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‘हिंदू धर्म नहीं, जीवन जीने की शैली है’

शिमला में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के अभ्युदय अध्ययन मंडल द्वारा ‘भारत की भारतीय अवधारणा’ विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 1, 2025, 09:43 am IST
inसंघ @100, हिमाचल प्रदेश
गोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ. मनमोहन वैद्य। साथ में हैं प्रो. वीर सिंह रांगड़ा

गोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ. मनमोहन वैद्य। साथ में हैं प्रो. वीर सिंह रांगड़ा

गत दिनों शिमला में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के अभ्युदय अध्ययन मंडल द्वारा ‘भारत की भारतीय अवधारणा’ विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। इसे संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि अंग्रेजों ने भाषा और मौलिकता के आधार पर भारत के अनेक भागों को विभाजित किया और इसी कारण ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ जैसे दो नाम प्रचलित हुए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दशकों बाद भी यह प्रश्न खड़ा है कि राष्ट्र की उन्नति हेतु हमें किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। उन्होंने एक यूरोपीय लेखक की पुस्तक ‘हू आर वी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि हम कौन हैं, हमारी जड़ें कहां हैं और हमारे पूर्वज कौन हैं। ‘एकम् सद् विप्राः बहुधा वदंति’ अर्थात् सत्य एक है, परंतु ज्ञानीजन उसे अनेक रूपों में बताते हैं।

भारत की आत्मा ही उसकी ‘विविधता में एकता’ है, प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ईश्वर (आत्मा) का निवास है। अपने अंदर के देवत्व को जाग्रत करने के लिए चार योग मार्ग बताए गए हैं–कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग और ज्ञानयोग। धर्म का अर्थ ‘रिलीजन’ नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक व्यापक पद्धति है। हिंदू कोई संकीर्ण धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक मार्ग है।

अंग्रेजों ने भारत में शासन के लिए भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) बनाई थी, जिसका उद्देश्य भारतीयों को दंडित करना था, किंतु अब भारतीय न्याय संहिता (बी.एन.एस.) लागू की गई है, जिसका उद्देश्य है प्रत्येक नागरिक को न्याय दिलाना। हमारी बोलचाल में प्रयुक्त ‘हिंदुइज्म’, ‘सिखिज्म’ जैसे शब्द पश्चिमी अवधारणा के परिणाम हैं, जिन्हें षड्यंत्रपूर्वक वामपंथी एवं संस्कृति-विरोधी शक्तियों ने बढ़ावा दिया। शब्दों का चयन भी अत्यंत सावधानी से होना चाहिए, क्योंकि भाषा समाज की दिशा तय करती है।

संगोष्ठी में शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से प्रश्न पूछे और विचार साझा किए। इस अवसर पर प्रांत संघचालक प्रो. वीर सिंह रांगड़ा भी उपस्थित रहे।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघडॉ. मनमोहन वैद्यविविधता में एकताराष्ट्र की उन्नतिहिंदुइज्मसिखिज्म
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