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RSS के 100 वर्ष : संघ की सफलता का रहस्य

किसी भी संगठन के लिए 100 वर्ष की यात्रा बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अनगिनत सफलताओं के साथ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। संघ को यह सौभाग्य उन समर्पित कार्यकर्ताओं के कारण मिला है, जो कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहते। उनका एक ही ध्येय होता है भारत आगे बढ़े

Written byविजय कुमारविजय कुमार — edited by Rajpal Singh Rawat
Sep 3, 2025, 11:23 pm IST
in भारत, संघ @100
उत्तरकाशी के धराली में आई प्राकृतिक आपदा के बाद राहत कार्यों में लगे स्वयंसेवक। ऐसे कार्यकर्ताओं के कारण ही संघ सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है।

उत्तरकाशी के धराली में आई प्राकृतिक आपदा के बाद राहत कार्यों में लगे स्वयंसेवक। ऐसे कार्यकर्ताओं के कारण ही संघ सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है।

समाज जीवन में अनेक संस्थाएं उभरती हैं। अधिकांश धूमकेतु की तरह कुछ साल चमक बिखेर कर खो जाती हैं; पर बड़े उद्देश्य वाली संस्थाओं का कार्यकाल लंबा होता है। यद्यपि समय के साथ उनमें भी दुर्गुण आते हैं। कुर्सी के झगड़े होते हैं। पद पारिवारिक हो जाते हैं और लोग मूल उद्देश्य को भूलकर इन झंझटों में उलझ जाते हैं। कुछ शंकालु कहते हैं कि संघ के साथ भी यही होगा; पर वे भूलते हैं कि डॉ. हेडगेवार ने संघ को संस्था नहीं, संगठन और परिवार का रूप दिया।

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

इसे व्यक्ति की बजाय विचार प्रधान बनाया और पद को महत्व नहीं दिया। इसलिए संघ में दायित्व या जिम्मेदारी शब्द प्रयोग होता है तथा विवाद नहीं होते। यदि डॉ. हेडगेवार से शुरू करें, तो संघ स्थापना (27.9.1925) और नामकरण (17.4.1926) के बाद उन्होंने स्वयं कोई पद नहीं लिया। जब संगठन में अनेक प्रबुद्ध लोग जुड़ गए, तब उन्होंने ही 19 दिसंबर, 1926 को डॉ. हेडगेवार को संघ प्रमुख और तीन साल बाद 10 नवंबर, 1929 को सरसंघचालक घोषित किया। इस पर डॉ. हेडगेवार ने कहा कि आप सबके आदेश पर मैं यह जिम्मेदारी ले रहा हूं।

जब भी आपको मुझसे योग्य व्यक्ति मिले, आप उसे यह जिम्मेदारी दे दें। मैं एक सामान्य स्वयंसेवक की तरह काम करूंगा; और यही हुआ। जंगल सत्याग्रह में जाते समय वे डॉ. परांजपे को सरसंघचालक बना कर गए, जिससे काम न रुके। जब पहली बार व्यास पूर्णिमा पर्व मनाया गया, तब शाखा में बच्चे ही आते थे। उन्होंने समझा कि आज हमें डॉ. हेडगेवार की पूजा करनी है; पर डॉ. जी ने भगवा ध्वज के महत्व को समझाते हुए उसे ही ‘गुरु’ का स्थान दिया। रेशिम बाग (नागपुर) में डॉ. जी की समाधि है। उसका आकार मंदिर जैसा है; पर वहां पूजा, आरती, भोग, प्रसाद आदि नहीं होता। चूंकि संघ में व्यक्ति पूजा का महत्व नहीं है।

द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी अध्यात्म पुरुष थे। उन्हेें पुरी के शंकराचार्य का पद संभालने का प्रस्ताव मिला था; पर उन्होंने संघ मार्ग अपनाया। विभाजन के बाद पंजाब और सिंध से आए हिंदू उन्हें ‘देवता’ मानते थे। स्वयंसेवकों ने अपने प्राण देकर उनकी रक्षा की थी। ऐसे पुरुषार्थी की सभा में जब कोई उनकी जय बोलता था, तो वे नाराज हो जाते थे। 1948 के प्रतिबंध के बाद जब संघ पर बहुत कर्ज हो गया, तो उससे मुक्ति के लिए उनकी 51वीं वर्षगांठ पर धन संग्रह किया गया। श्रीगुरुजी ने बड़ी अनिच्छा से इसे स्वीकृति दी। इस दौरान हुए सम्मान समारोहों में उनके गले में मालाएं डाली जाती थीं। यह उन्हें अच्छा नहीं लगता था।

