नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सामाजिक समरसता और पहचान को लेकर किए गए प्रश्न का उत्तर दिया।
प्रश्न – “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” हमारा संकल्प है। लेकिन क्या जातिवाद इस राह में रुकावट नहीं है? क्या संघ यह महसूस करता है कि हिंदू समाज की एकता में वर्ण व्यवस्था बाधक है?
उत्तर – जातिवाद तो रुकावट है। किसी भी बात का विवाद होने पर वह रुकावट बन जाता है। यह जो जाति और वर्ण नाम की चीज़ है, क्या यह कभी सही व्यवस्था थी? आज यह व्यवस्था नहीं रही; यह अव्यवस्था बन गई है। जाति और वर्ण व्यवस्था के नाम पर अभिमान ने लोगों को बाँट दिया। वास्तव में कोई कालसुसंगत नई व्यवस्था, नया रूप आना चाहिए, जो शोषण-मुक्त और समता युक्त हो।
नई व्यवस्था की आवश्यकता
इसकी आवश्यकता है। जो अब पुरानी और कालबाह्य है, वह चलेगी और उसकी बहुत चिंता करने की आवश्यकता नहीं। जाते समय उपद्रव नहीं करना चाहिए। आज की व्यवस्था तो है ही नहीं। हमारे मन में वह अहंकार है—“मैं इस वर्ण का हूँ, मैं इस जाति का हूँ।” यह अहंकार समाप्त होना चाहिए, और उसके साथ ही न्यूनता (हीनता का भाव) भी समाप्त हो जाएगी। व्यवहार होना चाहिए।
समरसता की शुरुआत
कल मैंने बताया कि समरसता के लिए क्या करना चाहिए। यह घर में उठने-बैठने, स्वाभाविक व्यवहार और भाषण से शुरू होता है। यशवंतराव जी केलकर के उदाहरण हैं। हमारे विद्यार्थी परिषद में एक नया कार्यकर्ता अनुसूचित जाति का था। उसे भड़काया गया कि लोग तुम्हारा उपयोग कर रहे हैं। वह तिलमिला गया। दोपहर में उसने उनके घर जाकर प्रश्न पूछे। उन्होंने कहा, “अंदर जाओ, किचन में पानी है, तुम पी लो।” आते समय मेरे लिए भी गिलास रखा गया।
स्वाभाविक व्यवहार का महत्व
इस प्रकार का व्यवहार चाहिए। भाषण, बुद्धि या तर्क पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अपनापन वहां तक पहुँचना चाहिए, हृदय का हृदय से स्पर्श होना चाहिए। यह सहज स्वाभाविक व्यवहार ही आवश्यक है।
समय और धैर्य की आवश्यकता
यह सब धीरे-धीरे होगा। अभी यह इतनी गहराई में जड़ें जमा चुका है कि उखड़ने में समय लगेगा। देश विशाल है और मीडिया क्षेत्रीय हो गया है; इसलिए अच्छी बातों का प्रभाव कम दिखता है। कभी-कभी जो दूर जाना चाहिए, वह नहीं पहुँच पाता। पॉजिटिव न्यूज में कमी है।
स्वयंसेवक प्रयास और सफलता के उदाहरण
आपके सामने एक उदाहरण है। एक निमंत्रित सज्जन संघ के स्वयंसेवक हैं। वह भोपाल गए। गणेश उत्सव (गणेश चतुर्थी) के दौरान, लोगों ने मूर्ति के लिए चंदा माँगा। उन्होंने शर्त रखी कि जितनी बड़ी मूर्ति लोग कहेंगे, उतनी वे खरीदेंगे, पर एक शर्त थी—इस बस्ती में सभी समाज के लोग पूजा और आरती में एक साथ रहें। यह वातावरण उन्होंने तैयार किया और सफल रहा।
समूह के रूप में कार्य और प्रभाव
ऐसे प्रयास स्वयंसेवक समूह के रूप में भी करते हैं। मंदिर, पानी, श्मशान आदि की भिन्न-भिन्न सर्वेक्षण की आवश्यकता होती है। मध्यप्रदेश और तेलंगाना में अनेक गांवों ने इसे बदल दिया। अभी कई गांवों में यह काम बाकी है, क्योंकि यह जबरदस्ती नहीं होता; मन बनाकर किया जाता है। इसे समय लगता है।
रामजन्मभूमि और समाजिक एकता
अभी रामजन्मभूमि के लिए महाराष्ट्र के देहातों में हमारे कार्यकर्ता गए। उन्होंने इस प्रकार सारा कार्यक्रम रचित किया कि उस बहाने उस गांव के मंदिर में गांव के साहब, जाति और वर्ग के लोग सब एकत्रित हुए। तीन-चार बार तो वहां का जो दर्शन पर प्रतिबंध था, वह अपने आप ही टूट गया। बिना कुछ बोले हम यह करते, कोई देखे या न देखे, कोई ऐसा इम्पैक्ट हमारे काम से हो रहा है क्या।
सर्वेक्षण और परिणाम
सर्वे करें और ठीक से सर्वे करें। रिज़ल्ट छापें। रिज़ल्ट अच्छे आए तो आप सब लोगों का उत्साह बढ़ेगा। समझो, कम आए तो हमारे लिए सोचने की बात रहेगी कि क्या सुधार करेंगे। ठीक है, लेकिन हम कर रहे हैं और उसका इम्पैक्ट भी हो रहा है, चाह कर रहे हैं। वहां तो हो रहा है, बाकी जगह भी। इसे मालूम होना चाहिए और यह हवा बननी चाहिए। इसके लिए थोड़ा आपके तरफ से भी सहयोग आवश्यक है, तो वह हो जाएगा।
प्रश्न – क्या आरक्षण जातिवाद को बढ़ाता है या समरसता में बाधक है? इस विषय पर संघ का क्या विचार है? आपने कहा कि हम भिन्न होकर भी एक हैं, हिंदू हैं, लेकिन जब निम्न वर्ग की स्त्री के साथ शीलभंग होता है, तो संघ की ओर से संतोषजनक विरोध क्यों नहीं दिखाई देता?
