब्दिक अर्थ है जल में विलीन करना। यह एक सम्मान सूचक प्रक्रिया है। इस विसर्जन के लिए निर्धारित तिथि ‘अनंत चतुर्दशी’ की महत्ता भी कम विशिष्ट नहीं है। अनंत अर्थात जिसका न कोई आदि हो, न अंत; जो चिरंतन हो, अक्षत हो। इसीलिए इस शुभ दिवस पर प्रतिमा विसर्जन के साथ गौरीनंदन के दस दिवसीय जन्मोत्सव समारोह का समापन किया जाता है।

श्रीमद्भागवत में अनंत चतुर्दशी का उल्लेख

गणपति बप्पा का यह दस दिवसीय पूजनोत्सव अंनत चतुर्दशी पर ही क्यों सम्पन्न होता है, इस बाबत श्रीमद्भागवत में उल्लेख मिलता है कि महर्षि वेदव्यास ने गणेश चतुर्थी से भागवत शुरू की। आंख बंद कर वे कथा सुनाते रहे और श्रीगणेश अपने एक दांत को कलम बनाकर उसे लिपिबद्ध करते रहे। दस दिन बाद जब कथा पूरी कर महर्षि व्यास ने अपनी आंखें खोलीं तो पाया कि दस दिन के अनथक श्रम से गणेश जी के शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया। तब वेदव्यास जी ने तत्काल गणेश जी को निकट के जलकुंड में बैठाकर उनके शरीर का ताप शांत किया। वह तिथि अनंत चतुर्दशी की थी। तभी से अनंत चतुर्दशी को उनकी प्रतिमा के जल विसर्जन की परम्परा शुरू हो गयी।

विसर्जन का तत्वदर्शन और जीवन दर्शन

अंनत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के पीछे जीवन की अंनतता व सांसारिक नश्वरता का अत्यन्त शिक्षाप्रद तत्वदर्शन निहित है। प्रतिमा विसर्जन की परम्परा वस्तुत: हमारे जीवन व मृत्यु के चक्र की प्रतीक है। गणेश की मूर्ति बनायी जाती है, उसकी पूजा की जाती है एवं फिर उसे अगले साल वापस पाने के लिए प्रकृति को सौंप दिया जाता है। इसी तरह, हम भी इस संसार में आते हैं अपने जीवन की जिम्मेदारियों को पूरा करते हैं एवं समय समाप्त होने पर पुन: एक नये जीवन की उम्मीद के साथ मृत्यु की गोद में समा जाते हैं।

विसर्जन हमें क्या सिखाता है?

विसर्जन हमें तटस्थता के पाठ को सिखाता है। यह सिखाता है कि सांसारिक वस्तुएं व लौकिक सुख केवल शरीर को तृप्त करते हैं न कि आत्मा को। इस जीवन में मनुष्य को कई चीज़ों से लगाव हो जाता है लेकिन जब मृत्यु आती है तब हमें इन सारे बंधनों को तोड़कर जाना पड़ता है। गणपति बप्पा भी हमारे घर में स्थान ग्रहण करते हैं और हमें उनसे लगाव हो जाता है परंतु समय पूरा होते ही हमें उन्हें विसर्जित करना पड़ता है।

सनातन धर्म में अनंत चतुर्दशी का महत्व

सनातन हिन्दू धर्म में अनंत चतुर्दशी का विशेष महत्ता है। इस तिथि को आम बोलचाल की भाषा में अनंत चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि को जगतपालक श्री हरि विष्णु के विशेष पूजन अर्चन का विधान श्रीमद्भागवत महापुराण में विस्तार से वर्णित है। शास्त्रीय मान्यता है कि इस दिन ब्रह्माण्ड के पालक भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का पूजन कर व्रत करने से श्रद्धालु को अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

अनंत चतुर्दशी का रक्षासूत्र और 14 लोक

इस दिन वाला 14 गांठों का यह रक्षासूत्र 14 लोकों का प्रतिनिधित्व करता है। अनंत चतुर्दशी के दिन विधि विधान से बांधकर व्रत व पूजा करने से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु को अर्पित किया जाने वाला 14 गांठों वाला रक्षासूत्र बंधने से सभी सांसारिक विघ्न बाधाओं से मुक्ति मिलती है। सूत या रेशमी धागे को हल्दी और केसर से रंगकर उसमें 14 गांठे लगाकर यह रक्षासूत्र तैयार किया जाता है। फिर भगवान को फल, पुष्प, हल्दी, अक्षत और प्रसाद आदि चढ़ा कर उनके चरणों में यह रक्षासूत्र अर्पित करके विधि-विधान से पूजा की जाती है।

अनंतसूत्र का पूजन मंत्र

पूजन मंत्र है—
‘’अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव। अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।।‘’

