जिन्ना के देश के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान इस वक्त रावलपिंडी की अडियाला जेल में बंद हैं। लेकिन आएदिन वहीं से अपने हस्तकों के माध्यम से राजनीतिक संदेश भिजवाकर आतंक की नर्सरी बने जिन्ना के देश की सियासत में अपनी मौजूदगी का एहसास कराते रहते हैं। उनका ताजा संदेश उनकी बहन के जरिए आया है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान फौज प्रमुख असीम मुनीर को जमकर लताड़ा है। उन्होंने कहा है कि मुनीर देश को बर्बाद कर रहे हैं। इमरान का ऐसा कहना दिखाता है कि उस देश की संस्थागत बुनावट, लोकतांत्रिक मूल्य और सत्ता में गहरी जंग लग चुकी है।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी बहन अलीमा खानम के माध्यम से यह संदेश भिजवाया है। इसमें उन्होंने ‘फील्ड मार्शल’ असीम मुनीर को न सिर्फ देश को “बर्बाद करने वाला” बताया बल्कि मुनीर की तुलना मोहसिन नकवी से की है। वही नकवी जिन्होंने कथित रूप से पाकिस्तान क्रिकेट को रसातल में पहुंचाया है। इमरान ने कहा कि जिस तरह नकवी ने क्रिकेट को गर्त में धकेला, उसी तरह मुनीर पाकिस्तान को गर्त में ले जा रहे हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान का ऐसा कहना पाकिस्तान में सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच लंबे समय से चले आ रहे सत्ता संघर्ष का ताजातरीन उदाहरण है। पाकिस्तान में सत्ता पर सेना का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से हद से ज्यादा ही रहा है, और कई बार लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर करने में सेना ने प्रत्यक्ष भूमिका भी निभाई है। कहते हैं, वहां सत्ता इस्लामबाद से नहीं, रावलपिंडी से चलती है। इमरान का यह आरोप कि मुनीर ‘सत्ता लोभी’ हैं और देश में ‘तानाशाही’ चला रहे हैं, इस संस्थागत टकराव को और गहरा करता है।
जेल में बंद इमरान को 9 मई 2023 की अराजकतापूर्ण घटनाओं के लिए दोषी ठहराया गया है, लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि असली साजिशकर्ता तो असीम मुनीर हैं। इससे यह साफ होता है कि इमरान खुद को एक राजनीतिक शिकार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और सेना को एक तानाशाही ताकत के रूप में।

इमरान खान ने खुलकर कहा है कि ‘हम झुकेंगे नहीं’। यह बयान एक प्रकार से उनकी मनोवैज्ञानिक रणनीति है। यह उनके समर्थकों को एक संदेश देता है कि, वे दबाव में नहीं आए हैं, संघर्ष जारी रहेगा। अपने बयान के माध्यम से इमरान शायद अपने समर्थकों में भी जोश बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में अब ‘न इंसाफ बचा है, न कानून’। उनका ऐसा कहना जिन्ना के देश की न्यायिक और मीडिया संस्थाओं की गिरती विश्वसनीयता की ओर इशारा करता है। जब एक पूर्व प्रधानमंत्री जेल से यह कहता है कि सभी संस्थान ‘समझौता’ कर चुके हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
जैसा पहले बताया, पाकिस्तान में सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच संघर्ष कोई नया नहीं है। जनरल अयूब खान, जनरल ज़िया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ जैसे सैन्य शासकों ने उस कंगाल देश की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया है। इमरान खान का बयान उसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए, जहां सेना का हस्तक्षेप लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दिक्कतें पैदा करता रहा है।
विशेषज्ञों को लगता है कि पूर्व प्रधानमंत्री का यह ताजा बयान अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी पैदा कर सकता है। पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता उसके विदेशी निवेश, कूटनीतिक संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकती है। यदि सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच यह टकराव बढ़ता है, तो इससे वह जर्जरहाल देश और ज्यादा आंतरिक संकट झेलने को विवश हो सकता है।

इमरान खान का जेल से दिया गया बयान केवल एक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की राजनीतिक संरचना, संस्थागत विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक गंभीर टिप्पणी है। यह बयान उस गहरे असंतोष को दर्शाता है जो सत्ता के केंद्रीकरण, सैन्य दखलंदाजी और न्यायिक निष्पक्षता की कमी के कारण उत्पन्न हुआ है।
‘जो करना है करो, हम झुकेंगे नहीं’ वाली बात एक चुनौती है, न केवल वहां की सेना को, बल्कि उस पूरे सत्ता अधिष्ठान को जो पाकिस्तान की राजनीति को नियंत्रित कर रहा है। यह बयान आने वाले समय में पाकिस्तान की राजनीति में और अधिक हलचल पैदा कर सकता है। हो सकता है, आने वाले दिनों में यह बयान इमरान की तहरीके इंसाफ पार्टी की ओर से किसी बड़े आंदोलन की नींव बने।

