उत्तर : आरक्षण वगैरह। यह विषय तभी समझ में आता है जब मन में संवेदना हो। हमारे जातिगत आरक्षण पर भी प्रस्ताव रहा है। पहली बार जब यह प्रस्ताव आया, तो समाज में घमासान छिड़ गया। इस घमासान में मारपीट नहीं हुई, लेकिन विरोधी मत और उनका विवाद उत्पन्न हुआ।
सरसंघचालक बाला साहब का दृष्टिकोण
सरसंघचालक बाला साहब जी उस समय इस सत्र में सब सुनकर बोले कि हजार वर्षों से इस जातिगत भेद का दोष झेलने वाले परिवार में जन्म हुआ है, ऐसा कल्पना करके सोचो। अगले सत्र में आरक्षण के समर्थन का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया। यह पूरी प्रक्रिया संवेदना का प्रश्न है।
संवेदना और समय की भूमिका
किसमें जमा खर्चा, किसको कितना लाभ मिलेगा— तर्क से इसका हल नहीं है। अन्याय हुआ है, उसे सुधारना चाहिए। तर्क हो सकता है कि अन्याय करने वाले चले गए, लेकिन हम इसे मानते नहीं हैं। दोनों तर्कों में दम है। इसका समय अभी है। दीनदयाल उपाध्याय ने बताया कि अगर कोई खड्डे में गिरा है, तो उसे ऊपर निकालना है। खड्डे में गिरा व्यक्ति अपने पंजों पर खड़ा होकर ऊंचा होने का प्रयास करेगा और ऊपर वाला नीचे झुककर उसे हाथ देगा।
यह प्रक्रिया कभी होगी। बाहर से वाद-विवाद चलते ही तर्क चलता है, लेकिन मैं सार्वजनिक रूप से कहता हूं, यदि हजार वर्ष हमारे लोग झेलते रहे हैं, तो अब उन्हें ऊपर लाने के लिए 200 वर्ष और झेलना पड़े तो क्या फर्क पड़ेगा? अपने लोगों के लिए कुछ छोड़ना ही धर्म है।
संघ का स्थायी समर्थन
उदाहरण के लिए, शिवी राजा ने अपना मांस काटकर दिया, तो हम सभी लोगों के लिए इसे उपयोग करेंगे। थोड़ी भावना के बिना इसे समझा नहीं जा सकता। संविधान सम्मत जितना आरक्षण है, उसका संघ का पहले से समर्थन है और यह सदा रहेगा। जब तक इसके लाभार्थियों को इसकी आवश्यकता महसूस होती रहेगी, संघ इसका समर्थन करता रहेगा। संवाद और भेद समाप्त हो जाएगा। अब हम अपने बलबूते पर खड़े रहेंगे। जब तक किसी को यह लगता नहीं, हम उसके समर्थन में रहेंगे। मैंने कई बार स्पष्ट कर दिया है कि संघ की भूमिका हमेशा सक्रिय रही है।
भेद समाप्ति और संघ की भूमिका
भेद समाप्त हुआ। यह कब लगेगा? प्रश्न में उल्लिखित घटनाओं और अत्याचारों की चर्चा अभी भी जारी है। जहाँ यह घटनाएँ होती हैं, वहाँ संघ के स्वयंसेवक उनका पुरजोर विरोध करने के लिए खड़े रहते हैं। उनका मानना है कि ऐसी घटनाओं में हमें जाना चाहिए, देखना चाहिए और सत्य तथा न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
संघ की शक्ति और स्थानीय प्रभाव
हालांकि, सभी जगह उनकी ताकत समान नहीं है। पूरे संघ की ताकत एक समान है, लेकिन मेरे गांव में संघ का प्रभाव अलग-अलग है। जहाँ ताकत है, वहाँ खड़े रहने के बावजूद वह प्रभाव बनाए रखना कठिन होता है। कहीं-कहीं स्वयंसेवक नहीं पहुँच पाते, यह उनकी कमी या त्रुटि मानी जाएगी।
स्थानीय स्तर पर सुधार और न्याय
हमें इसे सीधे सुधारना होगा। मन तो यही है कि स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवक समुदाय में जाकर यह जायजा लें। इसके कारण आपस में झगड़े नहीं होने चाहिए। सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े होकर न्याय दिलाना हमारा उद्देश्य होना चाहिए। विभिन्न कारणों से यह हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन बिना कारण नहीं होना हमारी कमी है।