8 अप्रैल, 1956 को दिल्ली के कार्यक्रम में विश्व भर के पत्रकार उनका चित्र लेने आए थे; पर वे पूरे समय मुंह ढके बैठे रहे। मुंबई से प्रकाशित एक बड़े साप्ताहिक पत्र ने जब देश के अनेक वरिष्ठ जन के ध्येय वाक्य छापे, तो उनका वाक्य ‘मैं नहीं, तू ही’ सबसे छोटा, पर सर्वाधिक प्रेरक था। 1966-67 में गोहत्या बंदी आंदोलन की एक सभा में पूज्य प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के साथ उन्हें भी बोलना था; पर श्रीगुरुजी मंच पर नहीं चढ़े, क्योंकि वहां उनकी जयकार हो रही थी। ब्रह्मचारी जी ने सबको डांटकर भारत माता और गोमाता की जय के नारे लगवाए, तब बात बनी। देहांत से पूर्व 2 अप्रैल, 1973 को लिखे पत्रों में उन्होंने स्पष्ट कहा कि अपना कार्य ध्येयपूजक है, व्यक्तिपूजक नहीं। इसलिए संघ निर्माता के अतिरिक्त किसी अन्य का स्मारक न बनाएं। रेशिम बाग में डॉ. जी की समाधि के सामने उनकी अंत्येष्टि हुई। वहां यज्ञ ज्वालाओं के रूप में उनका छोटा सा स्मृति चिन्ह बना है।

तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस भी इन्हीं विचारों से अनुप्राणित थे। संघ के कार्यक्रमों में डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी के चित्र लगते हैं। 6 जून, 1973 को जब वे सरसंघचालक बने, तो स्वयंसेवक उनका चित्र भी लगाने लगे; पर उन्होंने इसे रुकवा दिया। एक बार उन्होंने कुछ अंतरंग कार्यकर्ताओं से पूछा कि सरसंघचालक की अंत्येष्टि कैसे होनी चाहिए? सबने कहा कि यह रेशिममबाग में अत्यंत भव्यता से होनी चाहिए।

इस पर उन्होंने कहा कि हमें रेशिमबाग को सरसंघचालकों का श्मशान नहीं बनाना। अतः 17 जून, 1996 को देहांत के बाद नागपुर के गंगाबाई श्मशान में उनका अंतिम संस्कार हुआ। संघ में सामान्यतः सरसंघचालक को ‘परम पूज्य’ कहते हैं; पर रज्जू भैया ने 11 मार्च, 1994 को यह जिम्मेदारी मिलने पर अपने पहले ही संबोधन में इसके लिए मना किया। एक बार चर्चा में उन्होंने कहा कि मेरा शरीर जहां शांत हो, वहीं अंत्येष्टि कर देना। 14 जुलाई, 2003 को उनका देहांत पुणे में हुआ और अगले दिन वहीं उनकी अंत्येष्टि की गई।

संघ कार्य में प्रचारक प्रणाली का भी बड़ा योगदान है। यूं तो अधिकांश साधु-संत भी गृहस्थी नहीं बसाते; पर प्रायः वे अपने आश्रम में रहते हैं। जबकि प्रचारक जिस कार्यालय में रहते हैं, उस भवन या न्यास के वे पदाधिकारी नहीं होते। पदाधिकारी स्थानीय कार्यकर्ता होते हैं, जो अपने घरों में रहते हैं। संघ के बैंक खाते भी स्थानीय कार्यकर्ता ही संचालित करते हैं।

प्रचारकों को उनकी योग्यता, क्षमता तथा काम की जरूरत के अनुसार अन्य जिले या प्रांत में भेजा जाता है। इसकी घोषणा होते ही वे कुछ दिन में वहां चले जाते हैं। व्यक्तिपूजा से दूरी का व्यवहार सर्वत्र दिखता है। प्रायः किसी वरिष्ठ प्रचारक के देहांत के बाद उनकी जन्मतिथि, जन्म स्थान, शिक्षा, परिवार आदि के विषय में बहुत कम जानकारी हो पाती है, क्योंकि वे इन चर्चाओं को टालते हैं।

किसी संस्था का मूलाधार उसका उद्देश्य, कार्यक्रम और कार्यकर्ता होते हैं। संघ का उद्देश्य अत्यंत पवित्र है। उसकी पूर्ति के आवश्यक संस्कार शाखा के कार्यक्रमों से मिलते हैं। संघ के कार्यकर्ता जाति, पंथ, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा आदि से ऊपर उठकर काम करते हैं। दुनिया चाहे जो कहे; पर संघ की सफलता का रहस्य यही है।

Topics: विजय कुमारधराली100 years of sangh yatrass 100 yearsप्राकृतिक आपदा में राहत कार्यराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघगोहत्या बंदी आंदोलनश्रीगुरुजीसंघ की सफलता का रहस्यडॉ. हेडगेवारव्यक्तिपूजा से दूरीउत्तरकाशीपाञ्चजन्य विशेषशताब्दी वर्ष
विजय कुमार
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