आज़ादी के आंदोलन में क्या रही संघ की भूमिका..? : RSS सरसंघचालक जी ने उदहारण देकर बताई सच्चाई
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आज़ादी के आंदोलन में क्या रही संघ की भूमिका..? : RSS सरसंघचालक जी ने उदहारण देकर बताई सच्चाई

दिल्ली के विज्ञान भवन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज़ादी आंदोलन, सामाजिक आंदोलनों और संघ की उपलब्धियों पर दिए स्पष्ट जबाव

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 30, 2025, 12:15 am IST
inभारत, संघ @100, दिल्ली
श्री मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

श्री मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज़ादी आंदोलन, सामाजिक आंदोलनों और संघ की उपलब्धियों आए  प्रश्नों के उत्तर दिया।

प्रश्न – कुछ लोग संघ पर मिलिटेंट संगठन होने का आरोप लगाते हैं। केवल यह आरोप लगता है कि संघ के संगठन हिंसा करते हैं। आपका क्या विचार है?

  • आज़ादी के आंदोलन में संघ की क्या भूमिका रही?
  • संघ द्वारा सामाजिक आंदोलनों में क्या भागीदारी रही है और अन्य क्या उपलब्धियाँ रही हैं?
  • आपके संदेश को एकता और समावेशिता के रूप में जमीनी स्तर तक पहुँचने में कितना समय लगता है?
  • आपके अनुसार अभी देश के किन-किन क्षेत्रों में संघ अपनी पैठ नहीं बना पाया है और उसके लिए क्या करने की आवश्यकता है?

उत्तर –  यह आरोप निराधार हैं। अब तक कभी ऐसा हुआ नहीं कि संघ हिंसा करने वाला संगठन सिद्ध हो। जब-जब ऐसे झूठे आरोप लगे, उनके तथ्य उजागर हो गए। यदि संघ हिंसक संगठन होता तो भारत में 75 लाख स्थानों तक उसकी पहुँच संभव ही नहीं होती और न ही उसे इतना व्यापक समर्थन मिलता। सरल-सी बात है— अगर हम हिंसक होते तो खुलेआम कार्यक्रम करने के बजाय अंडरग्राउंड छिपकर काम करते और गुप्त रूप से प्रचार-प्रसार करते।

संघ का कार्य और आधार

यह केवल भ्रांतियाँ और मूर्खतापूर्ण आरोप हैं। संघ का कार्य तो मनुष्यों को जोड़ने का है और यह कार्य हिंसा से संभव नहीं। हमारे कार्य का आधार है शुद्ध सात्त्विक प्रेम। यही ध्यान में रखना चाहिए।

डॉ. हेडगेवार का योगदान

डॉ. हेडगेवार स्वयं एक क्रांतिकारी थे। आज़ादी के आंदोलन में उन्होंने दो बार सश्रम कारावास भुगता। वे कांग्रेस के आंदोलनों में सक्रिय रहे और विदर्भ क्षेत्र में उन्होंने नेतृत्व भी किया।

1942 का आंदोलन और संघ की भूमिका

1942 के आंदोलन में महाराष्ट्र के आष्टी और चेम्बूर में उल्लेखनीय योगदान रहा। वहाँ कई स्वयंसेवकों ने बलिदान दिया, कई पकड़े गए, कुछ को सश्रम कारावास और यहाँ तक कि फाँसी तक की सजा सुनाई गई। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब आम माफी (एमनेस्टी) मिली तो उसमें से 11 लोग छूटे, जिनमें से सात संघ के स्वयंसेवक थे।

उस दौर में जनजागृति और आंदोलन का नेतृत्व टुकडोजी महाराज के साथ स्वयंसेवकों ने किया। वे संघ में आते और रात को भजन सिखाते थे— ऐसे भजन जिनमें संघर्ष और बलिदान की भावना जगाने वाले शब्द होते थे। इन्हीं के आधार पर आंदोलन का माहौल बना।

स्वयंसेवकों का साहस और योगदान

पसंद दादा पाटिल जब सांगली की जेल से बाहर आए तो उन्हें जंगल के रास्ते, रियासत की सीमा पार कराकर ट्रेन में बैठाने का कार्य संघ के स्वयंसेवकों ने किया। इसमें प्रांत संघचालक के निर्देशन में पडसलगीकर नामक स्वयंसेवक ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने स्वयं दादा पाटिल को कंधे पर उठाकर 15 किलोमीटर तक दौड़ते हुए सुरक्षित पहुँचाया। श्रीमती अरुणा आसफ अली और लाला हंसराज गुप्ता जैसे नेताओं को भी स्वयंसेवकों ने सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने में सहायता की।

संघ का स्वतंत्रता संग्राम में सहभाग

इस प्रकार संघ का सहभाग स्वतंत्रता संग्राम में पहले से रहा है। पहले जब तक स्वतंत्रता नहीं मिली थी तब हमारा उद्देश्य राष्ट्र को स्वतंत्र करना था। अब जबकि हम स्वतंत्र हो चुके हैं तो उद्देश्य सर्वांगीण उन्नति है।