दुर्बल वर्ग और नेतृत्व
स्थानीय संघ कार्यकर्ताओं के ध्यान में यह बात ला दीजिए, ताकि इसका समाधान हो सके। दुर्बल वर्ग के लिए आरक्षण के प्रयास हम करेंगे। यदि इसे सीधे जोड़ेंगे, तो लोग कह सकते हैं कि बीजेपी की वोट बैंक बढ़ाने के लिए संघ यह कर रहा है। यह गलतफहमी उत्पन्न कर सकता है। इसलिए उचित यह है कि समाज में उस वर्ग की उन्नति के लिए उस वर्ग की नेतृत्व क्षमता खड़ी हो।
प्रामाणिक और निस्वार्थ नेतृत्व
यह नेतृत्व प्रामाणिक और निस्वार्थ बुद्धि से होना चाहिए। संघ पूरे समाज का अंग मानकर इसे लागू करता है। इस दिशा में हमारे प्रयास चल रहे हैं और चलते रहेंगे। इससे इसका समाधान होगा, और जो न्याय और सत्य का पक्ष है, उसमें संघ नीतिगत रूप से सदैव खड़ा रहेगा।
ग्रंथों और इतिहास की व्याख्या
ग्रंथों में यदि इसका कोई संदर्भ मिलता भी है, तो हम उसे स्वीकार नहीं करते। हमारे धर्माचार्यों ने 1972 में उडुप्पी में कहा कि हिंदू शास्त्रों में छुआछूत, ऊँच-नीच, अछूता या अस्पृश्यता का कोई स्थान नहीं है। यदि कहीं ऐसा रेफरेंस मिल भी जाए, उसका अर्थ गलत होगा। इसका मतलब यह नहीं कि हम ग्रंथों को छेड़ते हैं। पूरे हिंदू इतिहास में ग्रंथों की संख्या बहुत है।
लोक व्यवहार और शास्त्र
मनुस्मृति सहित कुछ ग्रंथों के अनुसार हिंदुओं ने व्यवहार किया है, लेकिन यह कम ही हुआ। हमारे यहाँ दो प्रमाण हैं—एक शास्त्र और दूसरा लोक। शास्त्रार्थ और लोक की प्रथा अलग-अलग होती है। लोक जो चाहता है वह होता है। ग्रंथों में जो लिखा है, वैसा हम नहीं चलते। इसलिए पूरे इतिहास में मनुस्मृति के अनुसार देश नहीं चला। अधिकतर जगह लोग अपनी सुविधा के अनुसार चले।
ऊँच-नीच और सामाजिक सुधार
श्रम और प्रतिष्ठा के क्षरण के कारण ऊँच-नीच की भावना विकसित हुई। पहले स्वच्छता की भावना थी, लेकिन इसे अपवित्रता में बदल दिया गया और इसी कारण ऊँच-नीच का भेद उत्पन्न हुआ। यह लंबे समय से विकसित हुआ, और इसे सुधारने की आवश्यकता है।
समानता और संघ का कार्य
सभी लोग समाज के अंग हैं। प्रत्येक अपने काम में लगा है। ऊँच-नीच कोई नहीं है। सबकी प्रतिष्ठा समान है। सब अपने हैं। यह भावना जगाना और इसे क्रियान्वित करना संघ का कार्य है। ग्रंथों का इसमें बहुत संबंध नहीं है, क्योंकि ग्रंथ भी समय के अनुसार बदलते हैं और नई स्मृति की आवश्यकता होती है। धर्माचार्यों से विचार करके सभी भारतीय समाज के वर्ग, पंथ, जाति, उपजाति को समाविष्ट करने वाली व्यावहारिक आचार-प्रणाली सिखाने वाली नई स्फूर्ति उत्पन्न करनी चाहिए।
जातिगत समीकरण और समाज में सद्भावना
यह जागृति का कार्यक्रम है। जातिगत समीकरण राजनीतिक दृष्टि से प्रमुख होते जा रहे हैं। जब यह राजनीतिक दृष्टि कम होगी, तो समाज में सद्भावना बनी रहेगी। मैंने कल सद्भावना बैठक का उदाहरण दिया। जाति और बिरादरी के प्रमुख बैठक में बैठेंगे और तीन मुख्य बिंदुओं पर विचार करेंगे। इससे राजनीति अपनी जगह पर रहेगी, लेकिन समाज में विभाजन और दोफाड़ नहीं होगा।

