14 गांठों का प्रतिनिधित्व

शास्त्र कहते हैं कि 14 गांठों वाला यह रक्षासूत्र 14 लोकों (सत्‍य, तप, जन, मह, स्‍वर्ग, भुव:, भू, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल) का प्रतिनिधित्व करता है जिनकी रक्षा के लिए श्रीहरि विष्‍णु ने 14 अलग-अलग अवतार लिये थे।

इकोफ्रेंडली गणेशोत्सव को बढ़ावा दें श्रद्धालु

हिन्दू संस्कृति के व्रतों-त्योहारों व पर्वों की अनंत श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है गणेश उत्सव। हम सनातनधर्मी हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से अनंत चतुर्दशी तक विघ्नहर्ता गणेश का जन्मोत्सव पूरी श्रद्धा व हर्षोल्लास से मनाते हैं। इस वर्ष गणेश चतुर्थी (27 अगस्त) से शुरू हुआ बप्पा का यह दस दिवसीय मंगल उत्सव अनंत चतुर्दशी (6 सितम्बर) को प्रतिमा विसर्जन के साथ संपन्न हो रहा है।

गणेशोत्सव के दौरान भक्तिभाव और उल्लास

ज्ञात हो कि 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दौरान घर और भव्य पूजा पंडालों में मनोहारी गणेश प्रतिमाओं की स्थापना, मोदक आदि स्वादिष्ट व्यंजनों का भोग प्रसाद और भक्ति गीत संगीत का आनंद के साथ प्रतिमाओं का विसर्जन श्रद्धालुओं के अंतस को एक अनूठे आनंद से भर देता है। लेकिन इस दिव्य पर्व के समापन पर देव प्रतिमाओं का जल विसर्जन करते हुए धरतीमाता और पंचतत्वों की पीड़ा को अनदेखा-अनसुना कर देना हमारी ऐसी नादानी और नैतिक अपराध है, जिससे मंगलमूर्ति हमसे कभी प्रसन्न नहीं हो सकते।

पीओपी की मूर्तियों से पर्यावरण को नुकसान

काबिलेगौर हो कि महानगरीय परिवेश में बड़ी संख्या में श्रद्धालु गणेश उत्सव के दौरान पूजन के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ स्थापित करते हैं। पीओपी से बनी मूर्तियां भले ही देखने में कितनी ही सुन्दर व आकर्षक लगें, किन्तु पर्यावरण की दृष्टि से बेहद नुकसानदायक होती हैं। पीओपी में मैग्नीशियम, जिप्सम, फॉस्फोरस और सल्फर जैसे रसायन होते हैं जो आमतौर पर इन मूर्तियों को रंगने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

जल स्रोतों पर हानिकारक प्रभाव

साथ ही इन रंगों में पारा, कैडमियम, आर्सेनिक, लेड और कार्बन जैसे रसायन भी होते हैं। जब इन मूर्तियों को समुद्र, नदी, तालाबों, झीलों आदि जल स्रोतों में विसर्जित किया जाता है तो इससे पानी विषाक्त हो जाता है। साथ ही इससे पानी में रहने वाले जलीय जीवों को भी भारी नुकसान होता है। यदि हम सही मायने में विघ्नहर्ता का जन्मोत्सव मनाकर उनको प्रसन्न कर उनकी कृपा प्रसाद को प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें अपनी यह भारी भूल सुधारनी ही होगी।

इकोफ्रेंडली गणेशोत्सव की ओर कदम

सुखद बात है कि इस दिशा में कई पर्यावरण प्रेमी श्रद्धालु और संस्थाएं इको फ्रेंडली गणेशोत्सव को बढ़ावा देने के सराहनीय प्रयास में जुटी हुई हैं। किन्तु आज आवश्यकता है इस मुहिम को जनांदोलन बनाने की। तभी हम गणपति बप्पा के सच्चे भक्त कहलाने के अधिकारी बन सकेंगे।

प्राकृतिक घटकों से बनी प्रतिमाओं का महत्व

इसलिए जितना हो सके प्राकृतिक घटकों से बनी प्रतिमाओं से गणपति पूजन को बढ़ावा दें ताकि माँ प्रकृति सुरक्षित व संरक्षित रह सके। हमारे धर्मग्रंथों में सुपारी व हल्दी से प्रतीक रूप में गजानन भगवान की पूजा का विधान वर्णित है। इसी तरह सनातन धर्म में पवित्र नदियों की मिट्टी को बहुत ही पवित्र बताया गया है। हिन्दू धर्म के मनीषियों के अनुसार इन नदियों की मिट्टी से गणपति प्रतिमा का निर्माण कर गणेशोत्सव मनाना ही सच्चा ईश वंदन है। इसी तरह गोमय की गणपति प्रतिमा का पूजन भी शुभ फलदायी होता है।

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