संघ का काम हर जगह हुआ। संगठन के नाम से औपचारिक भागीदारी नहीं थी क्योंकि किसी संगठन को बुलाया ही नहीं गया था, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर हजारों स्वयंसेवकों ने आंदोलनकारियों को पूरा सहयोग दिया। अंडरग्राउंड कामों में भी योगदान रहा। कई स्वयंसेवकों के पास स्वतंत्रता सेनानी के प्रमाण-पत्र हैं।

1942 के आंदोलन के अनुभव से ही रज्जू भैया का संघ की ओर रुझान बढ़ा, यह उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था।

अधिक जानकारी के लिए संदर्भ

इस विषय में और विस्तार से पढ़ने के लिए राकेश सिन्हा जी द्वारा लिखित “डॉ. हेडगेवार का चरित्र-ग्रंथ”, जो राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (National Book Trust) से प्रकाशित है, देखा जा सकता है। उसमें इन सभी घटनाओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध है। संजीव सान्याल जी, जो शचींद्र सान्याल जी के पोते हैं, उनकी एक नई पुस्तक आई है। उसमें भी ये सभी विवरण मिलते हैं। हमारी भी एक पुस्तक है “स्वतंत्रता संग्राम”, जो सुरुचि प्रकाशन, दिल्ली से उपलब्ध है। उसमें भी यह बातें देखी जा सकती हैं।

सामाजिक आंदोलनों में संघ का दृष्टिकोण

सामाजिक आंदोलनों में संघ की इच्छा यह रही है कि इन कार्यों का श्रेय समाज को मिले। संघ ने कभी अलग झंडा नहीं उठाया, बल्कि हमेशा भारत के प्रयासों में सहयोग किया है। किसी विशेष बैनर के तहत काम करने की बाध्यता संघ ने स्वयंसेवकों पर कभी नहीं डाली। जहाँ भी कोई अच्छा कार्य हो रहा है, वहाँ स्वयंसेवकों को स्वतंत्र रूप से जुड़ने की छूट है। उनसे अपेक्षा यही रहती है कि वे समाज के हर अच्छे कार्य में लगें—और वास्तव में, वे बड़ी संख्या में लगते भी हैं।

स्वयंसेवकों की सहभागिता

ऐसे अनेक सामाजिक आंदोलनों में संघ के स्वयंसेवक मिल जाते हैं। इस प्रकार वे समाज के प्रयासों को और आगे बढ़ाते हैं। संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने निस्वार्थ, प्रामाणिक और विश्वसनीय कार्यकर्ता तैयार किए हैं। यही कार्यकर्ता लोगों का विश्वास जीतते हैं। शेष उपलब्धियाँ उन संगठनों की हैं जिनमें स्वयंसेवकों ने कार्य किया है।

संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि

संघ की उपलब्धि एक ही है—काम करने वाले व्यक्ति का निर्माण। वही निर्माण हम करते हैं और आगे भी करते रहेंगे।

एकता और समावेशिता का संदेश

जहाँ तक प्रश्न है कि एकता और समावेशिता का संदेश जमीनी स्तर तक पहुँचने में कितना समय लगेगा, तो उसका उत्तर ज्योतिषी ही बता सकता है। लेकिन संघ का दृष्टिकोण यह है कि हमें लगातार कार्य करते रहना है, बिना रुके।

संघ की कार्यप्रणाली

संघ स्वयं कोई योजना नहीं बनाता। संघ का कार्य है शाखा चलाना और स्वयंसेवक तैयार करना। आगे की योजनाएँ स्वयंसेवक बनाते हैं।आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में संघ के एक या एक से अधिक संगठन सक्रिय हैं। उनके माध्यम से धीरे-धीरे व्यवस्था परिवर्तन हो रहा है। उदाहरण के लिए, भारतीय मजदूर संघ ने मजदूर क्षेत्र के लिए एक नया दर्शन प्रस्तुत किया है, जिसकी चर्चा आज अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) में भी हो रही है। यही ढाँचा बदलने की प्रक्रिया है—प्रत्येक क्षेत्र में नए मॉडल और प्रतिमान स्थापित करना।

भविष्य की दिशा और शताब्दी के प्रयास

अब बहुत ही थोड़े क्षेत्र शेष हैं, जहाँ हम अपनी पैठ नहीं बना पाया है। लेकिन आने वाले समय में यह कार्य भी होगा। संघ की शताब्दी के अवसर पर विशेष प्रयास होंगे और उसके बाद सभी क्षेत्रों में हम अपना प्रतिनिधित्त्व लेकर उभरेंगे और अपना काम जारी रखेंगे।

Topics: RSS शताब्दी वर्ष कार्यक्रममोहन भागवतRSS पर हिंसा के आरोपपाञ्चजन्य विशेषआज़ादी आंदोलन में RSS की भूमिकासंघ शताब्दी वर्षRSS और सामाजिक आंदोलनमोहन भागवत भाषणRSSसंघ की भूमिकादिल्ली विज्ञान भवन कार्यक्रमRSS पर हिंसा का आरोपRSS और आज़ादी आंदोलनRSS सामाजिक आंदोलनसंघ की उपलब्धियाँराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
Shivam Dixit
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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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