पाकिस्तान की एक और हार : SCO सम्मेलन में भारत की कूटनीतिक जीत, ट्रेड और टेरर साथ नहीं चल सकते
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पाकिस्तान की एक और हार : SCO सम्मेलन में भारत की कूटनीतिक जीत, ट्रेड और टेरर साथ नहीं चल सकते

31 अगस्त और 1 सितंबर को चीन के तियानजिन में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण नतीजा भारत-चीन संबंधों को नया रूप देना है।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत) — edited by Sudhir Kumar Pandey
Sep 4, 2025, 04:59 pm IST
inभारत, विश्लेषण
एससीओ शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

एससीओ शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

31 अगस्त और 1 सितंबर को चीन के तियानजिन में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण नतीजा भारत-चीन संबंधों को नया रूप देना है। जून 2020 की गलवान झड़पों के बाद भारत-चीन संबंध एक खराब दौर से गुजरे। पिछले साल के उत्तरार्ध में पूर्वी लद्दाख में सीमा विवाद में दोनों पक्षों के सैनिकों को चरणबद्ध तरीके से पीछे हटने का फैसला हुआ।

एससीओ सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि दोनों देशों के लिए दोस्त बनना ‘सही विकल्प’ है। भारत और चीन सहयोगी साझेदार हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं। दोनों देश एक-दूसरे के लिए खतरा नहीं बल्कि एक-दूसरे के विकास के अवसर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि 2.8 अरब लोगों का कल्याण भारत और चीन के बीच सहयोग से जुड़ा है।

भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानों की बहाली और कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसे विश्वास निर्माण के कई उपायों (Confidence Building Measures, सीबीएम) की भी घोषणा की गई। दोनों पक्षों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा वार्ता भी जारी है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग ने सीमा विवाद के निष्पक्ष, तार्किक और परस्पर स्वीकार्य समाधान की दिशा में काम करने का संकल्प लिया। यह भी महत्वपूर्ण है कि दोनों नेताओं ने वैश्विक व्यापार को स्थायित्व देने की दिशा में काम करने का भी संकल्प लिया।

लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य से सबसे महत्वपूर्ण परिणाम तियानजिन शिखर सम्मेलन से आधिकारिक घोषणा के रूप में आया। इसमें 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई और भारत के इस रुख से सहमति जताई कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ‘दोहरा मापदंड’ अस्वीकार्य है। घोषणापत्र में क्षेत्रीय सुरक्षा बढ़ाने के तरीकों का उल्लेख किया गया और आतंकवाद से मुकाबला करने को एक बड़ी चुनौती के रूप में पहचाना गया।

एससीओ शिखर सम्मेलन की आधिकारिक घोषणा में पहलगाम आतंकी हमले को शामिल करना भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। 25-26 जून को उसी चीन में एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान, पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख करने के लिए एकमत नहीं बना था। इस प्रकार, भारतीय कूटनीति और पीएम मोदी ने पिछले दो महीनों में पर्दे के पीछे काम किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एससीओ मुख्य एजेंडे के रूप में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए खुद को फिर से संगठित करे।

यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि पाकिस्तान को भारतीय दृष्टिकोण से सहमत कराना चीन के मुश्किल रहा होगा। चीन के लिए पहलगाम आतंकी हमले को लेकर पाकिस्तान के विरोध को नजरअंदाज करना भी मुश्किल रहा होगा। भारत 7-10 मई तक चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने में चीन द्वारा निभाई गई सक्रिय भूमिका को भी जानता है। चीन को यह भी एहसास हुआ होगा कि पाकिस्तान को दिए गए उसके हथियार और उपकरण ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय हमले के सामने फीके पड़े। वास्तव में, भारत ने 50 से भी कम सटीक मिसाइल हमलों के साथ पाकिस्तान की सेना को घुटने पर ला दिया।

चीन ने पूर्वी लद्दाख में अपने अनुभव से यह भी सीखा है कि भारत एक शक्तिशाली सैन्य शक्ति है। पिछले पांच वर्षों में, भारत ने पूर्वी लद्दाख में चीन पर सैन्य और नैतिक दोनों प्रभुत्व बनाए रखा है। हमारे सैनिकों ने अत्यधिक ठंड की स्थिति का सामना बखूबी किया है और पूर्वी लद्दाख की ऊंचाइयों पर हावी रहे। चीनी पक्ष में, सैनिकों के बीच High Altitude Sickness की खबरें आई हैं। चीन को High Altitude Sickness से बचने के लिए अपने सैनिकों को जल्दी से बदलने के लिए विवश किया गया है। इस दौरान भारत ने एलएसी पर उच्च गुणवत्ता वाला बुनियादी ढांचा भी विकसित किया है।

