घड़ी जो दिखाए मुहूर्त, ऋतु और संस्कृति, जानिए भोपाल की वैदिक घड़ी के पीछे का विज्ञान और दर्शन
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घड़ी जो दिखाए मुहूर्त, ऋतु और संस्कृति, जानिए भोपाल की वैदिक घड़ी के पीछे का विज्ञान और दर्शन

समय की गणना सूर्योदय से सूर्योदय तक की जानी चाहिए, क्योंकि यही हमारी सनातन संस्कृति की परंपरा रही है।"

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Mahak Singh
Sep 1, 2025, 03:11 pm IST
inमध्य प्रदेश
सीएम हाउस के बाहर विक्रमादित्य वैदिक घड़ी लगाई गई

सीएम हाउस के बाहर विक्रमादित्य वैदिक घड़ी लगाई गई

मध्य प्रदेश में विक्रमादित्य वैदिक घड़ी के साथ भारत के समय का सांस्कृतिक पुनर्जागरण “दिन को रात्रि के 12 बजे बदलने का कोई औचित्य नहीं है। समय की गणना सूर्योदय से सूर्योदय तक की जानी चाहिए, क्योंकि यही हमारी सनातन संस्कृति की परंपरा रही है।” मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की यह घोषणा केवल भोपाल स्थित मुख्यमंत्री निवास में स्थापित विक्रमादित्य वैदिक घड़ी के लोकार्पण का क्षण नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन आत्मा को पुनः जागृत करने वाला एक ऐतिहासिक वक्तव्य था। यह पहल हमें याद दिलाती है कि समय की गणना करने की पश्चिमी पद्धति केवल सुविधा का साधन है, जबकि भारत की वैदिक परंपरा समय को जीवन और ब्रह्मांड की धड़कन से जोड़कर देखती रही है।

भारत में समय के हर मुहूर्त की अपनी विशेषता

भारत में समय कभी भी केवल सेकंड और मिनट तक सीमित नहीं रहा है। यहां दिन सूर्योदय से शुरू होता है और 30 मुहूर्तों में विभाजित होता है। हर मुहूर्त की अपनी विशेषता है; ब्रह्ममुहूर्त में साधना और ध्यान, दोपहर का समय कर्म के लिए, संध्या का समय उपासना के लिए। यह विभाजन महज गणना नहीं है, बल्कि जीवन को प्रकृति की लय से जोड़ने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। यही कारण है कि हमारे सभी त्यौहार अंग्रेजी कैलेंडर पर आधारित न होकर चंद्र-सौर गणना और नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होते हैं।

यदि भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति के इतिहास में झांके तो ध्‍यान में आता है कि उज्जैन को कालगणना का केन्द्र वर्षों वर्ष तक माना गया। सूर्य की छाया से समय की माप यहीं से होती रही। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कहते हैं कि ने सही कहा कि समय के साथ यह केन्द्र डोंगला की ओर स्थानांतरित हुआ और वहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं बलराम और सुदामा के साथ आए थे। यह केवल पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि समय की खोज भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। काल को देवता मानकर पूजना, महाकाल की संज्ञा देना और गीता में भगवान कृष्ण का स्वयं को काल कहना, यह सब बताता है कि समय को भारत ने केवल यांत्रिक गति नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की नियंता शक्ति के रूप में देखा।

विक्रमादित्य वैदिक घड़ी देती है हिंदू माह, तिथि और ऋतु का भी संकेत

भोपाल में स्थापित विक्रमादित्य वैदिक घड़ी इसी दृष्टि का आधुनिक रूप है। यह केवल घंटे और मिनट नहीं दिखाती, बल्कि हिंदू माह, तिथि और ऋतु का भी संकेत देती है। यह बताती है कि समय केवल वर्तमान को मापने का साधन नहीं, बल्कि अतीत और भविष्य से जोड़ने का सेतु है। इसके साथ लॉन्च किया गया मोबाइल ऐप इस परंपरा को युवाओं के हाथों तक पहुँचाता है। तकनीक और परंपरा का यह संगम ही सांस्कृतिक पुनर्जागरण की सच्ची दिशा है।

