अफगानिस्तान : भूकंप के मलबे से निकाले गए पुरुष, महिलाओं की हुई अनदेखी, ये कैसा अन्याय..?
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अफगानिस्तान : भूकंप के मलबे से निकाले गए पुरुष, महिलाओं की हुई अनदेखी, ये कैसा अन्याय..?

अफगानिस्तान में भूकंप के दौरान महिलाओं को बचाव और इलाज से वंचित किया गया। तालिबान के कठोर नियमों के कारण महिला पीड़ितों की मौतें हुईं...

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Sep 5, 2025, 09:00 pm IST
in विश्व

अफगानिस्तान में तालिबान शासन में महिलाओं के प्रति एक और बड़ा अन्याय नजर आया है। और यह अन्याय उनके जीवन की कीमत पर आया है। पहले भी ऐसे समाचार आते रहे हैं और इस बार भूकंप के दौरान यह समाचार आया है। दरअसल अफगानिस्तान में हाल ही में बहुत भयानक भूकंप आया था, और उस भूकंप में लगभग दो हजार के करीब लोग मारे गए थे। हजारों की संख्या में लोग घायल थे।

भूकंप पीड़ितों में महिलाओं की अनुपस्थिति

मगर इन घायलों में अधिकतर पुरुष ही दिखे। जो लोग इलाज कराने के लिए बैठे थे, उनमें भी अधिकांश पुरुष ही थे। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार जब एक पत्रकार पूर्वी अफगानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्रों में भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में पहुंची तो उस समय भूकंप को आए हुए 36 घंटे हो गए थे और वह यह देखकर डर से भर गई कि घायलों में एक भी महिला नहीं थी।

तालिबान के प्रतिबंध और महिलाओं की पीड़ा

दरअसल अफगानिस्तान में तालिबान ने महिलाओं पर जो पाबंदियाँ लगाई हुई हैं, उनमें सबसे बड़ी पाबंदी यही है कि जो महिला और पुरुष आपस में परिजन नहीं हैं, उनके बीच किसी भी तरह का शारीरिक संपर्क नहीं हो सकता है। कुणार प्रांत में अंदरलुकाक गाँव में आपात टीम ने घायल लड़कों और आदमियों का इलाज करना शुरू कर दिया था, मगर लड़कियों को और महिलाओं को एक किनारे धकेल दिया गया। जबकि उनमें से कइयों के खून भी आ रहा था।

महिला घायलों की उपेक्षा

आयशा बीबी नामक लड़की के हवाले से न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि उन्होनें लड़कियों को एक कोने में इकट्ठा कर दिया और फिर उनके बारे में भूल गए। मेडिकल टीम के सभी पुरुष सदस्य महिलाओं को ढहे हुए मकानों के मलबे के नीचे से नहीं निकाल सकते थे। जो महिलाएं मलबे में दबी हुई थीं, उन्हें तब तक नहीं निकाला जा सका, जब तक कि नजदीकी गाँव से और महिलाएं नहीं आईं और उन्हें खोदकर बाहर नहीं निकाला गया।

आपदाओं में महिलाओं पर सबसे बड़ा असर

यह बहुत ही दुखद है कि अफगानिस्तान में ऐसी आपदाओं का सबसे बड़ा असर वहाँ की महिलाओं पर पड़ता है। कुछ समय पहले भी ऐसी ही सूचनाएं आई थीं कि पूर्व में आई आपदाओं में भी महिलाओं को ही सबसे ज्यादा पीड़ा का सामना करना पड़ा था, क्योंकि अफगानिस्तान में महिलाओं को लेकर तालिबान के कानून बहुत सख्त हैं। महिलाओं को जीवन बचाने से ज्यादा जरूरी तालिबान के बनाए नियमों का पालन लगा।

महिलाओं के बचाव में कठिनाइयाँ

आदमियों और बच्चों का इलाज पहले किया गया और महिलाओं और लड़कियों को एक तरफ बैठा दिया गया था। और सबसे हैरान करने वाली बात यही रही कि अगर कोई पुरुष नातेदार मौजूद नहीं था, बचाव कर्मियों ने मृत महिलाओं को उनके वस्त्र पकड़ कर उठाया, जिससे कि त्वचा के साथ कोई संपर्क न हो।