इन सभी घटनाक्रमों ने चीन को यह एहसास दिलाया है कि भारत के साथ सैन्य संघर्ष केवल उसको नुकसान पहुंचा सकता है। चीन ने पाकिस्तान को सैन्य मदद दी है और पाकिस्तान का लगभग 80% सैन्य हार्डवेयर चीनी मूल का है। चीन भी अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के माध्यम से पाकिस्तान में भारी निवेश कर रहा है। लेकिन चीन इस बात को अच्छी तरह समझता है कि वह अब पाकिस्तान को भारत के खिलाफ मोहरे के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता। चीन को एहसास हो गया होगा कि पाकिस्तान एक बोझ बनता जा रहा है और इस तरह भारत के साथ संबंधों में एक नई शुरुआत करनी चाहिए। यह संभव है की ट्रम्प के टैरिफ ने भारत और चीन के बीच दोस्ती को तेज करने के लिए उत्प्रेरक के रूप में काम किया हो।

कई विश्लेषकों ने चीन के साथ भारत के संबंधों को फिर से स्थापित करने में सावधानी बरतने का सुझाव दिया है। चीन के साथ हमारे पिछले अनुभव के आधार पर यह सोचना सही है। लेकिन वैश्विक भू-राजनीति में इतना बड़ा बदलाव आया है कि एक कड़वा अतीत भी आगे आने वाले समय का मार्ग नहीं दिखा सकता है। आज की लेन-देन की दुनिया में, देशों के बीच का अर्थशास्त्र ज्यादा मायने रखता है। लेकिन शुरुआत में सावधानी बरतनी होगी। हमारी कूटनीति और हमारे योजनाकारों को चीन के साथ संबंधों को और बेहतर बनाने के लिए अल्पकालिक लक्ष्यों पर निर्णय लेना चाहिए।

इस संबंध में, मैं चीन के साथ संबंधों को बेहतर बनाने और विश्वास कारक (Trust Factor) को आगे बढ़ाने के लक्ष्यों का सुझाव दूंगा। हमारे लक्ष्य समयबद्ध होने चाहिए और शुरू में एक समय में एक वर्ष के लिए हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम 2026 के वर्ष को पूर्वी लद्दाख में 2020 की यथास्थिति पर लौटने के लिए निर्धारित कर सकते हैं। अगले एक साल में हम चीन के साथ व्यापार घाटे को 10 प्रतिशत तक कम करने पर विचार कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इस बात पर नजर रख सकते हैं कि चीन पाकिस्तान को कैसे हथियार मुहैया कराता है और आतंकवाद के प्रायोजक के रूप में वह पाकिस्तान को कैसे नियंत्रित करता है।

चीन के साथ संबंधों को फिर से स्थापित करने का वर्णन करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे पाकिस्तान के खिलाफ एक बीमा पॉलिसी के रूप में देखा जाए। चोरी, चोट, मृत्यु, क्षति, दुर्घटना आदि की भरपाई के लिए हम एक बार में एक साल के लिए बीमा पॉलिसी लेते हैं। चीन के साथ हमारे संबंधों में भी पाकिस्तान के खिलाफ उसी समान बीमा प्रावधान होना चाहिए। अगर पाकिस्तान शांति से रहता है और अगले एक साल तक भारत के खिलाफ आतंकवाद को प्रायोजित नहीं करता है, तो भारत को चीन के साथ नए सिरे से एक साल बीमा पॉलिसी बढ़ा सकता है। चीन के साथ संबंधों को मजबूत करके पाकिस्तान को नियंत्रित करने का यह एक सफल तरीका हो सकता है। भारत व्यापार और आतंक (Trade and Terror) का लाभ उठाकर चीन और पाकिस्तान दोनों के ऊपर जीत की स्थिति हासिल कर सकता है।

Topics: शी जिनपिंगपीएम नरेंद्र मोदीभारत चीन संबंधगलवान झड़पपाकिस्तान की हारएससीओ शिखर सम्मेलन
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