चीन के तिआनजिन शहर में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन विश्व राजनीति में एक नया मोड़ लाता दिख रहा है। भारत, चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देशों की एकजुटता ने पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका में रणनीतिक रूप से एक खलबली सी पैदा की है जो उस अमेरिकी मीडिया में साफ झलक रही है जिसने आपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिम परस्त एजेंडा चलाते हुए नकारात्मक रिपोर्टिंग की थी। अमेरिकी मीडिया, विशेष रूप से सीएनएन, न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की रिपोर्टिंग से भारत के एक विश्व शक्ति के तौर पर उभरने को लेकर उनकी बेचैनी स्पष्ट रूप से दिखती है।
भारत इस बार तिआनजिन में आयोजित एससीओ सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी कर रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रपति शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के साथ भेंट न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की दिशा में हुई हैं, बल्कि ये एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर संकेत भी करती हैं। भारत ने स्पष्ट किया कि उसके संबंध चीन या रूस के साथ किसी तीसरे देश की दृष्टि से नहीं देखे जाने चाहिए। मोदी और जिनपिंग ने सीमा विवाद, व्यापार घाटे और वैश्विक सहयोग पर चर्चा की, जिससे भारत-चीन संबंधों को नई दिशा मिली। इसी प्रकार मोदी ने रूस के नेता पुतिन से बीच ऊर्जा सहयोग, व्यापार संतुलन और आर्कटिक शेल्फ जैसे मुद्दों पर गंभीर वार्ता की है।

अमेरिकी मीडिया इस सम्मेलन को भारत-अमेरिका संबंधों के परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने भारत को चीन और रूस के खेमे की ओर जाने दिया है। यह ट्रंप प्रशासन पर एक गंभीर आरोप है, क्योंकि भारत पिछले दो दशकों से अमेरिका का रणनीतिक साझेदार रहा है। अमेरिकी मीडिया लिख रहा है कि ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ ने द्विपक्षीय व्यापार को नुकसान पहुंचाया है। रूस से तेल खरीदने पर भारत को अतिरिक्त टैरिफ झेलना पड़ रहा है, जिससे अमेरिका-भारत संबंधों में तनाव आया है।
अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने 25 वर्ष की मेहनत को एक झटके में बर्बाद कर दिया है। एससीओ सम्मेलन में भारत की सक्रियता और अमेरिका की अनुपस्थिति ने एक बड़ा संदेश दिया है कि दुनिया अब केवल पश्चिम के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। चीन, रूस और भारत जैसे देश मिलकर एक नई विश्व व्यवस्था की नींव रख रहे हैं। सम्मेलन में शी जिनपिंग ने स्पष्ट कहा कि अब ताकत केवल पश्चिम के हाथ में नहीं रहेगी। भारत की मौजूदगी ने एससीओ को जी7 और ‘नाटो’ जैसे पश्चिमी संगठनों के समकक्ष बनने की ओर बढ़ाया है। छोटे और मध्यम आकार के देशों की भागीदारी ने इस सम्मेलन को वैश्विक मंच बना दिया है।
अमेरिकी मीडिया की बेचैनी केवल भारत की कूटनीतिक दिशा को लेकर नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक बदलाव की प्रतिक्रिया है जिसमें अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दी गई है। भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए चीन और रूस के साथ सहयोग बढ़ाया है, जो अमेरिका के लिए एक चेतावनी है। अमेरिकी मीडिया का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने भारत को मजबूर किया कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए नए साझेदारों की ओर देखे। एससीओ सम्मेलन ने यह साबित कर दिया कि भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन का निर्णायक खिलाड़ी है।
अमेरिका के बड़े अखबार लिख रहे हैं कि इस बदलते परिदृश्य में अमेरिका को भारत के साथ संबंधों को पुनः परिभाषित करना होगा, अन्यथा वह एशिया में अपनी रणनीतिक पकड़ खो सकता है। भारत ने यह दिखा दिया है कि वह किसी भी खेमे का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र ध्रुव है—जो अपने हितों के अनुसार निर्णय लेने में सक्षम है।

















