साल दर साल, आलोचक अपनी विकृत समझ के आधार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), उसके विचारों और उसकी विचारधारा को लेकर झूठे और मनगढ़ंत आख्यान गढ़ते आए हैं। वे संघ को “विभाजनकारी”, “सांप्रदायिक”, “सांप्रदायिकतावादी”, “आदिम”, “कट्टर” और “पिछड़ा” बताते हैं। यह रटा–रटाया कोरस प्रायः ड्रॉइंग–रूम के बुद्धिजीवियों और संपादकीय मंडलों द्वारा और भी ज़ोर से गूंजाया जाता है, जो संघ को केवल पूर्वाग्रह की दृष्टि से देखते हैं।
लेकिन सत्य का अपना एक धर्म होता है। कोई भी प्रोपेगेंडा उसे हमेशा के लिए दफना नहीं सकता। दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय जनसंपर्क कार्यक्रम ‘100 वर्ष संघ के – नए क्षितिज’ में, सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मिथकों को वास्तविकता से, कल्पना को तथ्य से अलग करते हुए संघ के दर्शन, उसके मिशन, उसकी यात्रा और सबसे बढ़कर भारत को एक सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में देखने की उसकी अटूट प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया — एक ऐसा राष्ट्र जो सनातन धर्म में निहित, सांस्कृतिक एकता से पोषित है और वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श से प्रेरित है।
झूठे आरोपों से परे : संघ का वास्तविक स्वरूप
दशकों से विरोधियों ने संघ को “बहिष्कारी हिंदू उग्रवादी शक्ति” के रूप में पेश किया है। लेकिन भागवत जी के संबोधन ने राष्ट्र को याद दिलाया कि आरएसएस भारत को केंद्र में रखकर बना था, किसी सांप्रदायिक परियोजना के रूप में नहीं। उसका लक्ष्य
ऐसे जागरूक, अनुशासित और निःस्वार्थ व्यक्तियों के निर्माण करना है जिन्हें स्वयंसेवक कहा जाता है — जो अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए जीते हैं।
उन्होंने रेखांकित किया कि जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का अस्तित्व है, चाहे हम उसे मानें या न मानें, उसी प्रकार धर्म का भी अस्तित्व है — एक सनातन, सार्वभौमिक सिद्धांत जो जीवन, न्याय और व्यवस्था को कायम रखता है। हिंदू धर्म — समावेशी, मानवीय और मुक्तिदायक — संघ के लिए यही वैश्विक शांति का मार्ग है। आज के युद्ध, हिंसा, पर्यावरणीय संकट और नैतिक दिवालियापन से भरे विश्व में इससे अधिक प्रासंगिक और क्या हो सकता है?
संघ, जिसे अक्सर “पिछड़ा” कहा जाता है, वस्तुतः सबसे प्रगतिशील एजेंडे की परिकल्पना करता है – वोह भारत की सभ्यतागत बुद्धि से निर्देशित एक संतुलित और सामंजस्यपूर्ण वैश्विक व्यवस्था है।
संघ का राष्ट्रीयत्व : गलतफहमियों से परे
आलोचकों पर प्रहार करते हुए भागवत जी ने स्पष्ट किया: संघ का राष्ट्रवाद वर्चस्व या विजय का नहीं, बल्कि स्व का है। स्वदेशी, स्वधर्म, स्वराज — ये कोई संकीर्ण आग्रह नहीं हैं, बल्कि गरिमा, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के आह्वान हैं।
संघ कभी “दूसरे” से घृणा करने का नाम नहीं रहा। वह तो भारत के बिखरे हुए स्वरूप को एक करने का प्रयास रहा है। जातीय विभाजनों से लेकर भाषाई प्रतिद्वंद्विताओं तक, क्षेत्रीय दरारों से लेकर औपनिवेशिक मानसिक गुलामी तक — संघ का सौ साल का कार्य इस विविधता को एक जीवंत राष्ट्र के सूत्र में पिरोने का रहा है।
इसीलिए संघ का कोई घृणा–पत्रक नहीं है। उसका ध्येय है चरित्र निर्माण, सामाजिक सेवा और राष्ट्र पुनर्निर्माण। उसके लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन इसको जीते हैं — चाहे बाढ़ राहत हो, ग्रामीण उत्थान, शैक्षिक पहल, या समाज की चुपचाप सिलाई–बुनाई।
भागवत ने याद दिलाया कि भारत अखंड (अविभाज्य) और अपने सार में हिंदू राष्ट्र है। उन्होंने कहा, “हमारे पूर्वज, हमारी संस्कृति और हमारी मातृभूमि हमें जोड़ते हैं। अखंड भारत राजनीति भर नहीं, बल्कि जनचेतना की एकता है। जब यह भावना जागृत होती है तो शांति और समृद्धि अपने आप आती है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ कभी किसी का विरोधी नहीं रहा। “पूजा–पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी पहचान एक ही है। धर्म बदलने से समुदाय नहीं बदलता।”