यूएन वुमन की प्रतिक्रिया

यूएन वुमन अफगानिस्तान के लिए विशेष प्रतिनिधि सुसान फर्गुसन ने इस सप्ताह एक वक्तव्य में कहा कि “महिलाओं और लड़कियों को एक बार फिर से आपदाओं का बोझ उठान पड़ेगा, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी जरूरतें हमारे जबावों का केंद्र रहें।“

महिला स्वास्थ्यकर्मियों की कमी

अफगानिस्तान में महिला स्वास्थकर्मियों की बहुत कमी है क्योंकि तालिबान शासन ने पिछले वर्ष ही महिलाओं के लिए चिकित्सीय शिक्षा में प्रवेश को लेकर प्रतिबंध लगा दिया था। अफगानिस्तान में आपदाओं के बीच महिला चिकित्सकों एवं बचावकर्मियों की कमी भी देखी गई है।

महिलाओं पर तालिबान के कठोर नियम

यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि महिलाओं के साथ अफगानिस्तान में दोयम दर्जे का व्यवहार ही नहीं हो रहा है, बल्कि उन्हें एक प्रकार से इंसान ही नहीं माना जाता है। उन पर तमाम प्रतिबंध हैं और इन प्रतिबंधों में कक्षा 6 के बाद स्कूल न जाना, रेस्टोरेंट में न जाना, अधिकतर नौकरियों से प्रतिबंधित, घर के ही किसी पुरुष के साथ ही बाहर जाना, खिड़की से न झांकना, ब्यूटी पार्लर बंद करना आदि जैसे कदम शामिल हैं।

महिला बचावकर्मियों की अनुपस्थिति

अफगानिस्तान में महिलाओं को पूरी तरह से कैद कर दिया गया है। वे परिवार से बाहर के आदमियों को स्पर्श नहीं कर सकती हैं। एक न्यूयॉर्क टाइम्स के मजार दरा क्षेत्र में भूकंप के एक दिन बाद पहुँचने पर पता चला कि पीड़ितों को बचाने वाली चिकित्सीय टीम में कोई भी महिला नहीं थी। और एक जिला अस्पताल में कोई भी महिला स्वास्थ्य कर्मी नहीं थी।

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

इस समाचार को लेकर सोशल मीडिया पर भी लोग अचरज व्यक्त कर रहे हैं कि क्या कहीं ऐसा भी हो सकता है कि मरती हुई महिलाओं को केवल इसलिए बचाया न जाए क्योंकि महिला बचावकर्मी नहीं हैं? इसे लेकर बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने निशाना साधा है और उन्होनें एक्स पर पोस्ट लिखा कि अफगानिस्तान में भूकंप के मलबे के नीचे दबकर मरने वाली महिलाओं का कातिल और कोई नहीं बल्कि इस्लाम है।

तस्लीमा नसरीन का पोस्ट देखें

In Afghanistan, Islam is directly responsible for the deaths of women. After the devastating earthquake, women trapped under the rubble were left to die. Rescue teams refused to touch or even look at them—because Islam forbids unrelated men from seeing or touching women. And…

— taslima nasreen (@taslimanasreen) September 5, 2025

महिलाओं के अधिकारों पर हमला

उन्होनें आगे लिखा कि घायल महिलाओं के पास उस समय भी विकल्प नहीं था, क्योंकि उन्हें मलबे से बाहर निकालने के लिए कोई भी बचावकर्मी नहीं थी और न ही उनका इलाज करने के लिए महिला डॉक्टर। क्योंकि तालिबान ने इस्लाम का पालन करते हुए महिलाओं को चिकित्सीय शिक्षा से बाहर कर दिया है और उन्हें शिक्षा से दूर कर दिया है।

अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति

अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति क्या है, यह इस घटना से पता चलता है, मगर फिर भी यह दुर्भाग्य है कि इस विषय में बात ही नहीं होती है कि आखिर अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ हो क्या रहा है?

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