भारतीय खगोल और गणित के उस वैभव का यह है प्रमाण

डॉ. यादव ने अपने भाषण में कहा कि 10 हजार वर्ष पहले के सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की सटीक गणना हमारी वैदिक पद्धति कर सकती है, जबकि आधुनिक कंप्यूटर भी इसमें असमर्थ हैं। यह कोई भावनात्मक कथन नहीं, भारतीय खगोल और गणित के उस वैभव का प्रमाण है जिसने शून्य से लेकर ग्रहणों तक की भविष्यवाणी की। सावन के महीने में वर्षा का होना और छाता लेकर चलने की परंपरा इसी अनुभवजन्य विज्ञान का परिणाम है।

भारत की अवधारणा में समय केवल घड़ी की सुइयों की चाल नहीं, बल्कि ‘काल’ है। महाभारत में भीष्म पितामह ने कहा, “कालो हि दुरतिक्रमः” काल को कोई पार नहीं कर सकता। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा, “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः।” इस दृष्टि से विक्रमादित्य वैदिक घड़ी केवल उपकरण नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का दर्पण है।

अब पूर्व का समय आया है

आज की दुनिया उत्पादन, उपभोग और मशीनों की गति से संचालित हो रही है। पश्चिमी समय अवधारणा इसी मानसिकता की उपज है। लेकिन जब मानसिक तनाव, पर्यावरण संकट और जीवन का असंतुलन बढ़ रहा है, तब भारत का वैदिक दृष्टिकोण ही वास्तविक समाधान प्रस्तुत कर सकता है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि “पश्चिम का समय जब तक था, तब तक था, अब पूर्व का समय आया है।” 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग को विश्व स्तर पर स्थापित किया। योग ने दुनिया को सिखाया कि जीवन का संतुलन केवल शरीर और मन के सामंजस्य से ही संभव है। अब वैदिक समय की पुनर्स्थापना यह संदेश दे रही है कि समय का सही अर्थ केवल उत्पादन या उपभोग नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति का सामंजस्य है। यही भारत का समय है, और यही पृथ्वी का समय।

भारत की आत्मा का प्रतीक है ये वैदिक घड़ी

इस आयोजन में मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के वक्तव्य भी इस सांस्कृतिक प्रवाह को पुष्ट करते हैं। मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि यदि यह घड़ी मंत्रियों को दी जाए तो वे इसे अपने घरों में स्थापित करेंगे। मंत्री कृष्णा गौर ने कहा कि मुख्यमंत्री निवास अब विरासत और विकास का साक्षी बन गया है और इस घड़ी ने हमें अपना स्वाभिमान लौटा दिया है। सांसद आलोक शर्मा ने इसे भारत के समय की पुनर्परिभाषा बताया। उज्जैन से आए 51 ब्राह्मणों की उपस्थिति ने इस आयोजन को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आध्यात्मिकता का रंग भी प्रदान किया। सच्चाई यह है कि यह घड़ी केवल भोपाल के मुख्यमंत्री निवास की शोभा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाती है कि समय केवल बीतता हुआ क्षण नहीं, बल्कि संस्कृति का संवाहक और जीवन का आधार है। जब यह घड़ी कहती है कि “भारत का समय ही पृथ्वी का समय है”, तो यह उद्घोष केवल भावनात्मक नहीं, वास्‍वत में उस गहन ज्ञान का प्रमाण है जिसने भारत को युगों-युगों तक विश्वगुरु बनाया।

कहना होगा कि आज आवश्यकता है कि युवा इस परंपरा को समझें और अपनाएँ। जब वे जानेंगे कि समय को केवल सेकंडों और मिनटों में नहीं, बल्कि मुहूर्तों, तिथियों और ऋतुचक्र में भी देखा जा सकता है, तब वे अपनी जड़ों से जुड़ेंगे और विश्व को दिशा देंगे। विक्रमादित्य वैदिक घड़ी इसी दिशा में भारत का पहला सशक्त कदम है।

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