मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को लगाई फटकार: मंदिर का पैसा सिर्फ भगवान का
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मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को लगाई फटकार: मंदिर का पैसा सिर्फ भगवान का

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को मंदिरों के पैसे से शादी हॉल बनाने के फैसले पर झटका दिया। कोर्ट ने कहा, मंदिर का पैसा सिर्फ धार्मिक कार्यों के लिए है।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Aug 30, 2025, 09:09 am IST
inतमिलनाडु
Madras high court changing home into prayer place

मद्रास हाई कोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को तगड़ा झटका देते हुए मंदिरों के पैसे के इस्तेमाल पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि मंदिर का पैसा और संपत्ति सिर्फ भगवान की है, न सरकार की, न जनता की। ये बात तब सामने आई, जब सरकार ने मंदिरों के फंड से शादी हॉल बनाने का प्लान बनाया था। कोर्ट ने इसे गैरकानूनी और असंवैधानिक बताकर सरकार के आदेशों को रद्द कर दिया। ये मामला भक्तों की आस्था और मंदिरों की दौलत के गलत इस्तेमाल का गंभीर सवाल खड़ा करता है।

क्या है पूरा माजरा?

तमिलनाडु सरकार ने 2023 से 2025 के बीच पांच सरकारी आदेश (जीओ) जारी किए थे। इनमें मंदिरों के पैसे से शादी हॉल बनाने की बात थी। सरकार का कहना था कि हिंदू शादी एक धार्मिक काम है, तो मंदिर के पैसे से हॉल बनाना ठीक है। इन हॉल को किराए पर देने का इरादा था, ताकि लोग सस्ते में शादी के लिए जगह पा सकें। सरकार ने 27 मंदिरों में 80 करोड़ रुपये की लागत से हॉल बनाने का ऐलान किया था, जिनमें पलानी का मशहूर अरुलमिगु धनदायुधपानी मंदिर भी शामिल था।

कोर्ट में चुनौती और याचिका

बात तब कोर्ट तक पहुंची, जब कार्यकर्ता रमा रविकुमार ने इन आदेशों के खिलाफ याचिका दायर की। उनका कहना था कि मंदिर का पैसा सिर्फ धार्मिक कामों, जैसे पूजा-पाठ, त्योहार, मंदिरों की देखभाल और गरीबों की मदद के लिए है। शादी हॉल बनाना तो बिजनेस जैसा काम है, जो हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (एचआरएंडसीई) एक्ट, 1959 के खिलाफ है। याचिका में ये भी कहा गया कि कई हॉल मंदिरों से सैकड़ों किलोमीटर दूर बनने थे, जिससे भक्तों को कोई फायदा नहीं होता और मंदिर की जगह का गलत इस्तेमाल होता।

इसे भी पढ़ें: मजनू का टीला से नहीं हटाए जाएंगे पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी, सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश

हाईकोर्ट का फैसला

मदुरै बेंच के जज एस.एम. सुब्रमण्यम और जी. अरुल मुरुगन ने 19 अगस्त 2025 को ये बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि मंदिर का पैसा और संपत्ति “देवता” की है, जिसे कानून में नाबालिग माना जाता है। इसलिए कोर्ट का फर्ज है कि वो इसकी हिफाजत करे। सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि शादी धार्मिक काम है। कोर्ट ने कहा कि भले शादी पवित्र बंधन हो, लेकिन इसे धार्मिक उद्देश्य नहीं माना जा सकता। हॉल को किराए पर देना बिजनेस है, जिसमें दान का जज्बा नहीं। कोर्ट ने ये भी पाया कि सरकार ने नियमों का पालन नहीं किया, जैसे जनता से राय लेना या बिल्डिंग की मंजूरी लेना।

मंदिरों के पैसे का गलत इस्तेमाल

कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि मंदिर का पैसा भक्तों की आस्था और दानदाताओं की भावनाओं से जुड़ा है। इसे गैर-धार्मिक कामों में लगाना भक्तों के हक का हनन है। कोर्ट ने पहले के फैसलों का जिक्र किया, जैसे 2025 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश, जिसमें शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के लिए मंदिर के पैसे का इस्तेमाल रोक दिया गया था। कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर मंदिर के पैसे का दुरुपयोग हुआ, तो जिम्मेदार अधिकारियों से उसकी भरपाई कराई जाए।

कानूनी और धार्मिक अहमियत

ये फैसला मंदिरों की आजादी और भक्तों की आस्था की रक्षा के लिए मील का पत्थर है। तमिलनाडु में 36,000 से ज्यादा मंदिर एचआरएंडसीई विभाग के कंट्रोल में हैं। ये मामला सरकार के ज्यादा दखल पर सवाल उठाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि मंदिर का पैसा सिर्फ पूजा-पाठ, त्योहार, मंदिरों की बेहतरी और गरीबों की मदद जैसे कामों के लिए है। ये फैसला आगे चलकर मंदिरों के पैसे के इस्तेमाल के लिए सख्त नियम बनाता है।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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