‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-
प्रश्न-
हम सरकार के साथ अच्छा तालमेल क्यों नहीं बना पा रहे हैं? वर्तमान केंद्र सरकार और संघ के मिलते-जुलते विषय और मतभेद के मुद्दे क्या हैं?
भाजपा के व्यापक विस्तार और उसके चलते बनी अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए क्या संघ-भाजपा संबंधों की समीक्षा कर उन्हें पुनः निर्धारित करने का समय आ गया है?
हर जगह यह बात होती है कि भाजपा का अध्यक्ष, रोडमैप सब कुछ संघ तैयार करता है। क्या यह सच है?
उत्तर-
हमारा हर सरकार के साथ अच्छा तालमेल है, वर्तमान सरकार के साथ ही नहीं, बल्कि राज्य स्तर से लेकर केंद्र स्तर तक। लेकिन कुछ व्यवस्थाओं में आंतरिक विरोधाभास हैं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, हमारी वर्तमान व्यवस्था मूल रूप से वही है, जिसे ब्रिटिशों ने भारत पर शासन करने के लिए बनाया था। जब तक इसमें नए प्रयोग और नवाचार नहीं होंगे, तब तक कोई मूलभूत बदलाव संभव नहीं है।
भले ही कोई अधिकारी या पदासीन व्यक्ति पूरी तरह हमारे पक्ष में क्यों न हो, फिर भी उसे इसी व्यवस्था के भीतर काम करना पड़ता है व बाधाओं का सामना करना पड़ता है। कभी वह सफल हो भी सकता है, कभी नहीं। इसलिए हमें उसे यह स्वतंत्रता देनी होगी।
तीसरी बात यह है कि प्रचलित व्यवस्था, जिसे हम दुनियादारी की रीति कहते हैं, अपने आप में विरोधाभास पैदा करती है। उदाहरण के लिए, एक ओर मजदूर संघ है और दूसरी ओर लघु उद्योग संगठन।
वर्तमान जीवन-प्रणाली में ये स्वाभाविक रूप से आमने-सामने आ जाते हैं। यही तो है अस्तित्व के लिए संघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता। इसलिए संघर्ष तो होना ही है। कुछ विचारधाराएं तो यहां तक मानती हैं कि प्रगति केवल संघर्ष के माध्यम से ही संभव है। इस प्रकार, जान-बूझकर या अनजाने में, चाहकर या न चाहकर, हम सब उसी व्यवस्था का हिस्सा बने रहते हैं। इसलिए मजदूर संगठन, लघु उद्योग संगठन, सरकार और राजनीतिक दल—इन चारों का एकमत होना आवश्यक है। लेकिन ऐसा होना बहुत दुर्लभ है। और जब हम कहते हैं कि ‘हमें समझौता करना चाहिए’, तो सामने से सवाल उठता है—क्यों हम समझौता करें? क्यों न आप करें?
आप सब अपने-अपने तरीके से प्रयोग कीजिए। अगर आपको इच्छित परिणाम मिलता है, तो उसे सब स्वीकार करेंगे। हमें अपने स्वयंसेवकों पर विश्वास है, वे ईमानदारी से काम करते हैं। वे किसी ‘वाद’ में विश्वास नहीं रखते। हर कार्य के पीछे कोई न कोई विचार अवश्य होता है, लेकिन वह किसी जड़ ‘वाद’ से बंधा नहीं होता। उस विचार को व्यावहारिक रूप से परखना जरूरी है और जो भी विचार या तरीका परिणाम देता है, वही स्वीकार किया जाना चाहिए। तो जब स्थिति ऐसी होती है, तब वास्तव में कोई टकराव नहीं होता। देखने में ऐसा लगता है मानो दोनों आमने-सामने हैं। असल में तो वे सत्य को स्थापित करने का प्रयास कर रहे होते हैं। उसमें स्वाभाविक रूप से थोड़ा संघर्ष शामिल हो जाता है, लेकिन झगड़ा नहीं होता।
उदाहरण के लिए, रेल यार्ड में अगर एक रेल को यहां से वहां, इस ओर से उस ओर ले जाना हो, तो वह कभी सीधी नहीं जाएगी, क्योंकि वहां कई पटरियां होती हैं और जिसमें तरह-तरह की बाधाएं होती हैं। फिर भी यह निश्चित है कि रेल अंततः अपने गंतव्य तक पहुंच ही जाएगी। इसी प्रकार, लक्ष्य तो एक ही है-देश का कल्याण व लोगों की भलाई। यदि यह समझ बनी रहती है तो समन्वय स्वयं स्थापित हो जाता है।
मतभिन्नता भी हो सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि मैं और दत्ताजी हर विषय पर एक ही तरह सोचें। लेकिन हम चर्चा करते हैं, फिर सामूहिक सहमति बनाते हैं और जो भी निर्णय सामूहिक रूप से लिया जाता है, चाहे वह मेरी राय के अनुसार हो या उसके विपरीत, मैं उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करता हूं। यह कहना कि ‘सब कुछ’ संघ तय करता है, यह पूर्णत: गलत है। मैं 50-60 वर्ष से शाखा चला रहा हूं, तो शाखा के बारे में मुझे अनुभव व विशेषज्ञता है। लेकिन राज्य चलाने का कार्य वर्षों से जो कर रहे हैं, उसी क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता है। उनकी विशेषज्ञता मैं मानता हूं और मेरी विशेषज्ञता वे मानते हैं। परंतु निर्णय का अधिकार उसी के क्षेत्र में है। शासन संभालने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है, न हम वह लेना चाहते हैं।

