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और व्यवस्था
भागवत जी ने केवल दर्शन की ही बात नहीं की, बल्कि अर्थनीति और वैश्वीकरण पर भी संघ की स्थिति रखी। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार हमारे ही शर्तों पर होना चाहिए, बाहरी दबाव में नहीं। भारत को पश्चिमी कंपनियों या सामरिक हितों का दास नहीं बनना चाहिए।
यह संरक्षणवाद नहीं, बल्कि आर्थिक संप्रभुता का आह्वान है। ऐसा वैश्वीकरण जो संसाधनों को लूटे, स्थानीय उद्योगों को रौंदे और मानसिक गुलामी पैदा करे, स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारत को दुनिया से ताक़त, आत्मसम्मान और न्यायसंगत शर्तों पर जुड़ना होगा।
आज जब पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ महंगाई, आपूर्ति–श्रृंखला संकट और ऊर्जा युद्धों से जूझ रही हैं, तब आत्मनिर्भरता पर आधारित भारत की धार्मिक–संतुलित अर्थनीति एक मानवीय और स्थिर विकल्प प्रस्तुत करती है।
सभ्यतागत दृष्टि से संघ
विश्व व्यवस्था उथल–पुथल में है। उदारवाद अपनी पाखंडता से चरमरा रहा है, साम्यवाद अमानवीय मशीन साबित हुआ है, और उग्र बहुसंख्यक राष्ट्रवाद समाजों को तोड़ रहा है। ऐसे में संघ की सभ्यतागत दृष्टि का महत्व और बढ़ जाता है।
भागवत जी के लिए हिंदू जीवन–दृष्टि कोई विचारधारा नहीं, बल्कि जीने का ढंग है — विविधता का सम्मान करते हुए एकता की खोज, अधिकारों को कर्तव्यों से संतुलित करना, भौतिक प्रगति को आध्यात्मिक संतोष से जोड़ना।
संघ का आग्रह है कि भारत का उदय पश्चिमी साम्राज्यवादी घमंड की नकल न होकर, सभ्यतागत संतुलन की वापसी हो। इसीलिए, भारत की नेतृत्वकारी भूमिका जताते हुए भी संघ वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को गले लगाता है।
भागवत जी ने यह भी कहा कि संघ कभी सामाजिक आंदोलनों के लिए अलग झंडा नहीं उठाता, बल्कि स्वयंसेवकों को अच्छे कार्यों में योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की कोई अधीनस्थ संस्था नहीं है। सभी संगठन स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं। कभी–कभी मतभेद दिखाई दे सकते हैं, यहाँ तक कि भाजपा के साथ भी, लेकिन वे “सत्य की खोज में स्वस्थ संघर्ष” होते हैं। “मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं। यही विश्वास सबको एक ही लक्ष्य तक ले जाता है।”
मिथक मिट जाएंगे
जब डॉ. भागवत बोलते हैं, तो वे किसी राजनेता की तरह नारे नहीं गढ़ते। वे शताब्दी–पुरानी सांस्कृतिक शक्ति के संरक्षक के रूप में बोलते हैं। उनके शब्द अनुशासन, सेवा और दैनिक शाखाओं की जीवंत साधना से निकली हुई प्रामाणिकता लिए होते हैं।
आलोचक चाहे चीखते रहें, लेकिन उनकी आवाज़ पर्वत के सामने हवा जैसी है। संघ को चिल्लाने की आवश्यकता नहीं, वह अपने आदर्शों को जीकर दिखाता है। जैसे–जैसे भारत सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ रहा है, इस मौन लेकिन विराट शक्ति की भूमिका से इनकार करना कठिन होता जा रहा है।
भागवत जी ने याद दिलाया कि यहाँ तक कि वे नेता भी जो कभी संघ के विरोधी रहे — जैसे जयप्रकाश नारायण और डॉ. प्रणब मुखर्जी — अंततः राष्ट्र–निर्माण में उसकी भूमिका को स्वीकार करने लगे। उन्होंने कहा, “अच्छे काम के लिए सहायता मांगी जाए तो हम सहयोग देते हैं। यदि बाधा आती है तो हम आदरपूर्वक हट जाते हैं। संघ का उद्देश्य प्रभुत्व नहीं, केवल सेवा है।”
अनुकूलन पर भागवत ने समझाया कि संघ समय के साथ बदलता है, लेकिन तीन सत्यों पर दृढ़ है: व्यक्तिगत चरित्र–निर्माण से समाज में परिवर्तन संभव है, समाज का संगठन हर अन्य रूपांतरण का मार्ग है, और भारत एक हिंदू राष्ट्र है। “इन तीन के अलावा हर चीज़ बदल सकती है।”
आरएसएस अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की धड़कन है। और जैसा कि विज्ञान भवन में डॉ. भागवत ने याद दिलाया, यह यात्रा बहिष्कार की नहीं, बल्कि भारत द्वारा मानवता को धर्म, गरिमा और शांति की ओर ले जाने की है।
(लेखक वरिष्ठ मल्टीमीडिया पत्रकार हैं।)

















